लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षेत्रव्यवहारः । ( १७६ ) अर्थः-दोनों लंबोंको भूमिसे गुणा करे, और दोनोंमें अपने २ पीठका भाग दे. तब वंशोंका प्रमाण मिलता है; इनही वंशोंसे कर्णोंके योगसे पहले के तुल्य लंब और दोनों भूखण्ड साधै ॥ ३७ ॥ लम्बौ १८९ । २२४ । भू ३०० घ्नौ जातौ ५६७०० । ६७२०० स्वस्वपीठाभ्याम् २५२ । १६८ भक्तौ । एवमत्र लब्धौ वंशौ २२५ । ४०० आभ्यामन्योन्यमूलाग्र- सूत्रयोगादित्यादिकरणेन लब्धः कर्णयोगादधोलम्बः १४४ भूखण्डे च १०८ । १९२ ॥ फैलाव-ऊपर दिखाये हुए क्षेत्रमें नीचेका लम्ब और भूखण्ड जाननेकी आवश्य- कता है इसकारण वंशोंका प्रमाण जाननेके निमित्त ऊपर कही हुई “लम्बौ भूघ्ना वित्यादि” इस रीतिसे दोनों लंबों १८९ । २२४ को भूमि ३००. से गुणा किया तब ५६७०० । ६७२०० हुए; इनमें अपने अपने पीठका भाग दिया अर्थात् ५६७०० में अपने पीठ २५२ का भाग दिया तब २२५ लब्धि हुए; यह पहले लंबकी ओरका वंश है, फिर ६७२०० में अपने पीठ १६८ का भाग दिया तब ४०० लब्धि हुए यह दूसरे लंबकी ओरका वंश है अब इन वंशोंको जानकर पहले कही हुई “अन्यो न्यमूलाग्रसूत्रयोगाद्वेण्वोर्वधे योगहतेऽवलंबः” इस रीतिके अनुसार वंशों २२५ । ४०० का घात किया तब ९०००० हुए. सोई क्षेत्रका स्वरूप दिखाते हैं- इनमें वंशोंके योग ६२५ का भाग दिया तब १४४ लब्ध हुए; यही कर्ण योगसे नीचे डाले हुए लंबका प्रमाण है; अब इसी लंबकी आबाधा जाननेके निमित्त पहले कही हुई “ वंशौ स्वयोगेन हतावभीष्टभुघ्नौ च लंबोभयतः कुखण्डे ” इस रीतिके अनुसार दोनों वंशों २२५ । ४०० को अभीष्ट भू ३०९ से गुणा किया तब ६७५०० । १२०००० हुए इनमें अपने योग ६२५ का भाग दिया तब क्रमसे भूखण्डोंका प्रमाण १०८ । १९२ मिला; यह १०८