भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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( ११८ ) लीलावती । अन्वयः-यत्र चतुष्टयं कोटिः त्रयं दोः तत्र श्रुतिः का ? दोः कर्णतः कोटिं वद कोटिश्रुतिभ्याम् भुजं च वद ॥ १ ॥ अर्थः-जहाँ ४ चार कोटिका प्रमाण है तीन ३ भुजका प्रमाण है तहाँ कर्णका क्या प्रमाण होगा ? और भुज कर्ण जानकर कोटिका क्या प्रमाण होगा और कोटि कर्ण जानकर भुजका क्या प्रमाण होगा ? सो कहो ॥ १ ॥ न्यासः- कोटिः ४ भुजः ३ भुजवर्गः ९ कोटिवर्गः १६ एतयोर्योगात् २५ मूलम् ५ कर्णो जातः ॥ अथ कर्णभुजाभ्यां कोट्यानयनम्- कर्णः ५ भुजः ३ अनयोर्वर्गांतरम् १६ एतन्मूलं कोटिः ४ अथ कोटिकर्णाभ्यां भुजानयनम्- कोटिः ४ कर्णः ५ अनयोर्वर्गांतरम् ९ एतन्मूलं भुजः ३ फैलाव-यहां नीचेकी आडी रेखा मानी हुई भुज है और उसको रोकती हुई जो सीधी रेखा है, वह कोटि है. और दोनों रेखाओंको बाँधने- वाली जो तिरछी रेखा है सो कर्ण है. अब यहां भुजप्रमाण ३ तीन और कोटिप्रमाण ४ चार तो जानते हैं परन्तु यह नहीं जानते हैं कि कर्णका क्या प्रमाण है इस कारण ऊपर कहे हुए सूत्रके अनुसार भुज ३ तीनका वर्ग किया तब ९ हुआ; और कोटि ४ चारका वर्ग किया तब १६ हुआ इनका योग किया तब २५ पचीस हुए; इसका मूल लिया तब ५ पाँच लब्ध हुआ. यही इस क्षेत्रमें कर्णका प्रमाण है ॥