लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षेत्रव्यवहारः। ( १९१ ) उसी २००० व्यासवाले वृत्तक्षेत्रमें होनेवाले नवकोण क्षेत्रके भुजाका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार व्यास २००० का इकतालीस हजार [चित्र: नवकोण. व्यास २०००, ६८३ १७/३०] इकतीस ४१०३१ से गुणा किया तो आठ करोड बीस लाख बासठ हजार ८२०६२००० हुए; इसमें एक लाख बीस हजार १२०००० का भाग दिया तब ६८३ १७/३० लब्धि हुए, यही ऊपर कहे हुए वृत्तक्षेत्रके अन्तर्गत नवकोणक्षेत्रकी भुजाका प्रमाण है ॥ इस प्रकार इष्टव्यास कल्पना करके इन व्यासोंसे और भी अनेक प्रकारकी जीवा सिद्ध हो सकती है; परन्तु वह गोलाध्यायकी जीवा उत्पत्तिके विषयमें कहेंगे ॥ अथ स्थूलजीवाज्ञानार्थं लघुक्रियया करणसूत्रं वृत्तम्- अब स्थूलजीवाओंके जाननेके लिये सरल रीति कहते हैं एक श्लोकमें- चापोननिघ्नपरिधिः प्रथमाह्वयः स्यात्पञ्चाहतः परिधिवर्ग- चतुर्थभागः ॥ आद्योनितेन खलु तेन भजेच्चतुर्घ्नव्यासाहतं प्रथममाप्तमिह ज्यका स्यात् ॥ ४९ ॥ अन्वयः-चापोननिघ्नपारिधिः प्रथमाह्वयः स्यात् । परिधिवर्गचतुर्थभागः पञ्चाहतः कार्य्यः । आद्योनितेन तेन चतुर्घ्नव्यासाहतं प्रथमम् भजेत् तदा यत् आप्तं तत् खलु इह ज्यका स्यात् ॥ ४९ ॥ अर्थः-धनुषको परिधिमें घटावे; जो बाकी रहे उससे परिधिको गुणा करे; तब जो गुणनफलके अङ्क हों उनको "प्रथम" कहते हैं; परिधिका वर्ग करनेसे जो अङ्क हों उनके चौथे भागको पांचसे गुणा करे तब जो अङ्क हो उसमें प्रथमको घटावे; जो शेष रहे, उसको चतुर्गुण व्याससे गुणा करे हुए प्रथममें भाग ले; जो लब्धि हो वह निश्चय करके वृत्तक्षेत्रमें जीवाका प्रमाण होता है; परन्तु यह जीवा स्थूल होती है ॥ ४९ ॥ उदाहरणम्- अष्टादशांशेन वृत्तेःसमानमेकादिनिघ्नेन च यत्र चापम् ॥ पृथक्पृथक्तत्र वदाशु जीवां खार्कैर्मितं व्यासदलं च यत्र ॥२८॥