भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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राशिव्यवहारः । (२०६) लब्धि हो उसको हस्तात्मक फल जाने, ईंटोंकी चुनाई पत्थरोंकी चुनाई और काठकी चिराईका जो कारीगरसे ठहर जाय अथवा पत्थरकाष्ठादिकके करडे पन और नरम- पनको देखकर मूल्य (मजूरी) देना चाहिये, मजूरीका भाव नियत नहीं है, इस कारण यहां रीति नहीं लिखी है ॥५६॥५७॥ उदाहरणम्- तद्विस्तृतिर्दन्तमित्रांगुलानि पिंडस्तथा षोडश यत्र काष्ठे ॥ छेदेषु तिर्यङ्ङ्नवसु प्रचक्ष्व किं स्यात्फलं तत्र करात्मकं मे ॥३७॥ अन्वयः-यत्र काष्ठे पिंडः षोडश तथा तद्विस्तृतिः दंतमितांगुलानि तिर्यक् नवसु छेदेषु तत्र करात्मकं किं फलं स्यात् तत् मे प्रचक्ष्व ॥३७॥ अर्थः-जिस काष्ठमें मोटाई सोलह १६ अंगुल है और चौडाई ३२ बत्तिस अंगुल है, उसको यदि तिरछा करके नौ स्थानोंमें चीरा जाय तो उस काष्ठका करात्मक क्या फल होगा ? सो मुझसे कहो ॥३७॥ न्यासः विस्तारः ३२ पिंडः १६ पिंड- ३२ विस्तृतिहतिः ५१२ मार्ग ९ ९ १६ घ्ना ४६०८ षट्स्वरैषु ५७६ विहृतं जातं फलं हस्ताः ८ ॥ इति क्रकचव्यवहारः ॥ फैलाव- यहां मोटाई १६ अंगुल है, चौडाई ३२ अंगुल है, इन दोनोंका परस्पर ३२ ९ १६ घात करा तो ५१२ पांच सौ बारह हुए; इसको चिराईकी स्थान संख्या ९ से गुणा करा तब ४६०८ हुए इसमें ५७६ का भाग दिया तब ८ लब्धि हुए, यही तिरछी चिराईका यहां हस्तात्मक प्रमाण है ॥३७॥ इति भा० ली० स्व० प्र० भा टीका क्रकचव्यवहारः॥ अथ राशिव्यवहारः । अथ राशिव्यवहारे करणसूत्रं वृत्तम्- अन्नकी ढेरीका प्रमाण जाननेकी रीति एक श्लोकमें- अनणुषु दशमांशोऽणुष्वथैकादशांशः परिधिनवमभागः