भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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क्षेत्रव्यवहारः। (१८१) जब परिधि जानकर व्यासमान जाननेका प्रश्न है तब गुणक और हरका पलटा करलिया अर्थात् सूक्ष्म व्यास जाननेकी रीतिमें तो जो पहले ३९२७ तीन हजार नौसौ सत्ताईस गुणक था, उसको हर माना और जो १२५० एक हजार दोसौ पचास हर था; उसको गुणक मान लिया, तिसी प्रकार स्थूल व्यास लानेके निमित्त पहले कही हुई रीतिमें गुणक २२ बाईसको हर माना और हर ७ सातको गुणक माना जैसे जहां २२ बाईस परिधि है तहां व्यास लानेके लिये परिधि २२ को १२५० से गुणा किया तब २७५०० हुए इनमें ३९२७ का भाग दिया तब मिले ७ ११/३९२७ यह सूक्ष्मव्या- सका मान मिला अब स्थूल मान जाननेके निमित्त परिधि २२ को ७ सातसे गुणा किया तब १५४ हुए इनमें २२ का भाग दिया तब ७ सातसे गुणा किया तब १५४ हुए इनमें २२ का भाग दिया तब ७ सात लब्धि हुए यही व्यवहार योग्य स्थूलव्यासका मान मिला. वृत्तगोलयोः फलानयने करणसूत्रं वृत्तम्-- समभूमिमें जो गोल आकार वृत्तक्षेत्र है और नीम्बूकी आकारका जो गोल है उसका फल जाननेकी रीति एक श्लोकमें- वृत्तक्षेत्रे परिधिगुणितव्यासपादः फलं तत् क्षुण्णं वेदैरुपरि परितः कन्दुकस्येव जालम् ॥ गोलस्यैवं तदपि च फलं पृष्ठजं व्यासनिघ्नम् षड्भिर्भक्तं भवति नियतं गोलगर्भे घनाख्यम् ॥ ४२ ॥ अन्वयः-वृत्तक्षेत्रे परिधिगुणितव्यासपादः फलं स्यात्। तत् वेदैः क्षुण्णं कन्दुकस्य उपरि परितः जालम् इव फलम् भवति । एवं यत् गोलस्य पृष्ठजम् फलं जातं तत् अपि च व्यासनिघ्नं षड्भिः भक्तं गोलगर्भे घनाख्यं नियतम् फलम् भवति ॥ ४२ ॥ अर्थः-वृत्तक्षेत्रमें व्यासके चौथे भागको परिधिसे गुणनेपर जो अङ्क हों वह फल होता है, उसी फलको चारसे गुणा करनेपर जो अङ्क हो वह गोलके ऊपर चारों ओर गुँथा हुआ गेंदके जालके समान क्षेत्रफल होता है, इस प्रकार गोलके ऊपरका गेंदके जालके समान जो फल मिलता है, उसको व्याससे गुणाकर छ ६ का भाग देनेसे जो फल मिले वह गोलके भीतरका घन नामवाला नियत फल होता है॥४२॥ उदाहरणम्- यद्व्यासस्तुरगैर्मितः किल फलं क्षेत्रे समे तत्र किं व्यासः सप्तमितश्च यस्य सुगते गोलस्य तस्यापि किम् ॥