लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १०२ ) लीलावती । इस खण्डमेरुमें छन्दःशास्त्रोक्त क्रिया करनेसे अन्तमें जो अङ्क आते हैं वह एक दो तीन इत्यादि गुरु वर्णोंके क्रमसे भेद होते हैं, इस गणितके करनेसे यह मालूम होता है कि, यह छन्दःशास्त्रोक्त रीतिसे निकाले हुए भेदहीका है या नहीं ॥ प्रस्तार बनानेकी यह रीति है कि, जितने अक्षरोंका प्रस्तार करना हो, पहले उतने ही गुरु लिखे, फिर आदिके गुरुके नीचे लघु लिखे. जैसे- $\begin{matrix} SSSSSS ISSSSS \end{matrix}$ फिर अगाडीके जैसे ऊपर हों वैसा ही लिखे जैसा कि $\begin{matrix} SSSSSS I SSSSS \end{matrix}$ यहां पहले गुरुके नीचे लघु लिखा है और बाकी जो आगे रहे वह जैसे ऊपर लिखे हैं, वैसे ही नीचे भी लिखे और पहले कमती रहजाय तो गुरु अक्षरोंसे पूरा करे. जैसा $\begin{matrix} I S S S S S I S S S S \end{matrix}$ यहां पहले गुरुके नीचे लघु लिखा है आगे सब ऊपरके अनुसार लिखे हैं और यहां आदि (पहले) में एक कमती रहा इस- कारण उसके गुरुसे पूरा किया तब ऐसा I S S S S S हुआ इसी प्रकार जबतक सब लघु हो जाँय तबतक क्रिया करे. S I S S S S इस प्रकार गायत्रीके चौथे पादके अक्षरोंका प्रस्तार करनेसे ६४ चौंसठ भेद होते हैं. उदाहरणं शिल्पे- शिल्पके विषयका उदाहरण- एकद्वित्र्यादिमूषावहनमितिमहो ब्रूहि मे भूमिभर्तु- र्हर्म्ये रम्येऽष्टमूषे चतुरविरचिते श्लक्ष्णशालाविशाले ॥ एकद्वित्र्यादियुक्ता मधुरकटुकषायाम्लकक्षारतिक्तै- रेकस्मिन्षड्रसैः स्युर्गणक कति वद व्यञ्जने व्यक्तिभेदाः ॥१॥ अन्वयः- अहो गणक ! चतुरंविरचिते श्लक्ष्णशालाविशाले अष्टमूषे रम्ये भूमिभर्तुः हर्म्ये एकद्वित्र्यादिमूषावहनमिति मे ब्रूहि । तथा एकास्मिन् व्यञ्जने मधुरकटुकषायाम्लकक्षारतिक्तैः षड्रसैः एकद्वित्र्यादियुक्ताः व्यक्तिभेदाः कति स्युः इति वद ? ॥ १ ॥ अर्थः-हे गणितप्रवीण ! चतुरपुरुषके बनाये हुए रमणीय चौडे दालानोंसे सुशोभित आठ ८ खिडकीवाले अतिसुन्दर राजाके महलमें एक एक, दो दो, तीन तीन, चार चार, पांच पांच, छ :छ, सात सात, आठ आठ, खिडकी अलग २ खोलनेसे वायुके कितने भेद होंगे ? सो कहो तथा एक ही रसोईमें मीठा, कडुवा, कसीला, वकसा, खारा, चरपरा इन छ रसोंसे एक एक, दो, दो,