भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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क्षेत्रव्यवहारः। (१७१) अथ सूचीक्षेत्रोदाहरणम्- अब सूचीक्षेत्रका उदाहरण लिखते हैं- क्षेत्रे यत्र शतत्रयं (३००) क्षितिमितिस्तत्त्वेन्दु (१२५) तुल्यं मुखं बाहू खोत्कृतिभिः (२६०) शराति- (१९५) धृतिभिस्तुल्यौ च तत्र श्रुती ॥ एका खाष्टयमैः (२८०) समा तिथिगुणै (३१५) रन्याथ तल्लम्बकौ तुल्यौ गोधृ- तिभि (१८९) स्तथा जिनयमै (२२४) र्योगाच्छ्र- वोर्लम्बयोः ॥ २२ ॥ तत्खण्डे कथयाधरे श्रवणयोर्योगाच्च लम्बावधे तत्सूची निजमार्गवृद्धभुजयोर्योगाद्यथा स्या त्ततः ॥ साबाधं वद लम्बकं च भुजयोः सूच्याः प्रमाणे च के सर्वं गाणितिक प्रचक्ष्व नितरां क्षेत्रेऽत्र दक्षोऽसि चेत् ॥२३॥ अन्वयः-यत्र क्षेत्रे क्षितिमितिः शतत्रयम् । मुखं तत्त्वेन्दुभिः तुल्यम् । खोत्कृ- तिभिः शरातिधृतिभिः च तुल्यौ बाहू तत्र श्रुती खाष्टयमैः समा एका । तिथि गुणैः समा अन्या । अथ गोधृतिभिः तथा जिनयमैः तुल्यौ तल्लम्बकौ तत्र श्रवो- लम्बयोः योगात् अधरे तत्खण्डे श्रवणयोः योगात् लम्बावधे च कथया तत्सूचीनिज- मार्गवृद्धियोगात् यथा स्यात् तथा ततः साबाधं लम्बकम् वद । सूच्याः भुजयोः प्रमाणे च के हे गाणितिक ! चेत् अत्र क्षेत्रे नितरां दक्षः असि तर्हि पूर्वोक्तं सर्वम् प्रचक्ष्व ॥ २२ ॥ २३ ॥ अर्थः-जिस क्षेत्रमें भूमिका प्रमाण ३०० तीनसौ है, मुखका प्रमाण १२५ एकसौ पचीस है । ख कहिये० शून्य उत्कृति कहिये २६ छब्बीस अर्थात् २६० दोसौ साठ एक भुजका प्रमाण है । और शर कहिये ५ अतिधृति कहिये १९ उन्नीस अर्थात् १९५ एकसौ पचानवे दूसरे भुजका प्रमाण है तहां एक कर्णका प्रमाण ख कहिये० शून्य अष्ट ८ आठ यम कहिये २ दो अर्थात् २८० दो सौ अस्सीके तुल्य है और दूसरा कर्ण तिथि कहिये १५ गुण कहिये ३ अर्थात् ३१५ तीनसौ पन्द्रहकी तुल्य है और छोटे भुजके शिरसे जो लम्ब डाला उसका प्रमाण गो कहिये ९ और धृति कहिये १८ अर्थात् १८९ एकसौ नवासीके तुल्य है तथा बडे भुजके शिरसे जो लम्ब डाला उसका प्रमाण जिन कहिये २४ चौबीस और यम कहिये २ दो अर्थात् २२४ दो सौ चौबीसके तुल्य है तहां कर्ण और