भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 268 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 222

( २०६ ) लीलावती । शूकधान्येषु वेधः ॥ भवति परिधिषष्ठे वर्ग्गिते वेधनिघ्ने घनगणितकराः स्युर्भागधास्ताश्च खार्य्यः ॥ ५८ ॥ अन्वयः-अनणुषु दशमांशः वेधः भवति अथ अणुषु एकादशांशः वेधः भवति शूकधान्येषु परिधिनवमभागः वेधः भवति परिधिषष्ठे वर्ग्गिते वेधनिघ्ने घनगणित- कराः स्युः ताः एव च मागधाः खार्य्यः भवन्ति ॥ ५८ ॥ अर्थः- (अन्नके ढेरमें जो बीचकी उँचाई है उसको वेध कहते हैं; ) मोटे अन्न (चनाआदि) की ढेरीमें परिधिका दशवां भाग वेध होता है और नन्हे नाजकी ढेरीमें परिधिका ग्यारहवां भाग वेध होता है और शूकधान्य (साठी आदि) की ढेरीमें परिधिका नवाँ भाग वेध होता है; (परिधिके) छठे भागका वर्ग कर जो अङ्क मिले उनको वेधसे गुणा कर दे जो गुणनफल हो वही ढेरीमें घनहस्तोंका प्रमाण होगा; वही घनहस्त मगधदेशमें खारी कहलाते हैं ॥ ५८ ॥ उदाहरणम्- समभुवि किल राशियः स्थितः स्थूलधान्यः परिधिपरिमितिः स्याद्धस्तषष्टिर्यदीया ॥ प्रवद गणक खार्य्यः किंमिताः सन्ति तस्मिन्रथ पृथगणुधान्यैः शूकधान्यैश्च शीघ्रम् ॥ ३८ ॥ अन्वयः-हे गणक ! किल यः समभुवि स्थूलधान्यः राशिः स्थितः यदीया परि- धिपरिमितिः हस्तषष्टिः स्यात् तस्मिन् किंमिताः खार्य्यः सन्ति । अथ अणुधान्यैः शूकधान्यैः च पृथक् किंमिताः खार्य्यः स्युः इति शीघ्रम् प्रवद ॥ ३८ ॥ अर्थः-हे गणितके जाननेवाले ! जिस समान भूमिमें जो मोटे अन्नकी ढेरी है उसकी परिधि साठ हाथ है; तो कहो उसमें कितनी खारी (घनहस्त) होंगी और उसी समभूमिपर जो साठ २ परिधिवाली महीन और शूक अन्नकी ढेरी हैं, उनमें भी कितनी खारी होंगी ? ॥ ३८ ॥ अथ स्थूलधान्यराशिमानावबोधनाय । (प० ६०, अनणुधान्यराशिः, वेधः ६) परिधिः ६० वेधः ६ परिधेः षष्ठांशः १० वर्गितः १०० वेधनिघ्नः लब्धाः खार्य्यः॥ ६०० ॥ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri