लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(१६८) लीलावती। प्रमाण होता है तदनंतर दोनों त्रिभुजोंके भुजाओंके घातमें कोटियोंका घात जोडनेसे जो अंक हों वह एक कर्णका प्रमाण होता है पहले जात्यकी कोटि और दूसरेके भुजका घात और दूसरेकी कोटि पहले भुजको घातका योग करनेसे जो अङ्क हों वह दूसरे कर्णका प्रमाण होता है, इस प्रकार दोनों त्रिभुजोंसे सुखसे अनायास कर्ण सिद्ध हो जाते हैं; इस सरल रीतिके होनेपर भी ब्रह्मगुप्त आदि आचायोंने जो अति- विस्तारयुक्त रीति नियत कर्ण लानेकी लिखी है, सो हम नहीं जानते कि, क्यों बनाई है ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ यह प्राचीनोंपर भास्कराचार्यका आक्षेप है; जात्यक्षेत्रद्वयम् एतयोरितरेतरकर्णहता न्यासः- भुजाः कोटयः । इतरे- तरकर्णहताः कोटयो भुजा इति कृते जातं २५ । ६० । ५२ ३९ तेषां महती भूः । लघुमुखम् । इतरौ बाहू । इति प्रकल्प्य क्षेत्रदर्शनम् । इमौ कर्णौ म- हताऽऽयासेनानीतौ ६३।५६ अस्यैव जात्यद्वयस्योत्तरो- त्तरभुजकोट्योर्घातौ जातौ ३६ । २० अनयोरैक्यमेकः कर्णः ५६ बाह्वोः ३ । ५ कोट्योश्च ४ । १२ घातौ १५। ४८ अनयोरैक्यमन्यः कर्णः ६३ । एवं श्रुती स्यातामिति सुखेन जाते ॥ फैलाव-पहले कहे हुए क्षेत्रको दो जात्यत्रिभुज करके सिद्ध करते हैं, इन दोनों क्षेत्रोंके भुजसे कर्णको कर्णसे भुजको "अभीष्टजात्यद्वयेत्या- दि" इस रीतिसे परस्पर गुणा किया; अर्थात् एक त्रिभुजके भुज ३ से दूसरेक कर्ण १३ को गुणा किया तब ३९ हुए यह उसी विषम चतुर्भुजमें एक भुजका प्रमाण है; फिर दूसरेके भुज ५ से पहलेके कर्ण ५ को गुणा किया तब २५ हुए; यही वहाँ दूसरा. भुज है, फिर