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लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

क्षेत्रव्यवहारः। ( १६१ ) द्वितीयोदाहरणे न्यासः- तत्कृत्योर्योगपदं कर्णः इति जाता करणीगता श्रुतिरुभयत्र तुल्यैव १२५० गणितञ्च ६२५ दूसरे-समकर्णचतुर्भुजके उदाहरणमें क्षेत्रफल जाननेके निमित्त तथा कर्ण जाननेके निमित्त पहले कही हुई रीतिके अनुसार अर्थात् "तत्कृत्योर्योगपदं कर्णः" इस रीतिसे भुज २५ कोटि २५ के वर्गों ६२५ । ६२५ का योग किया तब १२५० हुए, इनका मूल कर्ण प्रमाण होना चाहिये परन्तु यही ठीक मूल नहीं मिलता इस कारण यह १२५० करणीगत कर्ण हुआ; दोनों स्थानोंमें कर्ण कोटिका प्रमाण समान ही है; इस कारण कर्ण प्रमाण भी दोनों स्थानोंमें समान ही होगा; अर्थात् दोनों कर्णोंका प्रमाण १२५० होगा, अब क्षेत्रफल जाननेके निमित्त ऊपर कही हुई "तद्भुजकोटिघातः" रीति के अनुसार समकर्ण होनेसे भुज २५ कोटि २५ का घात किया; तब ६२५ हुए; यही क्षेत्रफल हुआ ॥ अथायतस्य न्यासः- विस्तृतितः ६ दैर्ध्यम् ८ अस्य गणितम् ४८ । अब आयतचतुर्भुजका फल जाननेके निमित्त ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार भूमि ८ और मुख ८ का योग किया तब १६ हुए; इनको आधा किया तब ८ आठ रहे; इनको लम्ब ६ से गुणा किया तब ४८ हुए; यही क्षेत्रफल हुआ; यहां लम्ब समान था; इस कारण "लम्बेन निघ्नं कुमुखैक्य- खण्डम्" इस रीतिसे क्षेत्रफल लाये हैं; यहाँ "तत्कृत्योर्योगपदं कर्णः" इस रीतिसे कर्ण जानकर भी समकर्ण होनेसे "तद्भुजकोटिघातः" इस रीतिसे भी

( १६२ ) लीलावती । क्षेत्रफल मालूम होजाता है; जैसे भुज ८ कोटि ६ इनके वर्गों ६४ । ३६ का योग किया तब १०० हुए;इनका मूल लिया तब १०मिले; भुज कोटि समान होनेसे दोनों कर्ण समान १० । १० ही होंगे; इस कारण समकर्ण होनेसे भुज कोटिका घात करनेसे भी वही ४८ क्षेत्रफल होगा ॥ उदाहरणम्- क्षेत्रस्य यस्य वदनं मदनारितुल्यं विश्वम्भरा द्विगुणितेन मुखेन तुल्या ॥ बाहू त्रयोदशनखप्रमितौ च लम्बः सूर्यो- न्मितश्च गणितं वद तत्र किं स्यात् ॥ १८ ॥ अन्वयः-हे गणक ! यस्य क्षेत्रस्य वदनम् मदनारितुल्यम् । द्विगुणितेन मुखेन तुल्या विश्वंभरा । त्रयोदशनखप्रमितौ च वाहू । सूर्योन्मितः च लम्बः । तत्र गणितं किं स्यात् इति वद ॥ १८ ॥ अर्थः हेगणक ! जिस क्षेत्रका मुख तो मदनारि तुल्य अर्थात् ११ है; द्विगुणित मुखके समान अर्थात् २२ भूमि है और १३ और २० प्रमाण दोनों भुज हैं; तथा सूर्य्यसंख्यक अर्थात् १२ लम्ब हैं; तहां क्षेत्रफल क्या होगा ? सो कहो ॥ १८ ॥ न्यासः- वदनम् ११ विश्वम्भरा २२ बाहू १३ । २० लम्बः १२ अत्र" सर्वदोर्युतिदलम्” इत्यादिना स्थूलफलम् २५० वास्तवं तु “ लम्बेन निघ्नं कुमुखैक्यखण्डमिति ” जातम्फलम् १९८ क्षेत्रस्य खण्डत्रयं कृत्वा फलानि पृथगानीय खण्डत्रयदर्शनम् ॥ न्यासः-प्रथमस्य भुजकोटिकर्णाः ५ । १२ । १३ द्वितीयस्यायतस्य विस्तृतिः ६ दैर्घ्यम् १२ तृतीयस्य भुजको- टिकर्णाः १६ । १२ । २० अत्र त्रिभुजयोः क्षेत्रयोः भुजकोटि- घातादर्द्धम्फलम् । आयते चतुरस्रे क्षेत्रे तद्भुजकोटिघातः फलम् ।

क्षेत्रव्यवहारः । ( १५३ ) यथा प्रथमक्षेत्रे फलम् ३० द्वितीये ७२ तृतीये ९६ एषा- मैकयं सर्वक्षेत्रफलम् १९८ जातम् । फैलाव-मुख ११ भूमि २२ दोनों भुज १३ । २० लम्ब १२ हैं अब इस उदाहरण में “सर्वदोरित्यादि” रीति से सब भुजों ११ । २० । २२ । १३ का योग किया तब ६६ हुए; इनको आधा ३३ कर चार ४ स्थानोंमें लिखा फिर अलग २ एक एक स्थानमें सब भुजोंको घटाया योगार्द्ध. भुज. शेष. | तब जो शेषाङ्क हुए उनका परस्पर घात किया ३३ ११ २२ | तब ६२९२० हुए; इनका मूल लिया तब कुछ ३३ २० १३ | कम २५० मिला; परन्तु यह ठीक नहीं ठीक ३३ २२ १३ | जाननेके निमित्त “लम्बेन निघ्नमित्यादि” इस ३३ १३ २० | रीतिसे फल लाये; अर्थात् मुख ११ और भूमि २२ इनको जोडा तब ३३ हुए; इनका आधा किया तब ३३/२ हुए; इनको लम्ब १२ से गुणा किया तब १९८ हुए यही ठीक क्षेत्रफल हुआ; अब क्षेत्रके तीन खण्ड करके अलग २ क्षेत्रफल लाकर तीनों खण्डोंपर गणित दिखलाते हैं यहां प्रथम खण्डमें भुज ५ कोटि १२ कर्ण १३ है। दूसरे खण्डमें विस्तार ६ लम्बापन १२ है। तीसरे खण्डमें भु० १६ को १२ कर्ण २० है; पहले त्रिभुजक्षेत्रमें फल लानेके लिये ५ । १२ भुजकोटिका घात किया तब ६० हुए; इनको आधा किया तब ३० हुए; यही प्रथम क्षेत्रका फल है; द्वितीयखण्ड आयत चतुर्भुजमें भुज ६ कोटि १२ का घात किया तब ७२ हुए; यही क्षेत्रके द्वितीय खण्डका फल है; तृतीय खण्ड जात्य- त्रिभुजके भुज १६ कोटि १२ का घात किया तब १९२ हुए; इनका आधा किया तब ९६ हुए यही तृतीय खण्डका क्षेत्रफल हुआ; इस प्रकार तीनों खण्डोंके फल ३० । ७२ । ९६ को जोड़नेसे वही १९८ क्षेत्रफल हुआ । CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri

