भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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क्षेत्रव्यवहारः । (१७९) यहाँ एक ओरकी सन्धि ४८ है और लंब १८९ है और दूसरी ओरकी सन्धि १३२ है और लम्ब २२४ है, पहले लंबकी सन्धि ४८ में अपने लंब १८९ का भाग दिया तब ४८/१८९ हुए, दूसरे ओरकी सन्धि १३२ में अपने लंब २२४ का भाग दिया तब १३२/२२४ हुए, इस प्रकार दोनों सन्धियोंमें अपने २ लंबका भाग देनेसे ४८/१८९, १३२/२२४ हुए, यहां पहलेमें ३ का और दूसरेमें चारका अपवर्तन देनेसे हुए १६/६३, ३३/५६ इन दोनोंका योग किया तब ४५०५/३५२८ हुए इनका भूमि ३०० में भाग लिया तब ६०४८/१७ लब्धि मिले यह सूचीका वही लंब हुआ, फिर आबाधा जाननेके निमित्त त्रैराशिक किया जैसे १८९ यह लंब तो अपनी सन्धि ४८ भुज देता है तो सूची लंब ६०४८/१७ क्या भुज देगा. इस रीतिसे १८९ लंबकी ओरकी आबाध १५३६/१७ हुई, इसी रीतिसे दूसरी आबाधा मिली, ३५६४/१७ इसी प्रकार त्रैराशिक कर नेसे सूचीके भुज भी मालूम हो जाते हैं ॥ अथ वृत्तक्षेत्रे करणसूत्रं वृत्तम्- अथ वृत्तक्षेत्र (जिसका गोल आकार होता है) में व्यास वा परिधिमेंसे एकको जानकर दूसरेको जाननेकी रीति एक श्लोकमें- व्यासे भनन्दाग्नि (३९२७) हते विभक्ते खबाणसूर्यैः (१२५०) परिधिः स सूक्ष्मः ॥ द्वाविंशतिघ्ने (२२) विहृतेऽथ शैलैः (७) स्थूलोऽथ वा स्याद्व्यवहारयोग्यः ॥४१॥ अन्वय:—व्यासे भनन्दाग्निहते ततः खबाणसूर्यैः विभक्ते सति यत् फलं स सूक्ष्मः परिधिः। अथ द्वाविंशतिघ्ने शैलैः विहृते च सति स्थूलः परिधिः स्यात् अथवा व्यवहार- योग्यः स्यात् ॥ ४१ ॥ अर्थ:—कल्पना किये हुए वृत्तक्षेत्रके व्यासको ३९२७ तीन हजार नौसौ सत्ताईससे गुणाकर १२५० एक हजार दोसौ पचासका भाग देतब जो मिले वह परिधिका सूक्ष्म प्रमाण होता है और उसी कल्पित व्यासको यदि २२ बाईससे गुणाकर ७ सात का भाग दे तब जो मिले वह परिधिका स्थूल प्रमाण होता है अथवा इस प्रमाणसे व्यवहारका निर्वाह होता है, अर्थात् व्यवहारके योग्य है ॥ ४१ ॥ उदाहरणम्- विष्कंभमानं किल सप्त यत्र तत्र प्रमाणं परिधेः प्रचक्ष्व ॥ द्वाविंशतिर्यत्परिधिप्रमाणं तद्व्याससंख्यां च सखे विचिंत्य २४ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri

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