लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६२ ) लीलावती । साधे ॥ ३० ॥ चतुर्भुजकी भूमिमें आबाधा घटा दे, जो शेष रहे, उसके वर्गमें लंबका वर्ग जोड दे तब जो अङ्क हों उनका मूल ले वही कर्णका प्रमाण होगा, समान लम्ब विषमचतुर्भुजमें लघुभुज और भूमिके योगसे बडी भुज और मुखका योग कम होता है, अन्यथा समान लंबविषमचतुर्भुज बनता ही नहीं ॥ ३१ ॥ उदाहरणम्- द्विपञ्चाशन्मितव्येकचत्वारिंशन्मितौ भुजौ ॥ मुखं तु पञ्चविंशत्या तुल्यं षष्ट्या मही किल ॥ २०॥ अतुल्यलम्बकं क्षेत्रमिदं पूर्वैरुदाहृतम् ॥ षट्पञ्चाशत्त्रिषष्टिश्च नियते कर्णयोर्मिती ॥ कर्णौ तत्रापरौ ब्रूहि समलम्बञ्च तच्छ्रुती ॥ २१ऽऽ ॥ अन्वयः-यत्र द्विपञ्चाशन्मितव्येकचत्वारिंशन्मितौ भुजौ पञ्चविंशत्या तुल्यम् मुखं किल मही तु षष्ट्या तुल्या षट्पञ्चाशत् त्रिषष्टिः च कर्णयोः मिती नियते इदम् पूर्वैः अतुल्यलंबकं क्षेत्रम् उदाहृतम् । तथापि मन्मते तत्र अपरौ कर्णौ समलंबं तच्छ्रुती च ब्रूहि ॥ २० ॥ २१ ॥ अर्थः-जिस विषमचतुर्भुजमें ५२ और ३९ प्रमाण दो भुज हैं, २५ प्रमाण मुख है, भूमि ६० है। ५६ और ६३ प्रमाण दोनों नियत कर्ण हैं, इस क्षेत्रको प्राचीनोंने समलंब नहीं कहा है, तथापि भास्कराचार्य्यके मतसे उसी क्षेत्रमें दूसरे कर्ण और समानलंब तथा उस कर्णोंका प्रमाण भी कहो ॥ २० ॥ २१ ॥ ऽऽ ॥ आशय यह है कि, इस क्षेत्रमें प्राचीन लोग ५६ और ६३ का नियत कर्ण बताते हैं, और यह भी कहते हैं कि, इसमें समान लंब भी नहीं होते परन्तु भास्कराचार्य्य इन कर्णोंसे भी दूसरे कर्ण लाते हैं, और इसी क्षेत्रमें समान लंब भी लाते हैं और भुजाओंमें कुछ विकार भी नहीं होता,अर्थात् अक्षेत्र भी नहीं होता है ॥ न्यासः-- अत्र बृहत्कर्ण त्रिषष्टिमितं प्रकल्प्य ज्ञातः प्राग्वदन्यः कर्णः ५६ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri