लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
पृष्ठ 145, कुल 268 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्षेत्रव्यवहारः। (१२९) अर्थः-दोनों इष्टोंको परस्पर गुणा करके दो से गुणा करे; तब कोटि प्रमाण मालूम होता है. दोनों इष्टोंको वर्ग कर अन्तर करनेसे जो शेष रहे; वह भुजका प्रमाण होता है; दोनों इष्टोंके वर्गका योग करनेसे जो अंक हो अकरणीगत कर्णका प्रमाण होता है ॥ ८ ॥ उदाहरणम्- यैर्यैर्ह्यस्रं भवेज्जात्यं कोटिदोःश्रवणैः सखे ॥ त्रीनप्यविदितानेतान क्षिप्रं ब्रूहि विचक्षण ॥ ५ ॥ अन्वयः-हे विचक्षण ! सखे ! यैः यैः कोटिदोःश्रवणैः जात्यं त्र्यस्रम् भवेत् अविदितान् एतान् त्रीन् अपि क्षिप्रम् ब्रूहि ॥ ५ ॥ अर्थः-हे चतुर मित्र ! जिन जिन कोटि भुज कर्णसे जात्यत्र्यस्र बने, उनको बिना जाने ही तीनोंका प्रमाण शीघ्र कहो ॥ ५ ॥ न्यासः-अत्रेष्टे २ । १ आभ्यां कोटिभुजकर्णाः ४ । ३ । ५ अथवेष्टे २ । ३ आभ्यां कोटिभुजकर्णाः १२ । ५ । १३ अथवेष्टे २ । ४ आभ्यां कोटिभुजकर्णाः १६ । १२ । २० एवमन्यत्रानेकधा. ९