लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
पृष्ठ 174, कुल 268 में से
संदर्भ में पढ़ें(१५८) लीलावती । न स्यात्। तथा तदन्यलम्बात् कथञ्चित् अपि लघुः न स्यात् । सुधिया इदं ज्ञात्वा इष्टकर्णः प्रकल्प्यः ॥ २८ ॥ ऽऽ ॥ अर्थः-कर्णका आश्रय करनेवाली छोटी भुजाओंके योगको भूमि कल्पना करे उससे बाकी बची रेखाओंको भुज कल्पना करे, फिर लम्ब साधन करे दूसरा कर्ण इस प्रकार कल्पना करे जैसे कर्ण अपनी भूमिसे अधिक न हो और लम्बसे किसी प्रकार न्यून न हो, बुद्धिमान् यह जानकर इष्ट कर्ण कल्पना करे ॥ २८॥ ऽऽ ॥ आशय यह है कि, विषमचतुर्भुजमें जिन इच्छित कर्णोंकी कल्पना करनेसे चतुर्भु- जका स्वरूप न बिगडे, उन कर्णोंका न्यूनसे न्यून और बडेसे बडा करनेकी यह रीति है कि, जिस कर्णको कल्पना किया चाहते हैं उसके दोनों ओर जो दो दो भुज हैं उनका अलग अलग योग करे, उन ही दोनों योगोंमें जो योग स्वल्प हो उससे भी न्यून कर्ण इष्ट कल्पना करे तो चतुर्भुजका रूप ठीक रहेगा । उस ही स्वल्पयोगके तुल्य इष्ट कर्ण कल्पना करनेसे चतुर्भुज बनाया जाय तो अक्षेत्र हो जायगा, आशय यह है कि, कर्णको बडा करनेकी मर्यादा तहांतक है जहांतक पहिले जो दोनों योग कर आये हैं, उनमें जो छोटा योग है उससे कुछ छोटा हो और छोटेसे छोटा करनेकी मर्यादा तहांतक है, जहांतक जिस कर्णको जानना चाहते हैं उससे दूसरे कर्णके आस पास जो दो दो भुज हैं उनका योग करे और योगोंमें जो छोटा हो उसको भूमि माने और उस भूमिमें जहां भुजोंका योग हुआ है वहां चिह्न कर दे, शेष दो २ भुजोंको भुज माने तब त्रिभुजकी कल्पित आकृति बनती है। तब इसी त्रिभुजमें पहले कही हुई रीतिसे आबाधा और लंब साधे, आबाधा और उधरहीकी भूमिका जो भुज है, उसका अन्तर करनेसे जो अङ्क मिले उनके वर्गमें लम्बका वर्ग जोड दे, तब जो अङ्क हों उनका मूल कर्ण होता है परन्तु इतना कर्ण कल्पना करनेसे त्रिभुज हो जायगा और यदि इससे कुछ अधिक कर्ण कल्पना किया जाय तो चतुर्भुजका स्वरूप बना रहेगा ॥ चतुर्भुजे हि एकान्तरकोणावाक्रम्य संकोच्यमानं त्रिभु- जत्वं याति तत्रैककोणे लग्नलघुभुजयोरैक्यं भूमिरितरौ भुजौ प्रकल्प्य साधितं स च लम्बादूनः सङ्कोच्यमानः कर्णः कथञ्चिदपि न स्यात्तदितरो भूमेरधिको न स्यादे- वमुभयत्राऽपि तदनुक्तमपि बुद्धिमता ज्ञायते ॥ इसका वही अभिप्राय है जो कि, अभी ऊपर सूत्रका कहचुके हैं बुद्धिमान कार्य्यवश वे दिखाई बात भी जान सकता है ॥