भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 268 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 144

( १२८ ) लीलावती । पूर्वोदाहरणे--इस रीतिको पहले उदाहरणमें ही समझना. न्यासः--कर्णः ८५ अत्र द्विकेनेष्टेन जातौ किल कोटिभुजौ ५१ । ६८ चतुष्केण वा । कोटिः ७५ भुजः ४० अत्र४० दोःकोट्यो- नामभेद एवं केवलं न स्वरूपभेदः ॥ फैलाव-जिस क्षेत्रमें कर्णप्रमाण ८५ है, तहां भुज और कोटि जाननेको द्वितीय प्रकारसे कर्ण ८५ को द्विगुण किया तो १७० हुए इसमें एक युक्त इष्ट २ के वर्ग ५ का भाग दिया तब ३४ लब्धि हुए; इनको कर्ण ८५ में घटाया तब ५१ शेष रहे यही कोटिका प्रमाण है । उसी लब्धि ३४ को इष्ट २ से गुणा किया तब यह ६८ भुजका प्रमाण मालूम हुआ तब यह क्षेत्रका आकार हुआ. जब ४ चारको इष्ट माना तब पूर्वोक्त गणित करनेसे कोटि ७५ प्रमाण हुआ, और ४० भुज प्रमाण हुआ; अब यहां यह शंका होती है कि, पहली रीतिके अनुसार ४ चार इष्ट मानकरं कर्ण प्रमाण ८५ होनेपर कोटिप्रमाण ४० और भुजप्रमाण ७५ होता था और इस रीतिसे कोटिप्रमाण ७५ और भुजप्रमाण ४० हो गया; अर्थात् पहली रीतिसे अत्यन्त विरुद्ध हो गया; तहां यह उत्तर है कि, कोटि और भुजमें नाममात्रका ही भेद है; स्वरूपका कुछ भेद है नहीं. अथेष्टाभ्यां भुजकोटिकर्णानयने करणसूत्रं वृत्तम्- दो इष्ट मानकर भुज, कोटि, कर्ण तीनों जाननेकी रीति एक श्लोकमें- इष्टयोगहतिर्द्विघ्नी कोटिर्वर्गान्तरं भुजः ॥ कृतियोगस्तयोरेवं कर्णश्चाकरणीगतः ॥ ८ ॥ अन्वयः-द्विघ्नी इष्टयोः आहतिः कोटिः स्यात् । वर्गान्तरम् भुजः स्यात् । एवं तयोः कृतियोगः अकरणीगतः कर्णः च स्यात् ॥ ८ ॥