( १५४ ) लीलावती । अथान्यदुदाहरणम्-और उदाहरण दिखाते हैं- पञ्चाशदेकसहिता वदनं यदीयं भूः पञ्चसप्ततिमिता प्रमितोऽष्टषष्ट्या ॥ सव्यो भुजो द्विगुणविंशतिसम्मितोऽ- न्यस्तस्मिन्फलं श्रवणलम्बमिती प्रचक्ष्व ॥ १९ ॥ अन्वयः-एकसहिता पञ्चाशत यदीयं वदनम् । पञ्चसप्ततिमिता भूः अष्टषष्ट्या प्रमितः सव्यः भुजः । द्विगुणविंशतिसम्मितः अन्यः भुजः । तस्मिन् फलं श्रवणलम्बमिती च प्रचक्ष्व ॥ १९ ॥ अर्थः-५१ इक्यावन जिस क्षेत्रका मुख है; ७५ प्रमाण भूमि है, ६८ प्रमाण दायाँ भुज है, ४० प्रमाण बायाँ दूसरा भुज है; उस क्षेत्रमें फल और कर्ण तथ लम्बका प्रमाण भी कहो ॥ १९ ॥ न्यासः- वदनम् ५१ भूमिः ७५ भुजौ ६८ । ४० यहाँ मुख ५१ हैं; भूमि ७५ हैं; दोनों भुज ६८ । ४८ हैं; अत्र फलावलम्बश्रुतीनां सूत्रं वृत्तार्द्धम्- ऊपर दिखाये हुए क्षेत्रमें फल; लम्ब और कर्णके विषयमें सूत्र आधा श्लोक- ज्ञातेऽवलम्बे श्रवणः श्रुतौ तु लम्बः फलं स्यान्नियतं तु तत्र ॥ कर्णस्यानियतत्वाल्लम्बोऽप्यनियत इत्यर्थः ॥ अन्वयः-अवलम्बे ज्ञाते श्रवणः ज्ञातः स्यात् । श्रुतौ ज्ञातायां लम्बः ज्ञातः स्यात् तत्र फलं तु नियतं स्यात् ॥ अर्थः-नियत लम्ब जाननेसे नियतकर्ण ज्ञात होता है; नियतकर्ण जाननेपर नियत लम्ब ज्ञात होता है; अर्थात् लम्ब जाननेसे कर्ण जाना जाता है और कर्ण जाननेसे लम्ब जाना जाता है और लंब या कर्णके नियत होनेसे फल भी नियत होता है और यदि कर्ण सम्मुख दोनों कोणोंके खेंचनेसे अनियत हो तो लम्ब भी अनियत होता है और कर्णोंके ही अनियत होनेसे एक ही क्षेत्रके अनेक रूप

क्षेत्रव्यवहारः। (१५५) रहजाते हैं; बुद्धिमान् इस रूपभेदकी परीक्षा रस्सीका क्षेत्राकार बनाकर प्रत्यक्ष कर सकता है॥ लम्बज्ञानाय करणसूत्रं वृत्तम्- चतुर्भुजमें लम्बके जाननेकी रीति एक श्लोकमें- चतुर्भुजान्तस्त्रिभुजेऽवलम्बः प्राग्वद्भुजौ कर्णभुजौ मही भूः ॥२४॥ अन्वयः-चतुर्भुजान्तस्त्रिभुजे प्राग्वत् अवलम्बः कार्य्यः। तदा कर्णभुजौ भुजौ स्तः भूः मही स्यात् ॥ २४ ॥ अर्थः-चतुर्भुजके भीतर जो जात्यत्रिभुज है; उसमें लम्ब डाले; काण और भुजको भुजाएँ माने महीको पृथ्वी जाने ॥ २४॥ अत्र लम्बज्ञानार्थं सव्यभुजाग्राद्दक्षिणभुजमूलगामी इष्टः कर्णः सप्तसप्ततिमितः कल्पितस्तेन चतुर्भुजान्तस्त्रिभुजं कल्पितं तत्राऽसौ कर्णः एको भुजः ७७ द्वितीयस्तु सव्यभुजः ६८ भूः सैव ७५ अत्र प्राग्वल्लब्धो लम्बः ३०८/५ फैलाव-यहां लम्ब जानना हो तो बाँई भुजके मूलसे रेखाको दक्षिण भुजके अग्रमें पहुँचा दे, उसीको इष्टकर्ण कल्पना ७७ सतत्तर किया उसीसे चतुर्भुजके भीतर एक त्रिभुज बनाया; उसमें यही कल्पित कर्ण ७७ एक भुज हुआ; दूसरा सव्य भुज ६८ है; भूमि वही ७५ है यहां पहिले कही हुई "त्रिभुजे भुजयोर्योगः" इत्यादि रीतिसे आबाधा जाननेके लिये दोनों ७७। ६८ भुजोंका योग किया तब १४५ हुए उन हीं भुजाओंके अन्तर ९ से गुणा किया तब १३०५ हुए; इनमें भूमि ७५ का भाग दिया; इत्यादि क्रिया करनेसे दोनों आबाधा २३१/५ १४४/५ मिली; इन हीं आबाधाओंपरसे लंब मिला; ३०८/५

