भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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( १८४ ) लीलावती । होता है और व्यासका घन करके उसको आधा करके जो अङ्क हो उसमें उसका एकीसवाँ भाग जोड दे, तब जो अंक हो वह वृत्तक्षेत्रके भीतरका घनफल होता है ॥ ४३ ॥ ऽऽ ॥ उदाहरण पहले कहा हुआ ही जानना । व्यासः ७ अस्य वर्गे ४९ भनवाग्नि ३९२७ निघ्ने पञ्च- सहस्र ५००० भक्ते तदेव सूक्ष्मं फलम् ३८ २४०३/५००० अथवा व्यासस्य वर्गे ४९ रुद्रा ११ हते ५३९ शक्र १४ हते लब्धं स्थूलं फलम् ३८ १/२ घनीकृतव्यासदलम् ३४३/२ निजै- कविंशांशयुक् गोलस्य घनफलं स्थूलम् १७९ १/२ फैलाव-पहले उदाहरणमें दिये हुए वृत्तक्षेत्रके व्यासका प्रमाण ७ है, उसकी ऊपर कही हुई रीति के अनुसार वर्ग किया तो ४९ उनचास हुए इनको ३९२७ तीन हजार नौसौ सत्ताईससे गुणा किया तब १९२४२३ हुए इनमें ५००० पांच हजारका भाग दिया तो ३८ २४०३/५००० मिले, यह वृत्तक्षेत्रका वही सूक्ष्म फल मिला, जो कि, पहली रीतिसे मिला था और उसी व्यास ७ के वर्ग ४९ को ११ ग्यारहसे गुणा किया तब ५३९ पांचसौ उन्तालीस हुए, इसमें १४ चौदहका भाग दिया तो ३८ १/२ मिले, यह स्थूलफल हुआ और व्यास ७ के घन ३४३ के आधे ३४३/२ को अपने इक्कीसवें भाग ३४३/४२ से युक्त किया तो ७५४६/४२ हरका भाग देनेसे १७९ १/२ मिले, यही घनफल हुआ. (स्थूल है, ) ॥ शरजीवानयनाय करणसूत्रं सार्द्ध वृत्तम्- शर और जीवा (ज्या) लानेकी रीति डेढ श्लोकमें- वृत्तक्षेत्रके बीचमें जो आडी लकीर खेंची जाती है; उसको जीवा कहते है और उसीको 'ज्या' कहते हैं, इस रेखाके खेंचनेसे वृत्तक्षेत्रमें धनुषका आकार बनजाता है और जीवाके बीचमेंसे परिधिकी रेखापर्यन्त एक ही रेखा खेंची जाती है, उसको शर कहते हैं, जीवाकी रेखा और शरकी रेखा खेंचनेसे वृत्तक्षेत्रमें बाण चढे हुए धनुषकेसा आकार बन जाता है ॥ ज्याव्यासयोगान्तरघातमूलं व्यासस्तदूनो दलितः शरः स्यात् ॥ ४४ ॥ व्यासाच्छरोनाच्छर संगुणाच्च मूलं द्विनि- घ्नं भवतीह जीवा ॥ जीवाद्धवर्गे शरभक्तयुक्ते व्यासप्रमाणं प्रवदन्ति वृत्ते ॥ ४५ ॥

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