भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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क्षेत्रव्यवहारः। (१८६) अन्वयः-यत् ज्याव्यासयोगान्तरघातमूलं तदूनः व्यासः दलितः कार्यः तदा शरः स्यात् ! शरोनात् शरसंगुणात् च व्यासात् यत् मूलं लभ्येत तत् द्विनिघ्नम् इह जीवा भवति । जीवाद्धेवर्गे शरभक्तयुक्ते सति वृत्ते व्यासप्रमाणम् प्रवदन्ति ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ अर्थः- जीवा और व्यासके योगको जीवा और व्यासके अन्तरसे गुणा करे तब जो अंक हों उनका जो मूल मिले उसे व्यासमें घटा दे तब जो शेष रहे उसको आधा करनेसे जो अंक मिले, वह शरका प्रमाण होता है. व्यासके प्रमाणमें शरका प्रमाण घटानेसे जो शेष रहे, उसे शरके प्रमाणसे गुणा करे तब जो अंक हों उनका मूल ले जो अंक मिलें उनको दोसे गुणा करे तो वृत्तक्षेत्रमें जीवाका प्रमाण होता है और जीवाको आधा कर उसका वर्ग करे, उसमें शरका भाग देनेसे जो अंक मिले उनको शरमें जोड दे तो वृत्तक्षेत्रमें व्यासका प्रमाण मालूम हो जाता है, ऐसा गणितके जाननेवाले कहते हैं ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ उदाहरणम्- दशविस्तृतिवृत्तान्तर्यत्र ज्या षण्मिता सखे ॥ तत्रेषुं वद बाणाज्ज्यां ज्याबाणाभ्याञ्च विस्तृतिम् ॥ २६ ॥ अन्वयः-हे सखे ! यत्र दशविस्तृतिवृत्तांतः ज्या षण्मिता अस्ति तत्र इषुं वद । बाणात् ज्यां वद, ज्याबाणाभ्यां विस्तृतिं च वद ॥ २६ ॥ अर्थः-हे मित्र ! जिस वृत्तक्षेत्रमें व्यासका प्रमाण दश १० है ज्याका प्रमाण छ ६ हैतहां शरका प्रमाण कहो और बाण ( शर ) का प्रमाण जानकर ज्याका प्रमाण कहो, ज्या और शरका प्रमाण जानकर व्यासका प्रमाण भी कहो ॥ २६ ॥ व्यासः- १० ज्या ६ योगः १६ न्यासः- अन्तरम् ४ घातः ६४ अस्य मूलम् ८ एतदूनो व्यासः २ दलितः १ जातः शरः १ ॥ फैलाव-जहां वृत्तक्षेत्रमें व्यासका प्रमाण १० है और ज्याका प्रमाण ६ छ है, वहां शरका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार व्यास १० और ज्या ६ का योग किया तो सोलह १६ हुए, इन ही १० । ६ दोनोंका अन्तर किया तब ४ हुए, इससे व्यास और ज्याके योग १६ को गुणा किया तो ६४ चौसठ हुए इसका मूल लिया तो ८ आठ मिले इसको व्यासमें घटाया तो २ शेष रहे इसका आधा किया तो १ रहा, यही शरका प्रमाण है ॥ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri