लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
पृष्ठ 135, कुल 268 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्षेत्रव्यवहारः । (११९) अब कर्णभुज जानकर कोटि जाननेका उदाहरण- इस उदाहरणमें कर्णप्रमाण ५ और भुजप्रमाण ३ तीन जानते हैं परन्तु कोटिका प्रमाण नहीं जानते; इस कारण ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार कर्ण ५ पांचका वर्ग किया तो २५ हुए और भुज ३ तीनका वर्ग किया तब ९ हुए. इनका अन्तर किया तब १६ शेष रहे इनका मूल लनेसे ४ चार लब्धि हुए यही कोटिकी प्रमाण है. अब कोटि और कर्ण जानकर भुज लानेका उदाहरण- इस उदाहरणमें कोटिप्रमाण ४ और कर्णप्रमाण ५ पांच जानते हैं, परन्तु भुजका प्रमाण नहीं जानते इस कारण ऊपरकी रीतिके अनुसार कोटि ४ का वर्ग किया तब १६ हुए और कर्ण ५ पांचका वर्ग किया तब २५ हुए; इनका अन्तर किया तब ९ नौ शेष रहे इनका मूल लिया तब तीन लब्धि हुए. यही भुजका प्रमाण है ॥ प्रकारान्तरेण तज्ज्ञानाय करणसूत्रं सार्द्धं वृत्तम्- भुज, कोटि, कर्ण जाननेकी और रीति कहते हैं डेढ श्लोकमें- राश्योरन्तरवर्गेण द्विघ्ने घाते युते तयोः ॥ वर्गयोगो भवेदेवं तयोर्योगान्तराहतिः ॥ ३ ॥ वर्गान्तरं भवेदेवं ज्ञेयं सर्वत्र धीमता ॥ अन्वयः-ययोः राश्योः वर्गयोगः कार्य्यः तयोः द्विघ्ने घाते अन्तरवर्गेण युते सति वर्गयोगः भवेत् । एवं तयोः योगान्तराहतिः कार्य्या तदा वर्गान्तरम् भवेत् धीमत सर्वत्र एवं ज्ञेयम् ॥ ३ ॥ अर्थः-जिन राशियोंका वर्गयोग करना हो उनका परस्पर घात कर ले फिर दो २ से गुणा कर ले और उन्हीं राशियोंके अन्तरका वर्ग जोडनेपर जो राशि सिद्ध हो वही उन राशियोंके वर्गोंका योग होगा. इसी प्रकार जिन राशियोंका वर्गान्तर करना हो उनका योग कर ले और उन्हीं राशियोंके अन्तरसे गुणा कर दे तब वर्गान्तर हो जाता है बुद्धिमान् सब जगह ऐसा ही जाने ॥ ३ ॥