भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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क्षेत्रव्यवहारः। ( १६१ ) द्वितीयोदाहरणे न्यासः- तत्कृत्योर्योगपदं कर्णः इति जाता करणीगता श्रुतिरुभयत्र तुल्यैव १२५० गणितञ्च ६२५ दूसरे-समकर्णचतुर्भुजके उदाहरणमें क्षेत्रफल जाननेके निमित्त तथा कर्ण जाननेके निमित्त पहले कही हुई रीतिके अनुसार अर्थात् "तत्कृत्योर्योगपदं कर्णः" इस रीतिसे भुज २५ कोटि २५ के वर्गों ६२५ । ६२५ का योग किया तब १२५० हुए, इनका मूल कर्ण प्रमाण होना चाहिये परन्तु यही ठीक मूल नहीं मिलता इस कारण यह १२५० करणीगत कर्ण हुआ; दोनों स्थानोंमें कर्ण कोटिका प्रमाण समान ही है; इस कारण कर्ण प्रमाण भी दोनों स्थानोंमें समान ही होगा; अर्थात् दोनों कर्णोंका प्रमाण १२५० होगा, अब क्षेत्रफल जाननेके निमित्त ऊपर कही हुई "तद्भुजकोटिघातः" रीति के अनुसार समकर्ण होनेसे भुज २५ कोटि २५ का घात किया; तब ६२५ हुए; यही क्षेत्रफल हुआ ॥ अथायतस्य न्यासः- विस्तृतितः ६ दैर्ध्यम् ८ अस्य गणितम् ४८ । अब आयतचतुर्भुजका फल जाननेके निमित्त ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार भूमि ८ और मुख ८ का योग किया तब १६ हुए; इनको आधा किया तब ८ आठ रहे; इनको लम्ब ६ से गुणा किया तब ४८ हुए; यही क्षेत्रफल हुआ; यहां लम्ब समान था; इस कारण "लम्बेन निघ्नं कुमुखैक्य- खण्डम्" इस रीतिसे क्षेत्रफल लाये हैं; यहाँ "तत्कृत्योर्योगपदं कर्णः" इस रीतिसे कर्ण जानकर भी समकर्ण होनेसे "तद्भुजकोटिघातः" इस रीतिसे भी