भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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क्षेत्रव्यवहारः । ( १६३ ) अथ षट्पञ्चाशत्स्थाने द्वात्रिं- शन्मितं कर्णं प्रकल्प्य प्राग्वत्सा- ध्यमाने जातं करणीखण्डद्वयम् ६२१ । २७०० अनयोर्मूलयो- २४ २३/४९ । ५१ २४/५६ रैक्यं ७६ २२/२५ द्वितीयः कर्णः फैलाव-इस चतुर्भुजक्षेत्रमें दोनों भुज ३९ । ५२ हैं; मुख २५ है; भूमि ६० है और बडा कर्ण कल्पना किया ६३ इसको इष्ट माना पहले कही हुई रीतिसें दूसरा कर्ण लाये तो ५६ मिले ॥ जब ५६ के स्थानमें कर्णका प्रमाण ३२ कल्पना किया तब पहले कही हुई रीतिके अनुसार दूसरे कर्णके वर्गरूप खण्ड ६२१ । २७०० दो पाये इनका मूल नहीं मिल सकता इस कारण यह करणीगत कर्ण रहा परन्तु पहले कही हुई “वर्गेण महतेष्टेनेत्यादि” रीतिसे आसन्न मूल लिये तब प्रथम खण्डका मूल २४ २३/४९ मिला और दूसरे खण्ड २७०० का मूल ५१ २४/५६ मिला दोनों २४ २३/४९ ५१ २४/५६ का योग किया तब ७६ २२/२५ हुए यही दूसरे कर्णका कुछ न्यूनाधिक प्रमाण है और इस क्षेत्रमें भुजा वही रहे;