लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १७८ ) लीलावती । हुए, $\frac{६२४०}{१७}$ यही अपने मार्गसे बढा हुआ १८९ लंबकी ओरका सूचीका भुज है, इसी प्रकार दूसरा सूची भुज $\frac{७०२०}{१७}$ मिला, इन दोनों भुजाओंका अपने २ मार्गमें बढानेसे जो दोनों भुजाओंका योग होनेपर आकार बन जाता है उसीका नाम सूची है, उसी कारण इसको सूचीक्षेत्र कहते हैं. बुद्धिमान यहां ऊपर कही हुई सब रीतियोंमें हारको प्रमाण और गुण्यका फल तथा गुणकको इच्छा कल्पना करके त्रैराशिकसे भी इस सूचीक्षेत्रको सिद्ध कर सकता है. सूचीलम्ब और आबाधा लानेका और भी प्रकार लिखते हैं- सन्धिमें अपने २ लम्बका भाग देकर उनका योग करे तब जो अङ्क हों उनका भूमिमें भाग दे, तब जो लब्धि मिले वह सूची लम्बका प्रमाण है; फिर लंबसे त्रैराशिक करके सूचीकी आबाधा और सूचीभुजका साधन करे, इसको अभी कहे हुए सूचीक्षेत्रके उदाहरणमें ही दिखाते हैं. सूचीक्षेत्रका स्वरूप जो कि गणित करनेसे हुआ. १०८ सूचीकी आबाधा सूचीकी आबाधा ९१२ १५३६/१७ ३५६४/१७