लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षेत्रव्यवहारः। (१९३) न्यास: साढे बारहसौमा भाग कमती रहता तो भी अङ्क लाघवके अर्थ ७५४ कोई सूक्ष्म परिधि माना, इस परिधिका अठारहमा भाग ४२ बयालीस हुआ यही पहिला धनुष हुआ परन्तु इस धनुषमें भी १/२८ दोका अठारहवां भाग हीन है तथापि गणितकी सुग- मताके अर्थ इसको ही ४२ पहिला धनुष माना यही अङ्क दुगुना कर- नसे दूसरा तिगुना करनैसे तीसरा; चौगुना करनेसे चौथा, पँचगुना करनेसे पांचवां; छ गुणा करनेसे छठा सात गुना करनेसे, सातवां आठ गुना करनेसे और आठवाँ नौगुणा करनेसे नौव धनुष होता है; अथवा क्रियालाघवके अर्थ परिधिके अठारहवें भाग अर्थात् प्रथम धनुष४२ का परिधि हुआ तथा सब धनुषोंका परिवर्तन दिया तब परिधिका प्रमाण १८ हुआ; तथा अपवर्तित धनुषोंके प्रमाण १। २। ३। ४। ५। ६। ७। ८। ९। हुए; अब इन ही धनुषोंसे जीवाओंके प्रमाण जाननेके लिये; ऊपर कही हुई रीति के अनुसार प्रथम धनुषको परिधि १८ मेंसे घटाया तो १७ शेष रहे; इनको धनुष १ से गुणा किया तो १७ हुए; इस अंककी प्रथम संज्ञा है फिर परिधि १८ का वर्ग किया तो ३२४ हुए; इसका चौथाई ८१ हुआ इसको पांचसे गुणा किया तो ४०५ हुए; इसमें पहले साधे हुए प्रथम १७ को घटाया तो ३८८ बचे; इसका चौगुने व्यास ९६० से गुणा करे हुए प्रथमसंज्ञक अंक १६३२० में भाग दिया तब ४२मिले; यह पहिली जीवाका प्रमाण हुआ; यहां भाग देनेके अनन्तर २४ शेष रह जाता है; परन्तु थोडे अन्तरके कारण सावयव नहीं लेते हैं; इसी प्रकार प्रथमसंज्ञक अंकको सिद्ध कर ऊपर कही हुई रीति के अनुसार सब धनुषोंकी जीवा क्रमसे ४२। ८२। १२०। १५४। १८४। २०८। २२६। २३६। २४० हुई॥ अथ चापानयनाय करणसूत्रं वृत्तम्- व्यास और जीवा जानकर चापजाननेकी रीति एक श्लोकमें- व्यासाब्धिघातयुतमौर्विकया विभक्तो जीवांघ्रिपञ्चगुणितः परिधेस्तु वर्गः ॥ लब्धोनितात्परिधिवर्गचतुर्थभागादात्ते पदे वृतिदलात्पतिते धनुः स्यात् ॥ ५० ॥ १३