लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षेत्रव्यवहारः। ( १६१ ) अर्थः-निश्चय है कि, इस विषम चतुर्भुज क्षेत्रमें कर्णकी दोनों ओर जो जात्य त्रिभुज हैं उनके फलका योग करनेसे फल मालूम हो जाता है ॥ २९ ॥ अनन्तरोक्तक्षेत्रान्तर्द्वयस्रयोः फले ९२४ । २३१० अनयोरैक्यम् ३२३४ तस्य फलम् ॥ अब ही ऊपर जो विषम चतुर्भुज दिखा आये हैं उसीके अन्तर्गत जो दो जात्यत्रिभुज हैं उनका फल जोडनेसे विषम चतुर्भुजका फल मिलेगा; जैसे उपरोक्त क्षेत्रमें एक त्रिभुजके दोनों भुज तो ४० और ५१ हैं और भूमि ७७ है लंब २४ हैं, इसका "लम्बगुणं भूम्यर्द्धं स्पष्टं त्रिभुजे फलं भवति" इस रीतिसे फल जाननेके लिये भूमि ७७ के आधे $\frac{७७}{२}$ को लंब २४ से गुणा किया तब ९२४ हुए. यही फल हुआ, इसी प्रकार दूसर त्रिभुजमें भुज ६८ और ७५ हैं भूमि ७७ लंब ६० है, यहां भी उसी रीतिके अनुसार भूमिके आधे $\frac{७७}{२}$ को लंब ६० से गुणा किया तब २३१० हुए. यही फल है, इन दोनों विषम चतुर्भुजान्तर्गत जात्यत्रिभुजोंके फलों ९२४ । २३१० का योग किया तब ३२३४ हुए यही ऊपर कहे हुए नियमके अनु- सार विषम चतुर्भुजका फल हुआ ॥ समानलंबस्याबाधादिज्ञानाय करणसूत्रं वृत्तद्वयम्- समानलंबविषमचतुर्भुजक्षेत्रमें आबाधा आदि जाननेकी रीति दो श्लोकमें- समानलम्बस्य चतुर्भुजस्य मुखोनभूमिं परिकल्प्य भूमिम् ॥ भुजौ भुजौ त्र्यस्रवदेव साध्ये तस्याबधे लम्बमितिस्ततश्च ॥ ३० ॥ आबाधयोना चतुरस्रभूमिस्तल्लम्बवर्गैक्यपदं श्रुतिः स्यात् ॥ समानलंबे लघुदोः कुयोगान्मुखान्यदोः संयुति- रल्पिका स्यात् ॥ ३१ ॥ अन्वयः-समानलंबस्य चतुर्भुजस्य मुखोनभूमिम् भूमिं परिकल्प्य भुजौ परि- कल्प्य तस्य अबधे त्र्यस्रवत् एव प्रसाध्ये । ततः लंबमितिः च प्रसाध्या ॥ ३०॥ चतुरस्रभूः अवधया ऊना कार्या । तल्लंबवर्गैक्यपदं श्रुतिः स्यात् । समानलंबे मुखान्यदोः संयुतिः लघुदोः कुयोगात् अल्पिका स्यात् ॥ ३१ ॥ अर्थः-समान लंब चतुर्भुजक्षेत्रकी मुखके प्रमाणसे हीन भूमिको भूमि माने और दोनों भुजाओंको भुजा माने फिर अवबाधा त्रिभुजके तुल्य साधे, तदनन्तर लंबप्रमाण ११