( १५६ ) लीलावती। लंबे ज्ञाते कर्णज्ञानार्थं सूत्रं वृत्तम्- लम्ब जानकर कर्ण जाननेकी रीति श्लोक एक- यल्लंबलम्बाश्रितबाहुवर्गविश्लेषमूलं कथिताऽबधा सा ॥ तदूनभूवर्गसमन्वितस्य यल्लंबवर्गस्य पदं स कर्णः ॥ २५ ॥ अन्वयः-यत् लम्बेलम्बाश्रितबाहुवर्गविश्लेषमूलं सा अबाधा कथिता। तदून भूवर्गसमन्वितस्य लंबवर्गस्य यत् पदं स कर्णः ॥ २५ ॥ अर्थः-लंब और लम्बको आश्रय करनेवाला भुज इन दोनोंके वर्गान्तरका मूल आबाधाका प्रमाण होता है; लम्बके प्रमाणसे होने जो भूमिके वर्गयुक्त लंबका वर्ग उसका जो मूल सो कर्ण है ॥ २५ ॥ अत्र सव्यभुजाग्रालम्बः किल कल्पितः ३०८/५ अतो जाता- बाधा १४४/५ तदूनभूवर्गसमन्वितस्येत्यादिना जातः कर्णः ७७॥ अर्थः-दहिने भुजके अग्रभागसे डाला हुआ लम्ब ३०८/५ है; इससे आबाधा हुई १४४/५ "तदूनभूवर्गसमन्वितस्येत्यत्यादि" रीतिसे कर्णका प्रमाण हुआ॥ ७७ ॥ द्वितीयकर्णज्ञानार्थं सूत्रं वृत्तद्वयम्- दूसरा कर्ण जाननेके लिये रीति दो श्लोकमें- इष्टोऽत्र कर्णः प्रथमं प्रकल्प्यस्त्र्यस्रे तु कर्णोभयतः स्थिते ये॥ कर्णं तयोः क्ष्मामितरौ च बाहू प्रकल्प्य लम्बावबधे प्रसाध्ये२६ आबाधयोरेकककुप्स्थयोर्यत्स्यादन्तरं तत्कृतिसंयुतस्य ॥ लम्बैक्यवर्गस्य पदं द्वितीयः कर्णो भवेत्सर्वचतुर्भुजेषु ॥ २७ ॥ अन्वयः-प्रथमम् अत्र इष्टः कर्णः प्रकल्प्यः। कर्णोभयतः तु ये त्र्यस्रे स्थिते तयोः कर्णं क्ष्मां प्रकल्प्य इतरौ च बाहू प्रकल्प्य लम्बावबधे प्रसाध्ये ॥ २६ ॥ सर्वचतुर्भुजेषु एकककुप्स्थयोः आबाधयोः यत् अन्तरं स्यात् तत्कृतिसंयुतस्य लम्बैक्यवर्गस्य पदं द्वितीयः कर्णः भवेत् ॥ २७ ॥ अर्थः-पहले यहां इष्ट कर्ण कल्पना करे; कर्णके दोनों ओर जो दो जात्य- त्रिभुज स्थित हैं उनके कर्णको भूमि कल्पना करके तथा और दोनोंको भुजकल्पना करके लंब और आबाधा साधे ॥ २६ ॥ सब चतुर्भुजक्षेत्रोंमें एक दिशामें स्थित आबाधाओंका जो अन्तर हो उसके वर्गसे युक्त लंब योगके वर्गका मूल ले; वही दूसरा कर्ण होगा ॥ २७ ॥

क्षेत्रव्यवहारः। (१५७) न्यासः- तत्र चतुर्भुजे सव्यभुजाग्राद्दक्षिण- भुजमूलगामिनः कर्णस्य मानं कल्पि- तम् ७७ तत्कर्णरेखावच्छिन्नस्य क्षेत्रस्य मध्ये कर्णरेखोभयतो ये त्र्यस्रे उत्पन्ने तयोः कर्णः भूमिस्तदितरौ च भुजौ प्रकल्प्य प्राग्वल्लम्ब आबाधा च साधिता तद्दर्शनं लम्बः ६० द्वितीयलंबः २४ आबाधयो ४५ ३२ रेकककुप्स्थयोरन्तरस्य १३ कृते १६९ लम्बैक्य ८४ कृतेश्च ७०५६ योगः ७२२५ तस्य पदं द्वितीयकर्णप्रमाणम् ॥ ८५ ॥ फैलाव-तिसी चतुर्भुज क्षेत्रमें बांई भुजाके अग्रभागसे दक्षिण भुजके मूलमें आनेवाले कर्णका प्रमाण कल्पना किया; ७७ उस कर्णकी रेखायुक्त क्षेत्रके मध्यमें कर्णके रेखाकी दोनों ओर जो दो जात्य त्रिभुज हैं उनके कर्णको भूमि जानना, तदितर रेखाओंको भुज जानना और पहले कही हुई रीतिसे लम्ब और आबाधा सिद्ध होती है वही दिखाते हैं; लम्ब प्रमाण ६० दूसरे लम्बका प्रमाण २४ दोनों आबाधा ४५ । ३२ एक दिशामें स्थित आबाधाओंके अन्तर १३ का वर्ग किया तब १६९ लम्ब योग ८४ इसका वर्ग ७०५६ अन्तरके और लम्ब योगके वर्गों १६९ । ७०५६ का योग ७२२५ इसका मूल ८५ हुआ यही दूसरे कर्णक प्रमाण है ॥ अत्रेष्टकर्णकल्पने विशेषोक्तिसूत्रं सार्द्धं वृत्तम्- इस चतुर्भुजमें इष्टकर्ण कल्पना करनेकी विशेष रीति डेढ श्लोकमें- कर्णाश्रितं स्वल्पभुजैक्यमुर्वीं प्रकल्प्य तच्छेषमितौ च बाहू ॥ साध्योऽवलम्बोऽथ तथान्यकर्णः स्वोर्व्याः कथं- चिच्छ्रवणो न दीर्घः ॥ २८ ॥ तदन्यलम्बान्न लघुस्त- थेदं ज्ञात्वेष्टकर्णः सुधिया प्रकल्प्यः ॥ SS ॥ अन्वयः-कर्णाश्रितं स्वल्पभुजैक्यम् उर्वीम् प्रकल्प्य तच्छेषमितौ च बाहू प्रकल्प्य अवलंबः साध्यः । अथ अन्यकर्णः तथा प्रकल्प्यः यथा श्रवणः स्वोर्व्याः दीर्घः

(१५८) लीलावती । न स्यात्। तथा तदन्यलम्बात् कथञ्चित् अपि लघुः न स्यात् । सुधिया इदं ज्ञात्वा इष्टकर्णः प्रकल्प्यः ॥ २८ ॥ ऽऽ ॥ अर्थः-कर्णका आश्रय करनेवाली छोटी भुजाओंके योगको भूमि कल्पना करे उससे बाकी बची रेखाओंको भुज कल्पना करे, फिर लम्ब साधन करे दूसरा कर्ण इस प्रकार कल्पना करे जैसे कर्ण अपनी भूमिसे अधिक न हो और लम्बसे किसी प्रकार न्यून न हो, बुद्धिमान् यह जानकर इष्ट कर्ण कल्पना करे ॥ २८॥ ऽऽ ॥ आशय यह है कि, विषमचतुर्भुजमें जिन इच्छित कर्णोंकी कल्पना करनेसे चतुर्भु- जका स्वरूप न बिगडे, उन कर्णोंका न्यूनसे न्यून और बडेसे बडा करनेकी यह रीति है कि, जिस कर्णको कल्पना किया चाहते हैं उसके दोनों ओर जो दो दो भुज हैं उनका अलग अलग योग करे, उन ही दोनों योगोंमें जो योग स्वल्प हो उससे भी न्यून कर्ण इष्ट कल्पना करे तो चतुर्भुजका रूप ठीक रहेगा । उस ही स्वल्पयोगके तुल्य इष्ट कर्ण कल्पना करनेसे चतुर्भुज बनाया जाय तो अक्षेत्र हो जायगा, आशय यह है कि, कर्णको बडा करनेकी मर्यादा तहांतक है जहांतक पहिले जो दोनों योग कर आये हैं, उनमें जो छोटा योग है उससे कुछ छोटा हो और छोटेसे छोटा करनेकी मर्यादा तहांतक है, जहांतक जिस कर्णको जानना चाहते हैं उससे दूसरे कर्णके आस पास जो दो दो भुज हैं उनका योग करे और योगोंमें जो छोटा हो उसको भूमि माने और उस भूमिमें जहां भुजोंका योग हुआ है वहां चिह्न कर दे, शेष दो २ भुजोंको भुज माने तब त्रिभुजकी कल्पित आकृति बनती है। तब इसी त्रिभुजमें पहले कही हुई रीतिसे आबाधा और लंब साधे, आबाधा और उधरहीकी भूमिका जो भुज है, उसका अन्तर करनेसे जो अङ्क मिले उनके वर्गमें लम्बका वर्ग जोड दे, तब जो अङ्क हों उनका मूल कर्ण होता है परन्तु इतना कर्ण कल्पना करनेसे त्रिभुज हो जायगा और यदि इससे कुछ अधिक कर्ण कल्पना किया जाय तो चतुर्भुजका स्वरूप बना रहेगा ॥ चतुर्भुजे हि एकान्तरकोणावाक्रम्य संकोच्यमानं त्रिभु- जत्वं याति तत्रैककोणे लग्नलघुभुजयोरैक्यं भूमिरितरौ भुजौ प्रकल्प्य साधितं स च लम्बादूनः सङ्कोच्यमानः कर्णः कथञ्चिदपि न स्यात्तदितरो भूमेरधिको न स्यादे- वमुभयत्राऽपि तदनुक्तमपि बुद्धिमता ज्ञायते ॥ इसका वही अभिप्राय है जो कि, अभी ऊपर सूत्रका कहचुके हैं बुद्धिमान कार्य्यवश वे दिखाई बात भी जान सकता है ॥

क्षेत्रव्यवहारः । ( १६९ ) ऊपर कहे हुए विषयको पहिले जो विषम चतुर्भुज क्षेत्र कह आये हैं उसमें बायें भुजके अग्रभागसे दाहिने भुजके मूलतक जो कर्ण ५१ है उसको बड़ा कहां पर्यंत कल्पना करे और उससे छोटा कहाँतक करे सो दिखाते हैं, यहां जिस कर्णको ६८ कल्पना करेंगे उसकी दोनों ओर दो दो भुज हैं; एक ओर तो दो भुज ६८ । ७५ यह हैं, इनका योग ४० ७५ किया तब १४३ हुए दूसरी ओर दो भुज ५१ । ४० यह है इनका योग किया तब ९१ हुए, इन दोनों योगों १४३ । ९१ में छोटा ९१ है, इष्टकर्ण इस लघु योगसे भी कुछ न्यून कल्पना करे तब चतुर्भुजका स्वरूप नहीं बिगडेगा और यदि छोटे योगके तुल्य ही इष्टकर्ण कल्पना किया जाय तो त्रिभुज हो जायगा क्योंकि, छोटे दोनों भुज खैंचके कर्णमें मिलजायेंगे जैसे कि- [चित्र विवरण: चित्र १ (त्रिभुज): ६८, ९१, ७५; "लघु योगके तुल्य इष्टकर्णकल्पना करनेसेत्रिभुज हुआ" चित्र २ (चतुर्भुज): भुजाएं ६८, ५१, ४०, ७५ चित्र ३ (स्तम्भ रूप): "लघुयोगके तुल्य इष्ट कर्ण कल्पना करनेसे बिगड़ा हुआ चतुर्भुजकारूप"] और जब चतुर्भुजके रूप न बिगाड़कर छोटेसे छोटा इष्ट कर्ण कल्पना करना चाहते हैं तब यहां जो इष्टकर्णसे अन्य कर्ण है उसकी दोनों ओर दो दो भुज हैं एक ओरकी दोनों भुज ६८ । ५१ हैं इनका योग किया तब ११९ हुए. दूसरी ओरकी दोनों भुज ७५।४० हैं, इनका योग किया तब ११५ हुए यहाँ दोनों योगों ११९ । ११५ में छोटा योग ११५ है इसको ६८ भूमि कल्पना किया और जिस स्थानपर भूमि में भुजोंका योग ५१ हुआ है तहां चिह्न कर दिया और बाकी दो भुजोंको भुज माना ७५ ११५ तब त्रिभुजका रूप बन गया वह यह है- इस क्षेत्रमें पहली रीतिसे आबाधा मिलीं ७६२४/११५, ५६०/११५ इन दोनोंमें बड़ी आबाधा बड़ी भुजके ओरकी है और छोटी आबाधा छोटी भुजके ओरकी है, अपनी आबाधा

( १६० ) लीलावती। और भुजका अन्तर करनेसे ३०२७०२४/१३२२५ हुआ इनका मूल लिया तो लम्बका प्रमाण मिला, परन्तु यहां ठीक मूल मिल नहीं सकता; इस कारण करणीगत अर्थात् लम्बका बर्गरूप ही लम्ब रहा ॥ तब क्षेत्रका आकार. अब यहां कर्णका प्रमाण जाननेके लम्बवर्ग ३०२७०२४/१३२२५ लिये एक ओरकी आबाधा और भूमिगत भुज ७६२४/११५, ७५ इन दोनोंका ६८ ५१ तथा दूसरी ओरकी आबाधा और उसी ओरकी भुज ५६०१/११५, ४० इन आबाधा आबाधा दोनोंका भी अन्तर किया तब १००१/११५ ७६२४/११५ ५६०१/११५ मिला, यह अन्तर दोनों ओरसे एक ७५ ११५ ४० सा ही मिलता है; इस अन्तरके वर्ग १००२००१/१३२२५ को लम्बके वर्ग ३०२७०२४/१३२२५ में जोडा तब हुए योगाङ्क ४०२९०२५/१३२२५ इसका मूल कर्णका प्रमाण होता है, परन्तु यहाँ ठीक मूल मिलता नहीं, इस कारण यही करणीगत कर्ण है, परन्तु यहाँ मूलके समीपका अङ्क मालूम हो सकता है, इस कारण कही हुई “वर्गेण महतेष्टेनेत्यादि” रीतिके अनुसार आसन्न मूल लेनेके लिये छेद १३२२५ और अंश ४०२९०२५ का घात किया तब ५३२८३८५५६२५ हुए; इससे वर्गरूप बड़े इष्ट १०००० से गुणा किया तब हुए ५३२८३८५५ ६२५०००० इनका मूल लिया तब मिले २३०८३२९६ इसमें गुणक इष्टके मूल १०० और हर १३२२५ इनके घात १३२२५०० का भाग दिया तब १७ ६००७९६/१३२२५०० यह कर्णके समीपका अङ्क है, अर्थात् इससे कुछ ज्यादा कर्णका प्रमाण है; यदि इससे बडा कर्ण किया जाय तब चतुर्भुज का स्वरूप बना रहेगा और इतना कर्ण करनेमें त्रिभुज हो जायगा और चतुर्भुज अक्षेत्र हो जायगा, अर्थात् ठीक विषम चतुर्भुज रखकर यदि छोटेसे छोटा कर्ण कल्पना करना हो तो १७ ६००७९६/१३२२५०० इससे कुछ बडा करें, इसी कर्णको बड़ेसे बडा करनेकी रीति तो पहले लिख ही चुके हैं कि, यह ९१ कर्ण बड़ेसे बड़े कर्णसे कुछ न्यून है. इसी प्रकार दूसरा कर्ण भी कल्पना कर लेने योग्य है ॥ विषमचतुर्भुजे फलानयनाय करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्- विषमचतुर्भुजमें फल लानेकी रीति आधे श्लोकमें- त्र्यस्रे तु कर्णोभयतः स्थिते ये तयोः फलैक्यं फलमत्र नूनम् २९ ॥ अन्वयः-नूनम् अत्र ये त्र्यस्रे कर्णोभयतः स्थिते तयोः फलैक्यम् फलं स्यात्॥२९॥

क्षेत्रव्यवहारः। ( १६१ ) अर्थः-निश्चय है कि, इस विषम चतुर्भुज क्षेत्रमें कर्णकी दोनों ओर जो जात्य त्रिभुज हैं उनके फलका योग करनेसे फल मालूम हो जाता है ॥ २९ ॥ अनन्तरोक्तक्षेत्रान्तर्द्वयस्रयोः फले ९२४ । २३१० अनयोरैक्यम् ३२३४ तस्य फलम् ॥ अब ही ऊपर जो विषम चतुर्भुज दिखा आये हैं उसीके अन्तर्गत जो दो जात्यत्रिभुज हैं उनका फल जोडनेसे विषम चतुर्भुजका फल मिलेगा; जैसे उपरोक्त क्षेत्रमें एक त्रिभुजके दोनों भुज तो ४० और ५१ हैं और भूमि ७७ है लंब २४ हैं, इसका "लम्बगुणं भूम्यर्द्धं स्पष्टं त्रिभुजे फलं भवति" इस रीतिसे फल जाननेके लिये भूमि ७७ के आधे $\frac{७७}{२}$ को लंब २४ से गुणा किया तब ९२४ हुए. यही फल हुआ, इसी प्रकार दूसर त्रिभुजमें भुज ६८ और ७५ हैं भूमि ७७ लंब ६० है, यहां भी उसी रीतिके अनुसार भूमिके आधे $\frac{७७}{२}$ को लंब ६० से गुणा किया तब २३१० हुए. यही फल है, इन दोनों विषम चतुर्भुजान्तर्गत जात्यत्रिभुजोंके फलों ९२४ । २३१० का योग किया तब ३२३४ हुए यही ऊपर कहे हुए नियमके अनु- सार विषम चतुर्भुजका फल हुआ ॥ समानलंबस्याबाधादिज्ञानाय करणसूत्रं वृत्तद्वयम्- समानलंबविषमचतुर्भुजक्षेत्रमें आबाधा आदि जाननेकी रीति दो श्लोकमें- समानलम्बस्य चतुर्भुजस्य मुखोनभूमिं परिकल्प्य भूमिम् ॥ भुजौ भुजौ त्र्यस्रवदेव साध्ये तस्याबधे लम्बमितिस्ततश्च ॥ ३० ॥ आबाधयोना चतुरस्रभूमिस्तल्लम्बवर्गैक्यपदं श्रुतिः स्यात् ॥ समानलंबे लघुदोः कुयोगान्मुखान्यदोः संयुति- रल्पिका स्यात् ॥ ३१ ॥ अन्वयः-समानलंबस्य चतुर्भुजस्य मुखोनभूमिम् भूमिं परिकल्प्य भुजौ परि- कल्प्य तस्य अबधे त्र्यस्रवत् एव प्रसाध्ये । ततः लंबमितिः च प्रसाध्या ॥ ३०॥ चतुरस्रभूः अवधया ऊना कार्या । तल्लंबवर्गैक्यपदं श्रुतिः स्यात् । समानलंबे मुखान्यदोः संयुतिः लघुदोः कुयोगात् अल्पिका स्यात् ॥ ३१ ॥ अर्थः-समान लंब चतुर्भुजक्षेत्रकी मुखके प्रमाणसे हीन भूमिको भूमि माने और दोनों भुजाओंको भुजा माने फिर अवबाधा त्रिभुजके तुल्य साधे, तदनन्तर लंबप्रमाण ११

( १६२ ) लीलावती । साधे ॥ ३० ॥ चतुर्भुजकी भूमिमें आबाधा घटा दे, जो शेष रहे, उसके वर्गमें लंबका वर्ग जोड दे तब जो अङ्क हों उनका मूल ले वही कर्णका प्रमाण होगा, समान लम्ब विषमचतुर्भुजमें लघुभुज और भूमिके योगसे बडी भुज और मुखका योग कम होता है, अन्यथा समान लंबविषमचतुर्भुज बनता ही नहीं ॥ ३१ ॥ उदाहरणम्- द्विपञ्चाशन्मितव्येकचत्वारिंशन्मितौ भुजौ ॥ मुखं तु पञ्चविंशत्या तुल्यं षष्ट्या मही किल ॥ २०॥ अतुल्यलम्बकं क्षेत्रमिदं पूर्वैरुदाहृतम् ॥ षट्पञ्चाशत्त्रिषष्टिश्च नियते कर्णयोर्मिती ॥ कर्णौ तत्रापरौ ब्रूहि समलम्बञ्च तच्छ्रुती ॥ २१ऽऽ ॥ अन्वयः-यत्र द्विपञ्चाशन्मितव्येकचत्वारिंशन्मितौ भुजौ पञ्चविंशत्या तुल्यम् मुखं किल मही तु षष्ट्या तुल्या षट्पञ्चाशत् त्रिषष्टिः च कर्णयोः मिती नियते इदम् पूर्वैः अतुल्यलंबकं क्षेत्रम् उदाहृतम् । तथापि मन्मते तत्र अपरौ कर्णौ समलंबं तच्छ्रुती च ब्रूहि ॥ २० ॥ २१ ॥ अर्थः-जिस विषमचतुर्भुजमें ५२ और ३९ प्रमाण दो भुज हैं, २५ प्रमाण मुख है, भूमि ६० है। ५६ और ६३ प्रमाण दोनों नियत कर्ण हैं, इस क्षेत्रको प्राचीनोंने समलंब नहीं कहा है, तथापि भास्कराचार्य्यके मतसे उसी क्षेत्रमें दूसरे कर्ण और समानलंब तथा उस कर्णोंका प्रमाण भी कहो ॥ २० ॥ २१ ॥ ऽऽ ॥ आशय यह है कि, इस क्षेत्रमें प्राचीन लोग ५६ और ६३ का नियत कर्ण बताते हैं, और यह भी कहते हैं कि, इसमें समान लंब भी नहीं होते परन्तु भास्कराचार्य्य इन कर्णोंसे भी दूसरे कर्ण लाते हैं, और इसी क्षेत्रमें समान लंब भी लाते हैं और भुजाओंमें कुछ विकार भी नहीं होता,अर्थात् अक्षेत्र भी नहीं होता है ॥ न्यासः-- अत्र बृहत्कर्ण त्रिषष्टिमितं प्रकल्प्य ज्ञातः प्राग्वदन्यः कर्णः ५६ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri

