भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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क्रकचव्यवहारः। (२०३) चौडाईके घातको ऊँचाईसे गुणा किया तो ३/२४ हुए इसका भाग दिया तो २५६० दो हजार पाँचसौ साठ लब्धि हुए, यही ईंटोंकी संख्या है, फिर चौतरेकी ऊँचाई ३ में ईंटोंकी ऊँचाई १/८ का भाग दिया तो २४ लब्धि हुए, यही तर अर्थात् रद्दोंकी संख्या है ॥ इति लीलावत्याः स्वरूपप्र० भाषाटीकायां चितिव्यवहारः । अथ क्रकचव्यवहारः । अब लकड़ीकी चिराईका हिसाब लिखते हैं। अथ क्रकचव्यवहारे करणसूत्रं वृत्तम्- अब काष्ठकी चिराईका हिसाब जाननेकी रीति लिखते हैं श्लोक एक- पिण्डयोगदल मग्रमूलयोर्देर्घ्यसंगुणितमंगुलात्मकम् ॥ दारुदारणपथैः समाहतं षट्स्वरैषु विहृतं करात्मकम् ॥ ५५ ॥ अन्वयः-अग्रमूलयोः पिण्डयोगदलं दैर्घ्यसंगुणितम् अंगुलात्मकम् फलम् भवति। तत् दारुदारणपथैः समाहतं षट्स्वरैषु विहृतं करात्मकम् फलम् भवति ॥ ५५ ॥ अर्थः-यदि चीरनेकी लकड़ीकी मोटाई ऊपर नीचेसे कमती बढती हो तो ऊपर नीचेकी मोटाईके प्रमाणका योग करके उसमें दोका भाग दे जो लब्धि हो उसको लंबाईसे गुणा कर दे जो गुणनफल हो वह अंगुलात्मक फल होता है और उसी अंगुलात्मक फलको जितने स्थानोंपर उस काष्ठको चीरा हो उस स्थानकी संख्यासे गुणा करके ५७६ पांचसौ छियत्तरका भाग दे जो लब्धि हो वह चिराईका हस्तात्मक फल होता है ॥ ५५ ॥ उदाहरणम्- मूले नखांगुलमितोऽथ नृपांगुलोऽग्रे पिण्डः शतांगुल- मितं किल यस्य दैर्घ्यम् ॥ तद्दारुदारणपथेषु चतुर्षु किं स्याद्धस्तात्मकं वद सखे गणितं द्रुतं मे ॥ ३६ ॥ अन्वयः-हे सखे ! यस्य पिण्डः मूले नखांगुलमितः अथ अग्रे नृपांगुलमितः किलः दैर्घ्यं शतांगुलमितं तद्दारुदारणपथेषु चतुर्षु हस्तात्मकं गणितं किं स्यात्? इति मे द्रुतम् वद् ॥ ३६ ॥ अर्थः-हे मित्र ! जिस कोष्ठकी मोटाई मूलमें २० बीस अंगुलके प्रमाण है और अग्रभागमें सोलह १६ अंगुल मोटी है और जिसका लम्बत्व सौ १०० अंगुल है, उस काष्ठको यदि चार स्थानोंमें चीरा तो शीघ्र कहो कि, उसकाष्ठकी हस्तात्मक चिराई क्या होगी ? ॥ ३६ ॥