भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 268 में से

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( १२० ) लीलावती । कोटिश्चतुष्टयमिति पूर्वोक्तोदाहरणे-- इसका ( कोटिश्चतुष्टयमित्यादि ) पहला ही उदाहरण है। न्यासः-कोटिः ४। भुजः ३। अनयोर्घाते १२ द्विघ्ने २४ अन्तर्वर्गेण १ युते वर्गयोगः २५ अस्य मूलम् कर्णः ५। अथ कर्णभुजाभ्यां कोट्यानयनम्- कर्णः ५ भुजः ३ अनयोर्योगः ८ पुनरे- तयोरन्तरेण २ हतो वर्गान्तरम् १६ अस्य मूलम् ४ कोटिः अथ भुजज्ञानम्- कोटिः ४ कर्णः ५ एवं जातो भुजः ३ फैलाव-इस उदाहरणमें भुज और कोटि जानते हैं परन्तु कर्णका प्रमाण नहीं जानते; इस कारण ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार ४। ३ इन दोनों राशियोंका घात किया तब बारह हुए; इनको २ से गुणा किया तब २४ हुए, इसमें उन ही ४ । ३ दोनों राशि योंके अन्तर १ का वर्ग जोड दिया तब २५ हुए; यह भुजको टिके वर्गका योग हुआ पहली रीतिके अनुसार इसका मूल लिया तब पांच लब्धि हुआ, यही कर्णका प्रमाण है ॥ अब कर्ण और भुज जानकर कोटि लानेका उदाहरण लिखते हैं- ऊपर कही हुई वर्गान्तरकी सरल रीतिके अनुसार भुज ३ तीन कर्ण ५ पांचका योग किया तब ८ हुए; इसमें उन ही ३ । ५ दोनों राशियोंके अन्तर २ से गुणा किया तब १६ हुए; इनका पहली रीतिके अनुसार मूल लिया तब चार ४ लब्धि हुए. यही कोटिका प्रमाण है ॥ अब कर्णकोटि जानकर भुज लानेका उदाहरण दिखाते हैं-

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