क्षेत्रव्यवहारः । ( १६३ ) अथ षट्पञ्चाशत्स्थाने द्वात्रिं- शन्मितं कर्णं प्रकल्प्य प्राग्वत्सा- ध्यमाने जातं करणीखण्डद्वयम् ६२१ । २७०० अनयोर्मूलयो- २४ २३/४९ । ५१ २४/५६ रैक्यं ७६ २२/२५ द्वितीयः कर्णः फैलाव-इस चतुर्भुजक्षेत्रमें दोनों भुज ३९ । ५२ हैं; मुख २५ है; भूमि ६० है और बडा कर्ण कल्पना किया ६३ इसको इष्ट माना पहले कही हुई रीतिसें दूसरा कर्ण लाये तो ५६ मिले ॥ जब ५६ के स्थानमें कर्णका प्रमाण ३२ कल्पना किया तब पहले कही हुई रीतिके अनुसार दूसरे कर्णके वर्गरूप खण्ड ६२१ । २७०० दो पाये इनका मूल नहीं मिल सकता इस कारण यह करणीगत कर्ण रहा परन्तु पहले कही हुई “वर्गेण महतेष्टेनेत्यादि” रीतिसे आसन्न मूल लिये तब प्रथम खण्डका मूल २४ २३/४९ मिला और दूसरे खण्ड २७०० का मूल ५१ २४/५६ मिला दोनों २४ २३/४९ ५१ २४/५६ का योग किया तब ७६ २२/२५ हुए यही दूसरे कर्णका कुछ न्यूनाधिक प्रमाण है और इस क्षेत्रमें भुजा वही रहे;

( १६४ ) लीलावती । अथ तदेव क्षेत्रञ्चेत्समलंबं तदा न्यासः- मुखोनभूमिं परि- कल्प्य भूमिमिति ज्ञानार्थं त्र्यस्रं क- ल्पितम् ॥ अत्राऽबाधे जातं ३/५ १७२/५ लम्बश्च करणीगतो जातः ३८ ६२२/६२५ अयं तत्र चतुर्भुजसमलंबः लब्धो बाधोनि- तभूमेः समलंबस्य च वर्गयोगः ५०४१ अयं कर्णवर्गः। एवं बृहदाबाधातो द्वितीयकर्णवर्गः २१७६ अनयोरास- न्नमूलकरणेन जातौ कर्णौ ७१ २/५ ४६ १३/२० एवं चतुरस्रे तेष्वेव बाहुष्वन्यौ कर्णौ बहुधा भवतः । एवमनियत- त्वेऽपि नियतावेव कर्णावानीतौ ब्रह्मगुप्ताद्यैः ॥ फैलाव-जब उसी क्षेत्रको समलम्ब बनाया तब पहले कही हुई रीति के अनु- सार अर्थात् पहले यह कह आयें हैं कि; जो समलम्ब विषम चतुर्भुज क्षेत्र है उसके मुखको भूमिमें घटा दे; तब जो शेष रहे उसको भूमि जानें और दोनों भुजोंको भुज मानें; इस रीतिसे एक त्रिभुज बनजायगा तब पहले कही हुई रीति के अनु सार लम्ब लावे; इस रीति के अनुसार मुख २५ को भूमि ६० में घटाया तब ३५ रहे इनको भूमि माना और दोनों भुजोंको भुज माना और लंब भी वही रहा तब क्षेत्रका स्वरूप त्रिभुज हो गया वह यह है- अब यहाँ पहले कही हुई “त्रिभुजे भुजयोरित्यादि” रीतिसे आबाधा लाये तब ३/५ १७२/५ मिली; इनसे लंब साधा तब ३८ ६२२/६२५ हुये यह करणीगत

क्षेत्रव्यवहारः। ( १६६ ) है; यही उस चतुर्भुजमें समलम्ब है जब विषमचतुर्भुजमें यह समलम्ब पड़ता है तब उस क्षेत्रका स्वरूप ऐसा होता है, अब यहां कर्ण जाननेके लिये पहिले कही हुई रीतिके अनुसार छोटी आबाधा ३/५ को भूमिमेंसे घटाया तब २९७/५ शेष रहे, इनके वर्ग ८८२०९/२५ में लम्बके वर्ग ३६०९६/२५ को जोड़ा तब १२४३०५/२५ हुए; वहां अंशमें छेदका भाग देनेसे मिले ५०४९ इसका ठीक मूल नहीं मिलता; परन्तु आसन्नमूल लिया तब ७१ ९/१० मिले, यह एक कर्ण हुआ, यह छोटी आबाधाकी ओरके लम्बके शिरसे लग रहा है; इसी प्रकार दूसरी आबाधाको भूमिमें घटा- कर पूर्वोक्त क्रिया करनेसे दूसरे कर्णका प्रमाण ४६ १३/१० हुआ। इस प्रकार समलम्ब विषम चतुर्भुजमें अनेक प्रकारके कर्ण हो सकते हैं, इस प्रकार यद्यपि कर्ण अनियत हैं तथापि ब्रह्मगुप्त आदि प्राचीनोंने नियत ही कर्ण माने हैं॥ तदानयनं यथा- ब्रह्मगुप्त आदिकोंने जिस प्रकार नियत कर्ण माने हैं, सो साधते हैं- कर्णाश्रितभुजघातैक्यमुभयथान्योन्यभाजितं गुणयेत् ॥ योगेन भुजप्रतिभुजबधयोः कर्णौ पदे विषमे ॥ ३२ ॥ अन्वयः-विषमे उभयथा कर्णाश्रितभुजघातैक्यम् भुजप्रतिभुजवधयोः योगेन गुणयेत् । तत् अन्योन्यभाजितं कुर्य्यात् । तदा उभयत्र फल्योः पदे कर्णौ स्तः॥३२॥ अर्थः-विषम चतुर्भुजमें दोनों ओरसे कर्णको स्पर्श करनेवाली दोनों भुजाओंके घातका योगकर उसको भूमि और मुखके घातमें दोनों भुजोंका घात जोडकर जो अङ्क हों उनसे अलग अलग गुणा करे, तब जो दोनों स्थानमें गुणनफल हों उनमें बिनगुणे उन ही अङ्कोंका परस्पर भाग दे तब जो दोनों स्थानोंमें फल हों उनका मूल ले तब दोनों कर्णलब्धि होते हैं॥ ३२ ॥

