लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहै. क्योंकि बिलकुल अस्सी योजन चला यहाँ चय नहीं मालूम है. इसके जाननेके वास्ते ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार सर्वधन ८० में गच्छ ७ सातका भाग दिया तब ८०/७ यह हुआ इसमें आदिधन २ दोको घटाया अर्थात समच्छेदसे घटाया तब ६६/७ इतना रहा इसमें एक करके हीन पद ६ छह के आधे ३ का भाग दिया तब २२/७ यह लब्धि हुआ; यही चय हुआ; अर्थात् २२/७ इतने मार्गकी वृद्धिसे वह राजा प्रतिदिन चला था ॥ गच्छज्ञानाय करणसूत्रं वृत्तम्- जहां आदिधन, मध्यधन, सर्वधन, चय यह तो जानते हैं और गच्छ नहीं जानते हैं तहां गच्छ जाननेकी रीति एक श्लोकमें लिखते हैं- श्रेढीफलादुत्तरलोचनघ्नाच्चयार्द्धवक्रान्तरवर्गयुक्तात् ॥ मूलं मुखोनं चयखण्डयुक्तं चयोद्धृतं गच्छमुदाहरन्ति ॥ ३७ ॥ अन्वयः-आचार्याः उत्तरलोचनघ्नात् चयार्द्धवक्रान्तरवर्गयुक्तात् श्रेढीफलात् मूलम् मुखोनं चयखण्डयुक्तं चयोद्धृतं गच्छम् उदाहरन्ति ॥ ३७ ॥ अर्थः-सर्वधनको दो २ से गुणा किये हुए चयसे गुणा करे, फिर चयका आधा और आदिधन इनका अन्तर करनेसे जो मिले उसको द्विगुणित चयसे गुणा किये हुए सर्वधनमें जोड दे तब जो राशि सिद्ध हो उसका मूल ले, उस मूलमें आदि धन घटा दे और चयका आधा जोड दे, फिर चयका भाग दे जो लब्धि हो उसको गणितके आचार्य्य लोग गच्छ कहते हैं ॥ ३७ ॥ उदाहरणम्- द्रम्मतत्रयं यः प्रथमेऽह्नि दत्त्वा दातुं प्रवृत्तो द्विचयेन तेन ॥ शतत्रयं षष्ट्यधिकं द्विजेभ्यो दत्तं कियद्भिर्दिवसैर्वदाशु ॥ १ ॥ अन्वयः-हे मित्र ! यः द्विजेभ्यः प्रथमेऽह्नि द्रम्मतत्रयं दत्त्वा द्विचयेन दातुम् प्रवृत्तः तर्हि तेन षष्ट्यधिकं शतत्रयं कियद्भिः दिवसैः दत्तम् इति त्वम् आशु वद ? ॥ १ ॥ अर्थः-हे प्रियसखे ! जो दानी पहले दिन ब्राह्मणोंको तीन द्रम्म देकर फिर प्रतिदिन २ द्रम्म बढाकर देने लगा, तो उसने ३६० तीनसौ साठ द्रम्म कितने दिनमें दिये यह तुम शीघ्र कहो ? ॥ १ ॥ न्यासः-आ० ३ । च० २ । ग० । ध० ३६० । लब्धो गच्छः १८ फैलाव-इस उदाहरणमें आदि ३ तीन हैं; चय दो हैं; सर्वधन ३६० हैं; यह सब जानते हैं परन्तु गच्छ नहीं जानते हैं, इस कारण गच्छ जाननेके वास्ते ऊपर कहे हुए नियमके अनुसार चय २ दोको दो २ से गुणा किया तब चार ४ हुए. इससे