भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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क्षेत्रव्यवहारः। (११७) अथ द्वितीयखण्डः। तत्रादौ क्षेत्रव्यवहारः। पहले क्षेत्रव्यवहार कहते हैं- तत्र भुज कोटिकर्णानामन्यतमाभ्यामन्यतमानय- नाय करणसूत्रं वृत्तद्वयम्- तहाँ क्षेत्रव्यवहारमें भुज, कोटि, कर्ण यह तीन विभाग होते हैं, उनमेंसे दोको जानकर तीसरेको जाननेकी रीति दो श्लोकमें लिखते हैं- इष्टो बाहुर्यः स्यात्तत्स्पर्द्धिन्यां दिशीतरो बाहुः ॥ त्र्यस्रे चतुरस्रे वा सा कोटिः कीर्त्तिता तज्ज्ञैः ॥ १ ॥ तत्कृत्योर्योगपदं कर्णो दोः कर्णवर्गयोर्विवरात् ॥ मूलं कोटिः कोटिश्रुतिकृत्योरन्तरात्पदं बाहुः ॥ २ ॥ अन्वयः-त्र्यस्रे चतुरस्रे वा यः इष्टः बाहुः तत्स्पर्द्धिन्यां दिशि यः इतरः बाहुः सा तज्ज्ञैः कोटिः प्रकीर्त्तिता ॥ १ ॥ तत्कृत्योः योगपदं कर्णः स्यात् । दोः कर्णवर्गयोः विवरात् मूलं कोटिः स्यात् कोटिश्रुतिकृत्योः अन्तरात् पदम् बाहुः स्यात् ॥ २ ॥ अर्थः-त्रिभुज अथवा चतुर्भुज क्षेत्रमें जो माना हुआ भुज है, उसको रोकने- वाली जो दूसरी बाहु है उसको गणितशास्त्रके जाननेवाले कोटि कहते हैं. (कोटि और भुजके अग्रभागोंको बाँधनेवाली जो रेखा है उसको कर्ण कहते हैं) भुज और कोटिके वर्गका योगकर वर्गमूल लेनेसे जो लब्धि हो वह जात्यत्रिभुजमें कर्णका प्रमाण होता है. भुज और कर्णका वर्ग कर अन्तर करनेसे जो शेष रहे; उसका मूल लेनेसे जो लब्धि हो वह कोटिका प्रमाण होता है; कोटि और कर्णका वर्ग कर अन्तर करनेसे जो शेष रहे उसका मूल लेनेसे जो लब्धि हो वह भुजका प्रमाण होता है ॥ २ ॥ उदाहरणम्- कोटिश्चतुष्टयं यत्र दोस्त्रयं तत्र का श्रुतिः ॥ कोटिं दोः कर्णतः कोटिश्रुतिभ्याञ्च भुजं वद॥ १ ॥ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri

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