(१६६) लीलावती। न्यासः-कर्णाश्रितभुजघातेति एकवारमनयो २५। ३९ घातः ९७५ तथा ५२। ६० अनयोर्घातः ३१२० घातयोर्द्वयोरैक्यम्। ४०९५ तथा द्वितीयवार २५। ५२ मनयो र्घाते जातम् १३०० तथा द्वितीयवार ३९। ६० मनयोर्घाते २३४० घातयोर्द्वयोरैक्यम् ३६४० एतदैक्यं भुज- प्रतिभुजः ५२। ३९ घातः २०२८ पश्चात् २५। ६० अनयोर्वधः १५०० तयोरैक्यं ३५२८ अनेनैक्येन ३६४० गुणितं जातं पूर्वैक्यम् १२८४-१९२० प्रथमकर्णाश्रितभुजघातैक्येन ४०९५ भक्तं लब्धम् ३१३६ अस्य मूलम् ५६ एककर्णः ॥ तथा द्वितीय- कर्णार्थम् प्रथमकर्णाश्रितभुजघातैक्यम् ४०९५ भुज- प्रतिभुजवधयोगः ३५२८ गुणितं जातम् १४४४७१६० अन्यकर्णाश्रितभुजघातैक्येन ३६४० भक्तं लब्धम् ३९६९ अस्य मूलम् ६३ द्वितीयः कर्णः । अस्मिन् विषये क्षेत्रकर्णसाधनम्। अस्य कर्णानयनस्य प्रक्रियागौरवम् ॥ फैलाव-ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार प्राचीनोंके मतसे नियत कर्ण लानेके लिये यहां जो त्रिभुज बन गये हैं उनमेंसे एकबार एक त्रिभुजके दोनों भुजों ३९। २५ का घात किया तब ९७५ हुए और दूसरे त्रिभुजके दोनों भुजों ५२। ६० का घात किया तब ३१२० हुए; इन दोनों घातों ९७५। ३१२० का योग किया तब ४०९५ हुए, फिर, दूसरा कर्ण डाला तब एक त्रिभुजके भुजों २५। ५२ का

क्षेत्रव्यवहारः। ( १६७ ) घात किया तब १३०० हुए तथा दूसरे त्रिभुजके भुजों ३९ । ६० का घात किया तब २३४० हुए; इन दोनों घातों १३०० । २३४० का योग किया तब ३६४० हुए; इस प्रकार ४०९६ । ३६४० यह दो घात योग हुए; इन्हें तो अलग लिखा; फिर भूमि और मुख ६० । २५ का घात किया तब १५०० हुए; तदनन्तर दोनों भुजों ३९ । ५२ को घात किया तब २०२८ हुए; इन दोनों भुजप्रतिभुज घातों १५०० । २०२८ को जोडा तब ३५२८ हुए; इन से पहले दो स्थानोंमें लिखे हुए अङ्कों ४०९६ । ३६४० से गुणा किया तब क्रमसे दोनोंका गुणनफल १४४४७१६० । १२८४१९२० हुए; इनमें अलग लिखे हुए दूसरे अङ्क ३६४० का पहले गुणनफल १४४४७१६० में भाग दिया तब ३९६९ मिले; इनका मूल लिया तब ६३ मिले फिर अलग लिखे हुए पहले अङ्कों ४०९६ का दूसरे गुणनफल १२८४१९२० में भाग लिया तब ३१३६ मिले; इनका मूल लिया तब ५६ मिले यही दोनों कर्णों ६३।५६ का प्रमाण है ॥ लघुप्रक्रियाप्रदर्शनद्वारेणाह- उन ही नियत कर्णोंके लानेकी रीति अतिलघुप्रक्रियाके द्वारा दिखाते हैं- अभीष्टजात्यद्वयबाहुकोटयः परस्परं कर्णहता भुजा इति ॥ चतुर्भुजं यद्विषमं प्रकल्पितं श्रुती तु तत्र त्रिभुजद्वया- त्ततः ॥ ३३ ॥ बाह्वोर्वधः कोटिवधेन युक्तस्यादेका श्रुतिः कोटिभुजावधैक्यम् ॥ अन्या लघौ सत्यपि साधनेऽस्मि- न्पूर्वैः कृतं यद्गुरु तन्न विद्मः ॥ ३४ ॥ अन्वयः-यत् विषमं चतुर्भुजम् प्रकल्पितं तत्र श्रुती तु त्रिभुजद्वयात् सुखेन स्याताम् अभीष्टजात्यद्वयबाहुकोटयः परस्परं कर्णहताः भुजाः भवन्ति । ततः कोटिवधेन युक् बाह्वोः वधः एका श्रुतिः स्यात् । कोटिभुजावधैक्यम् अन्या श्रुतिः स्यात् । इति अस्मिन् लघौ साधने सति अपि पूर्वैः यत् गुरु कृतं वयं तत् न विद्मः ॥ ३३ ॥३४॥ अर्थः-जो एक विषम चतुर्भुज कल्पना किया है, तहां अभीष्ट जो दो जात्य त्रिभुज हैं; उनकी भुजकोटिका कर्णसे घात करनेसे भुज होते हैं; अर्थात् एक त्रिभुजके भुजसे दूसरे त्रिभुजके कर्णको गुणा करे तब जो अङ्क हों, सोई विषम चतुर्भुजके एक भुजका प्रमाण है, दूसरे त्रिभुजके भुजसे पहलेके कर्णको गुणा करनेपर जो अङ्क हों, वही दूसरे भुजका प्रमाण है; पहले त्रिभुजकी कोटिसे दूसरेके कर्णको गुणा करनेसे जो अङ्क हों, वह तीसरे भुजका प्रमाण होगा। तथा दूसरे जात्यकी कोटिसे पहलेके कर्णको गुणा करनेपर जो अङ्क हों, वह चौथेभुजका

