भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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( २०४ ) लीलावती । न्यासः-मूले पिण्डः २० अग्रे पिण्डः १६ दैर्घ्यम् १०० पिण्डयोगः ३६ पिण्ड- योगदलम् १८ दैर्घ्येण १०० संगुणितं जातम् १८००दारु- दारणपथै ४ गुणितं ७२००षट्- ष्वरेषु ५७६ विहृतं जातं करात्मकं गणितं २५/२ फैलाव-यहां काष्ठका प्रमाण मूल और अग्र भागमें समान नहीं है, यह हस्तात्मक चिराईका फल जाननेके लिये ऊपर कहे हुए नियमके अनुसार मूलकी मोटाई २० और अग्रभागकी मोटाई १६ का योग किया तो ३६ हुए इसमें दोका भाग दिया तो १८ मिला इसकी लम्बाई १०० से गुणा करा तो १८०० हुए, इसको चीरनेकी स्थानसंख्या चारसे ४ से गुणा किया तो ७२०० हुए, इसमें ५७६ का भाग दिया तो लब्धि हुए, २५/२ यह हस्तात्मक फल हुआ. क्रकचान्तरे करणसूत्रं सार्द्धं वृत्तम्- तिरछी चिराईका फल जाननेकी रीति डेड श्लोकमें- छिद्यते तु यदि तिर्य्यगुक्तवत्पिण्डविस्तृतिहतेः फलं तदा ॥ ५६ ॥ इष्टिकाचितिदृषच्चितिखातक्राकचव्यवहृतौ खलु मूल्यम् ॥ कर्मकारजनसंप्रतिपत्त्या तन्मृदुत्वकठिनत्व- वशेन ॥ ५७ ॥ अन्वयः-यदि तु तिर्य्यक् छिद्यते तदा उक्तवत् पिण्डविस्तृतिहतेः फलम् भवति । खलु इष्टिकाचितिदृषच्चितिखातक्राकचव्यवहृतौ कर्मकारजनसम्मतिपत्त्या तन्मृदुत्व- कठिनत्ववशेन च मूल्यं भवति ॥ ५६ ॥ ५७ ॥ अर्थः-यदि काष्ठ तिर्च्छा काटा जाय तो मोटाई और चौडाईका घात करके पहलेके अनुसार चौडाव और लम्बावका परस्पर गुणा करनेसे जो गुणनफल मिले उसको चीरनेके स्थानोंकी संख्यासे गुणा करके उसमें पांचसौ छियत्तरका भाग देतव जो