भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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क्षेत्रव्यवहारः। ( १६७ ) घात किया तब १३०० हुए तथा दूसरे त्रिभुजके भुजों ३९ । ६० का घात किया तब २३४० हुए; इन दोनों घातों १३०० । २३४० का योग किया तब ३६४० हुए; इस प्रकार ४०९६ । ३६४० यह दो घात योग हुए; इन्हें तो अलग लिखा; फिर भूमि और मुख ६० । २५ का घात किया तब १५०० हुए; तदनन्तर दोनों भुजों ३९ । ५२ को घात किया तब २०२८ हुए; इन दोनों भुजप्रतिभुज घातों १५०० । २०२८ को जोडा तब ३५२८ हुए; इन से पहले दो स्थानोंमें लिखे हुए अङ्कों ४०९६ । ३६४० से गुणा किया तब क्रमसे दोनोंका गुणनफल १४४४७१६० । १२८४१९२० हुए; इनमें अलग लिखे हुए दूसरे अङ्क ३६४० का पहले गुणनफल १४४४७१६० में भाग दिया तब ३९६९ मिले; इनका मूल लिया तब ६३ मिले फिर अलग लिखे हुए पहले अङ्कों ४०९६ का दूसरे गुणनफल १२८४१९२० में भाग लिया तब ३१३६ मिले; इनका मूल लिया तब ५६ मिले यही दोनों कर्णों ६३।५६ का प्रमाण है ॥ लघुप्रक्रियाप्रदर्शनद्वारेणाह- उन ही नियत कर्णोंके लानेकी रीति अतिलघुप्रक्रियाके द्वारा दिखाते हैं- अभीष्टजात्यद्वयबाहुकोटयः परस्परं कर्णहता भुजा इति ॥ चतुर्भुजं यद्विषमं प्रकल्पितं श्रुती तु तत्र त्रिभुजद्वया- त्ततः ॥ ३३ ॥ बाह्वोर्वधः कोटिवधेन युक्तस्यादेका श्रुतिः कोटिभुजावधैक्यम् ॥ अन्या लघौ सत्यपि साधनेऽस्मि- न्पूर्वैः कृतं यद्गुरु तन्न विद्मः ॥ ३४ ॥ अन्वयः-यत् विषमं चतुर्भुजम् प्रकल्पितं तत्र श्रुती तु त्रिभुजद्वयात् सुखेन स्याताम् अभीष्टजात्यद्वयबाहुकोटयः परस्परं कर्णहताः भुजाः भवन्ति । ततः कोटिवधेन युक् बाह्वोः वधः एका श्रुतिः स्यात् । कोटिभुजावधैक्यम् अन्या श्रुतिः स्यात् । इति अस्मिन् लघौ साधने सति अपि पूर्वैः यत् गुरु कृतं वयं तत् न विद्मः ॥ ३३ ॥३४॥ अर्थः-जो एक विषम चतुर्भुज कल्पना किया है, तहां अभीष्ट जो दो जात्य त्रिभुज हैं; उनकी भुजकोटिका कर्णसे घात करनेसे भुज होते हैं; अर्थात् एक त्रिभुजके भुजसे दूसरे त्रिभुजके कर्णको गुणा करे तब जो अङ्क हों, सोई विषम चतुर्भुजके एक भुजका प्रमाण है, दूसरे त्रिभुजके भुजसे पहलेके कर्णको गुणा करनेपर जो अङ्क हों, वही दूसरे भुजका प्रमाण है; पहले त्रिभुजकी कोटिसे दूसरेके कर्णको गुणा करनेसे जो अङ्क हों, वह तीसरे भुजका प्रमाण होगा। तथा दूसरे जात्यकी कोटिसे पहलेके कर्णको गुणा करनेपर जो अङ्क हों, वह चौथेभुजका