भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

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( १९२ ) लीलावती । अन्वयः-यत्र व्यासदलं खार्कैः मितम् यत्र चापं च वृत्तेः अष्टादशांशेन समानम् । तत्र एकादिनिघ्नेन वृत्तेः अष्टादशांशेन समानं चापं तथा जीवां च पृथक् पृथक् आशु वद ॥ २८ ॥ अर्थः-जिस वृत्तक्षेत्रमें व्यासका आधा १२० है. अर्थात् व्यासका प्रमाण २४० दोसौ चालीस है और धनुषका प्रमाण परिधिके अठारहमें भागके समान है; तहां उस धनुषकी जीवा कहो और एक, दो, तीन, चार, पांच, छ, सात, आठ और नौ आदिसे गुणा किये हुए उसी धनुषकी जीवा भी अलग अलग कहो ॥ २८ ॥ व्यासः व्यासदलम् १२० व्यासः २४० धनुः ४२ अत्र किलांकलाघवाय विंशतेः १२० सार्द्धार्कशतांश २०/१२६० मिलितः व्यासार्द्ध. सूक्ष्मपरिधिः ७५४ अस्याष्टा- २४० दशांशः ४२ अत्राप्यंकला- २३६ घवाय द्वयोरष्टादशांश २/१८ २२६ युतो गृहीतः अनेन पृथक् २०८ १८४ १५४ १२० ८२ ४२ पृथगेकादिगुणितेन तुल्ये धनुषि कल्पिते ज्याः साध्याः ॥ अथवाऽत्र सुखार्थं परिधेरष्टादशांशेन परिधिं धनुषि चापव- र्ग्य ज्याः साध्यास्तथापि ता एव भवंति अपवर्तिते न्यासः- परिधिः १८ चापानि च १। २। ३। ४। ५। ६। ७। ८। ९ यथोक्तकरणेन लब्धा जीवाः ४२। ८२ । १२०। १५४। १८४। २०८। २२६। २३६। २४० ॥ फैलाव-इस वृत्तक्षेत्रके व्यासका प्रमाण २४० है अब इसी व्याससे परिधि जान- नेके लिये पहले कही हुई "व्यासे भनंदाग्नि'-इत्यादि क्रिया करी तो परिधिका प्रमाण ७५४. मिला, परन्तु यहाँ ७५४ परिधि, २०/१२६० यह भाग अर्थात् बीसका