लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्रकचव्यवहारः। (२०७) अथाणुधान्यराशिमानाऽऽनयनाय । न्या० [परिधिः ६०, अणुकधान्यराशिः, वेधः ६०/११] परिधिः ६० वेधः ६०/११ जातं फलम् ५४५ ५/११ ॥ अथ शूकधान्यराशिमानानानयनाय न्यासः- [परिधिः ६०, शूकधान्यराशिः, वेधः २०/३] प० ६० वे० २०/३ जातं फलं खार्य्यः ६६६ २/३ फैलाव-स्थूल (मोटे) अन्नकी ढेरीका प्रमाण ६० हाथ है अब यह वेधका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीति के [प० ६०, मोटेअन्नकीढेरी, वेधः ६, खारी प्र. ६००] अनुसार परिधि ६० साठका दशवां भाग लिया तो ६ छ मिले; यही इस मोटे अन्नकी राशिमें वेध है फिर परिधिके छठे भाग १० का वर्ग किया तो १०० हुए; इसको वेधसे गुणा करा तो ६०० हुए; यही इस परि- थिका घनहस्तफल अर्थात् खारियोंकी संख्या है. अब अणुधान्यकी ढेरीकी परिधिका प्रमाण ६० है तहां उपरोक्त नियमानुसार वेध मिला ६०/११ फिर परिधिके [परिधिः ६०, सूक्ष्मअन्नकीराशि., वेधः ६०/११, खारी प्र. ५४५ ५/११] छठे भागका वर्ग किया तब १०० हुए; ६०/११ से गुणा किया तब ६०००/११ हुए; हरका भाग दिया तब ५४५ ५/११ हुए, यही खारियोंका प्रमाण अर्थात् घनहस्तात्मक फल है ॥ अब शूकधान्यकी ढेरीकी भी परिधि ६० हस्त है; यहां ऊपर कही हुई रीति के अनुसार परिधि ६० का [परिधि ६०, खारी प्र. ६६६ २/३, साठी आदि शूक धान्यका ढेरी., वेधः ६०/९] नवां भाग ६०/९ वेध होता है इसमें तीनका अपवर्तन देनें पर २०/३ परिधिका प्रमाण रहता है, अब शूक धान्यके ढेरका प्रमाण जाननेके लिये परिधि ६० के छठे भाग