(१६८) लीलावती। प्रमाण होता है तदनंतर दोनों त्रिभुजोंके भुजाओंके घातमें कोटियोंका घात जोडनेसे जो अंक हों वह एक कर्णका प्रमाण होता है पहले जात्यकी कोटि और दूसरेके भुजका घात और दूसरेकी कोटि पहले भुजको घातका योग करनेसे जो अङ्क हों वह दूसरे कर्णका प्रमाण होता है, इस प्रकार दोनों त्रिभुजोंसे सुखसे अनायास कर्ण सिद्ध हो जाते हैं; इस सरल रीतिके होनेपर भी ब्रह्मगुप्त आदि आचायोंने जो अति- विस्तारयुक्त रीति नियत कर्ण लानेकी लिखी है, सो हम नहीं जानते कि, क्यों बनाई है ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ यह प्राचीनोंपर भास्कराचार्यका आक्षेप है; जात्यक्षेत्रद्वयम् एतयोरितरेतरकर्णहता न्यासः- भुजाः कोटयः । इतरे- तरकर्णहताः कोटयो भुजा इति कृते जातं २५ । ६० । ५२ ३९ तेषां महती भूः । लघुमुखम् । इतरौ बाहू । इति प्रकल्प्य क्षेत्रदर्शनम् । इमौ कर्णौ म- हताऽऽयासेनानीतौ ६३।५६ अस्यैव जात्यद्वयस्योत्तरो- त्तरभुजकोट्योर्घातौ जातौ ३६ । २० अनयोरैक्यमेकः कर्णः ५६ बाह्वोः ३ । ५ कोट्योश्च ४ । १२ घातौ १५। ४८ अनयोरैक्यमन्यः कर्णः ६३ । एवं श्रुती स्यातामिति सुखेन जाते ॥ फैलाव-पहले कहे हुए क्षेत्रको दो जात्यत्रिभुज करके सिद्ध करते हैं, इन दोनों क्षेत्रोंके भुजसे कर्णको कर्णसे भुजको "अभीष्टजात्यद्वयेत्या- दि" इस रीतिसे परस्पर गुणा किया; अर्थात् एक त्रिभुजके भुज ३ से दूसरेक कर्ण १३ को गुणा किया तब ३९ हुए यह उसी विषम चतुर्भुजमें एक भुजका प्रमाण है; फिर दूसरेके भुज ५ से पहलेके कर्ण ५ को गुणा किया तब २५ हुए; यही वहाँ दूसरा. भुज है, फिर

क्षेत्रव्यवहारः । ( १६९ ) पहले की कोटि ४ से दूसरेके कर्ण १३ को गुणा किया तब ५२ हुए; यही वहां तीसरा भुज है तदनन्तर दूसरेकी कोटि १२ से पहलेके कर्ण ५ को गुणा किया तब ६० हुए; यही तहां चौथा भुज है; इस प्रकार चारों ३९ । २५।५२ । ६० भुज सिद्ध हो जाते हैं; इनमें जो सबसे अधिक अंक ६० है; वह भूमिका प्रमाण है और सबसे कम अङ्क २५ है वह मुखका प्रमाण है; शेष दोनों ३९ । ५२ भुजोंके प्रमाण हैं; इस प्रकार यदि विषमचतुर्भुज बनाया गया तब वही पूर्वोक्त बन गया; यहाँ यह ६३ । ५६ दोनों कर्ण प्राचीनोंने बड़े गौरवसे सिद्ध किये हैं परन्तु हम इन ही दोनों कर्णोंको अति सरल रीतिसे लाते हैं उन ही दोनों जात्यत्रिभुजोंके भुज और कोटियोंका उत्तरोत्तर घात किया अर्थात् पहलेका भुज ३ और दूसरेकी कोटि १२ का घात किया तब ३६ हुए; और पहलेकी कोटि ४ और दूसरेका भुज ५ इनका घात किया तब २० हुए, इन दोनों गुणनफलों ३६ । २० को जोडा तब ५६ हुए यही पहला कर्ण है फिर दोनोंके घात और दोनोंके कोटियोंके घातका योग किया जैसे दोनोंकी भुजों ३ । ५ का घात किया, तब १५ हुए दोनोंकी कोटियों ४ । १२ का घात किया तब ६३ हुए इन दोनों भुज घात १५ और कोटि घात ४८ का योग किया तब ६३ हुए यही दूसरे कर्णका प्रमाण है; इस प्रकार अनायास लघु रीतिसे वही दोनों ६३ । ५६ लब्ध हो गये ॥ अब इसी विषमचतुर्भुजसे उन दोनों जात्यत्रिभुजोंके निकालनेकी रीति लिखते हैं, जिनसे यह विषम बना था। किसी कर्ण अंकका अर्थात् दो अंकोंके वर्गयोगके मूलका मुख और भूमिमें अर्थात् सबसे छोटे और सबसे बड़े भुजमें भाग देय; तब जो लब्धि मिले वही भुज और कोटि हैं फिर इन ही लाये हुए भुज और कोटिसे कर्णका प्रमाण पहले कही हुई “तत्कृत्योर्योगपदं कर्णः” इस रीतिसे लावे और इसी लाये हुए कर्णका विषमचतुर्भुजके बाकी बचे दोनों भुजोंमें भाग दे; तब जो लब्धि मिले वह दूसरे त्र्यस्रके भुजकोटिका प्रमाण होगा यह वही दूसरा क्षेत्र है कि, जिसके कर्णका भूमि और मुखमें भाग दिया था अर्थात् पहले माना हुआ कर्णही दूसरे क्षेत्रका कर्ण होता है, वही क्षेत्रपर दिखाते हैं ॥ यहां पहले पांच ५ को कर्ण माना इसका सबसे छोटे भुज २५ में भाग दिया तब ५ मिले सबसे बड़े ६० में

४. खात, चिति, क्रकच व राशि-व्यवहार (आयतन)

( १७० ) लीलावती । भाग दिया तब १२ मिले यही एक जात्यत्रिभुजके भुज ५ कोटि १२ हुए; इन ही ५ । १२ से कर्ण लानेके लिये "तत्कृत्योरित्यादि" इस रीतिके अनुसार दोनों ५ । १२ के वर्गों २५ । १४४ का योग किया तब १६९ हुए; इनका मूल लिया तब १३ मिले यही कर्णका प्रमाण है; इस प्रकार एक जात्यत्रिभुज बन गया तदनन्तर विषमचतुर्भुजके शेष बचे हुए दोनों भुजों ३९ । ५२ में अब ही लाय हुए कर्ण १३ का भाग दिया तब ३ और ४ लब्धि हुए यही दूसरे त्र्यस्रके भुज कोटिका मान है, इसका कर्ण तौ यही ५ है जो कि; प्रथमही माना था और जिसका मुख तथा भूमिमें भाग दिया था, इस प्रकार दूसरा जात्य भी बन गया ॥ अथ यदि पार्श्वभुजमुखयोर्व्यस्तं कृत्वा न्यस्तं क्षेत्रं तदा न्यासः- ३९ २५ ५२ तदा जात्यद्वयकर्णयोर्वधः ६५ द्वितीयः कर्णः ॥ ६० फैलाव-अब यदि इसी क्षेत्रके मुख भूमिसे एक एकको भुजाँसे पलटा जैसे मुख २५ को भुज ३९ के स्थानमें रक्खा और ६० को ५२ के १५ ३९ स्थानमें रक्खा, तब जहां कर्ण ६३ आता था २ ५ ५२ तहां दोनों जात्यौंक कर्णौका घात फल होता है, तहां ५६ का कर्ण तो पहली ही रीतिसे लाये; और दूसरा कर्ण लानेके अर्थ दोनों ५६ ६० जात्यौंक कर्णों ५ । १३ का घात किया तब ६५ हुए, यही दूसरे कर्णका प्रमाण हुआ अर्थात् केवल दूसरा कर्ण ही बदल गया ॥ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri