भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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( २०८ ) लीलावती । १० का वर्ग किया तो १०० हुए; इसको वेध ३ \frac{०}{ } से गुणा करां तब \frac{२०००}{३} हुए हरका भाग दिया तब ६६६ \frac{२}{३} हुए; यही घनहस्त फल अर्थात् खारियोंका प्रमाण है ॥ अथ भित्त्यन्तर्बाह्यकोणसंलग्नराशिप्रमाणानयने करणसूत्रं वृत्तम्- अब मकानके भीतर दो दीवारोंके जोडके कोनेमें डाली हुई, एक दीवारसे लगाकर डाली हुई, दीवारके बाहरके कोनेसे लगाकर डाली हुई, स्थूलधान्य और अणुधान्य शूकधान्यकी ढेरीका प्रमाण जाननेकी रीति एक श्लोकमें- द्विवेदसत्रिभागैकनिघ्नात्तु परिधेः फलम् ॥ भित्त्यन्तर्बाह्यकोणस्थराशेः स्वगुणभाजितम् ॥ ५९ ॥ अन्वयः-भित्त्यन्तर्बाह्यकोणस्थराशेः परिधिः द्विवेदसत्रिभागैकनिघ्नः कार्य्यः स एव परिधिः कल्प्यः । परिधेः पूर्ववत् फलं साध्यं तत् स्वगुणभाजितम् फलम् भवति ॥ ५९ ॥ अर्थः-जो ढेर दीवारसे लगा हो, या दीवारके भीतर कोनेमें लगा हो या दीवारके बाहर कोनेमें लगा हो उसकी परिधिको यदि स्थूलधान्यकी ढेरी हो तो दोसे गुणा करे; सूक्ष्म ढेरी हो तो चारसे गुणा करे; और शूकधान्यकी ढेरी हो तो १ \frac{१}{३} तीसरा भागयुक्त एकसे गुणा करे, जो गुणनफल हो उसीको क्रमसे परिधि माने; फिर परिधिसे पहली रीतिके अनुसार फल लावे जो फल आवे उसमें जिस जिस अङ्कसे परिधिको गुणा करा था उन ही उन अंकोंका भाग दे जो लब्धि हो उसको फल जाने ॥ ५९ ॥ उदाहरणम्- परिधिर्भित्तिलग्नस्य राशेत्रिंशत्करः किल ॥ अंतःकोणस्थितस्यापि तिथितुल्यकरः सखे ॥ ३९ ॥ बहिःकोणस्थितस्यापि पंचघ्ननवसम्मितः ॥ तेषामाचक्ष्व मे क्षिप्रं घनहस्तान् पृथक्पृथक् ॥ ४० ॥ अन्वयः- हे सखे ! किल भित्तिलग्नस्य राशेः त्रिंशत्करः परिधिः अन्तकोण- स्थितस्य अपि राशेः तिथितुल्यकरः परिधिः बहिः कोणस्थितस्य अपि राशेः पंचघ्ननवसंमितिः परिधिः अस्ति तेषां घनहस्तान् मे पृथक्पृथक् क्षिप्रम् आचक्ष्व ॥ ३९ ॥ ४० ॥