भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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( १८२ ) लीलावती। पृष्ठे कन्दुकजालसन्निभफलं गोलस्य तस्यापि किं मध्ये ब्रूहि घनं फलं चे विमलां चेद्वेत्सि लीलावतीम् ॥२५॥ अन्वयः-हे सुमते! चेद्विमलां लीलावतीं वेत्सि तर्हि किल यद्व्यासः तुरगैःमितः तत्र समे क्षेत्रे फलं किम् ? यस्य च गोलस्य सप्तमितः व्यासः तस्य अपि पृष्ठे कन्दुकजाल- सन्निभफलं किम् ? तथा तस्य अपि गोलस्य मध्ये घनम् फलं किम्? इति मे ब्रूहि ॥२५॥ अर्थः-चतुरधुरीण ! यदि अच्छी तरह लीलावतीको जानते हो तो निश्चय करके कहो कि, जहां व्यासका प्रमाण तुरग कहिये ७ सात है, तिस समवृत्त क्षेत्रमें फल क्या होगा ? और जिस गोल क्षेत्रके व्यासका प्रमाण सात है, उसकी पीठपर गेंदके जालके समान क्या फल होगा ? तथा उसी गोलके भीतर घनफल क्या होगा ? यह सब मुझसे कहो ॥ २५ ॥ वृत्तक्षेत्रफलदर्शनाय- २४२३ / ३८ ५००० न्यासः- व्यासः- ७ परिधिः २१ १२३९/१२५० क्षेत्रफलम् ३८ २४२३/५००० गोलपृष्ठफलदर्शनाय- व्यासः-७ ७ गोलपृष्ठफलम् १५३ ११७३/१२५० न्यासः- १५३ ११७३/१२५० गोलान्तर्गतघनफलदर्शनाय- व्यासः ७ गोलस्यान्तर्गतघन- फलम् १७९ १४८७/२५०० न्यासः- ७ १७९ १४८७/२५०० CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri

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