भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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क्षेत्रव्यवहारः। (१५७) न्यासः- तत्र चतुर्भुजे सव्यभुजाग्राद्दक्षिण- भुजमूलगामिनः कर्णस्य मानं कल्पि- तम् ७७ तत्कर्णरेखावच्छिन्नस्य क्षेत्रस्य मध्ये कर्णरेखोभयतो ये त्र्यस्रे उत्पन्ने तयोः कर्णः भूमिस्तदितरौ च भुजौ प्रकल्प्य प्राग्वल्लम्ब आबाधा च साधिता तद्दर्शनं लम्बः ६० द्वितीयलंबः २४ आबाधयो ४५ ३२ रेकककुप्स्थयोरन्तरस्य १३ कृते १६९ लम्बैक्य ८४ कृतेश्च ७०५६ योगः ७२२५ तस्य पदं द्वितीयकर्णप्रमाणम् ॥ ८५ ॥ फैलाव-तिसी चतुर्भुज क्षेत्रमें बांई भुजाके अग्रभागसे दक्षिण भुजके मूलमें आनेवाले कर्णका प्रमाण कल्पना किया; ७७ उस कर्णकी रेखायुक्त क्षेत्रके मध्यमें कर्णके रेखाकी दोनों ओर जो दो जात्य त्रिभुज हैं उनके कर्णको भूमि जानना, तदितर रेखाओंको भुज जानना और पहले कही हुई रीतिसे लम्ब और आबाधा सिद्ध होती है वही दिखाते हैं; लम्ब प्रमाण ६० दूसरे लम्बका प्रमाण २४ दोनों आबाधा ४५ । ३२ एक दिशामें स्थित आबाधाओंके अन्तर १३ का वर्ग किया तब १६९ लम्ब योग ८४ इसका वर्ग ७०५६ अन्तरके और लम्ब योगके वर्गों १६९ । ७०५६ का योग ७२२५ इसका मूल ८५ हुआ यही दूसरे कर्णक प्रमाण है ॥ अत्रेष्टकर्णकल्पने विशेषोक्तिसूत्रं सार्द्धं वृत्तम्- इस चतुर्भुजमें इष्टकर्ण कल्पना करनेकी विशेष रीति डेढ श्लोकमें- कर्णाश्रितं स्वल्पभुजैक्यमुर्वीं प्रकल्प्य तच्छेषमितौ च बाहू ॥ साध्योऽवलम्बोऽथ तथान्यकर्णः स्वोर्व्याः कथं- चिच्छ्रवणो न दीर्घः ॥ २८ ॥ तदन्यलम्बान्न लघुस्त- थेदं ज्ञात्वेष्टकर्णः सुधिया प्रकल्प्यः ॥ SS ॥ अन्वयः-कर्णाश्रितं स्वल्पभुजैक्यम् उर्वीम् प्रकल्प्य तच्छेषमितौ च बाहू प्रकल्प्य अवलंबः साध्यः । अथ अन्यकर्णः तथा प्रकल्प्यः यथा श्रवणः स्वोर्व्याः दीर्घः