लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
( २०८ ) लीलावती । १० का वर्ग किया तो १०० हुए; इसको वेध ३ \frac{०}{ } से गुणा करां तब \frac{२०००}{३} हुए हरका भाग दिया तब ६६६ \frac{२}{३} हुए; यही घनहस्त फल अर्थात् खारियोंका प्रमाण है ॥ अथ भित्त्यन्तर्बाह्यकोणसंलग्नराशिप्रमाणानयने करणसूत्रं वृत्तम्- अब मकानके भीतर दो दीवारोंके जोडके कोनेमें डाली हुई, एक दीवारसे लगाकर डाली हुई, दीवारके बाहरके कोनेसे लगाकर डाली हुई, स्थूलधान्य और अणुधान्य शूकधान्यकी ढेरीका प्रमाण जाननेकी रीति एक श्लोकमें- द्विवेदसत्रिभागैकनिघ्नात्तु परिधेः फलम् ॥ भित्त्यन्तर्बाह्यकोणस्थराशेः स्वगुणभाजितम् ॥ ५९ ॥ अन्वयः-भित्त्यन्तर्बाह्यकोणस्थराशेः परिधिः द्विवेदसत्रिभागैकनिघ्नः कार्य्यः स एव परिधिः कल्प्यः । परिधेः पूर्ववत् फलं साध्यं तत् स्वगुणभाजितम् फलम् भवति ॥ ५९ ॥ अर्थः-जो ढेर दीवारसे लगा हो, या दीवारके भीतर कोनेमें लगा हो या दीवारके बाहर कोनेमें लगा हो उसकी परिधिको यदि स्थूलधान्यकी ढेरी हो तो दोसे गुणा करे; सूक्ष्म ढेरी हो तो चारसे गुणा करे; और शूकधान्यकी ढेरी हो तो १ \frac{१}{३} तीसरा भागयुक्त एकसे गुणा करे, जो गुणनफल हो उसीको क्रमसे परिधि माने; फिर परिधिसे पहली रीतिके अनुसार फल लावे जो फल आवे उसमें जिस जिस अङ्कसे परिधिको गुणा करा था उन ही उन अंकोंका भाग दे जो लब्धि हो उसको फल जाने ॥ ५९ ॥ उदाहरणम्- परिधिर्भित्तिलग्नस्य राशेत्रिंशत्करः किल ॥ अंतःकोणस्थितस्यापि तिथितुल्यकरः सखे ॥ ३९ ॥ बहिःकोणस्थितस्यापि पंचघ्ननवसम्मितः ॥ तेषामाचक्ष्व मे क्षिप्रं घनहस्तान् पृथक्पृथक् ॥ ४० ॥ अन्वयः- हे सखे ! किल भित्तिलग्नस्य राशेः त्रिंशत्करः परिधिः अन्तकोण- स्थितस्य अपि राशेः तिथितुल्यकरः परिधिः बहिः कोणस्थितस्य अपि राशेः पंचघ्ननवसंमितिः परिधिः अस्ति तेषां घनहस्तान् मे पृथक्पृथक् क्षिप्रम् आचक्ष्व ॥ ३९ ॥ ४० ॥
राशिव्यवहारः । (२०९) अर्थः--हे मित्र ! जो ढेर नाजका दीवारसे लगा हुआ पडा है उसका परिधिका प्रमाण ३० तीस हाथ है, जो अन्नका ढेर दीवारके भीतर कोनेमें लगा हुआ पडा है उसकी परिधिका प्रमाण १५ हाथ है और जो अन्नका ढेर दीवारके बाहर कोनेसे लगा हुआ पडा है उसकी परिधिका प्रमाण ४५ पैंतालीस हाथ है, तो उन अन्नके ढेरोंका घनहस्तफल मुझसे अलग अलग शीघ्र कहो ॥ ३९ ॥ ४० ॥ अत्रापि स्थूलादिधान्यानां राशिमानावबोधनाय स्पष्टं क्षेत्रत्रयम्- यहाँ भी स्थूल सूक्ष्म और शूकधान्य इन तीनोंके ढेरोंका अलग २ प्रमाण जाननेके लिये तीन क्षेत्र दिखाये हैं- तत्रादावणुधान्यराशिमानावबोधकं क्षेत्रमाह- न्यासः-- अत्राद्यस्य परिधिः ३० द्विनिघ्नः ६० अन्यश्चतुर्घ्नः ६० अपरः ४५ सत्रिभागैक ४/३ निघ्नः ६० एषां वेधः ६ एभ्यः फलं तुल्य- मेतावन्त्यः खार्य्यः ६०० एतत्स्व- [चित्र १: अनणुधान्यराशिः | बहिःकोणरा०, वेधः ६, परि ४५ | परिधिः ३०, भित्तिलग्नराशि., वेधः ६ | परिधि. १५, वेधः ६, अन्तःकोणराशिः] स्वगुणेन भक्तं जातं पृथक्पृथक् फलम् ३०० । १५० । ४५० अथाणुधान्यराशिमानानयनाय क्षेत्रम्- पूर्ववत्क्षेत्रत्रयाणां स्वगुण- [चित्र २: अणुधान्यराशिः | बहिःकोणराशिः, परिधिः ४५, वेधः ६३०/११ | परिधिः ३०, भित्तिलग्नरा० वेधः ७१/२ | परिधि १५, अंतःकोणरा०, वेधः १३१/२] गणितः परिधिः ६० वेधः ६३०/११ फलानि २७२८/११, १३६ ४/११ ४०९ १/११ ॥ १४
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तो ३०० मिले, यही दीवारसे लगी हुई राशिका घनहस्तफल हुआ इसी प्रकार वेधसे गुणा किये हुए परिधिके छठे भागके वर्ग ६०० में चारका भाग दिया तो १५० मिले यही भीतरके कोनेसे लगी हुई जो राशि पडी है, उसका घनहस्तात्मक फल हुआ, फिर इसी प्रकार वेधसे गुणा कर हुए परिधिके छठे भागके वर्ग ६०० में $\frac{४}{३}$ तीसरे भागयुक्त एकका भाग दिया तब ४५० मिले, यही बाहर कानेसे लगी हुई जो राशि पडी हुई है, उसका घनहस्तात्मक फल हुआ. अब जहां छोटे अन्नकी राशि है तहां वेध जाननेके लिये पहली कही हुई रीतिके अनुसार इन परिधियों ३० । १५ । ४५ को पूरा करनेके लिये अपने २ गुणक २ । ४ । $\frac{४}{३}$ से अलग २ गुणा करा तब पूरी परिधि हुई ६० । ६० । ६० । यह छोटे अन्नकी राशि है इस कारण यही परिधि ६० का ग्यारहवाँ भाग $\frac{६०}{११}$ वेध हुआ । फिर परि- धिके छठे भाग १० के वर्ग १०० को वेध $\frac{६०}{११}$ से गुणा किया तब $\frac{६०००}{११}$ हुए, इसमें अपने अपने गुणक २ । ४ । $\frac{४}{३}$ का भाग दिया तब $\frac{६०००}{२२}$ । $\frac{६०००}{४४}$ । $\frac{१८०००}{४४}$ हुए इनमें हरका भाग दिया तब तीनों राशियोंका घनहस्तात्मक फल हुआ, २७२ $\frac{८}{११}$ । १३६ $\frac{४}{११}$ । ४०९ $\frac{१}{११}$ शूकधान्य (छिलके वाला सांठी आदि अन्न) की राशियोंका प्रमाण जाननेके लिये यहाँ भी पहले कही हुई रीतिके अनुसार तीनों परि- धियों ३० । १५ । ४५ कों पूरा करनेके लिये अपने अपने गुणक २ । ४ । $\frac{४}{३}$ से अलग २ गुणा किया तब ६० । ६० । ६० पूरी परिधि हुई, यहां शूकधान्यकी राशि है इस कारण परिधिका नवां भाग $\frac{६०}{९}$ तीनसे परिवर्तन देनेसे $\frac{२०}{३}$ वेध होता है; फिर परिधि ६० के छठे भाग १० के वर्ग १०० को वेध $\frac{२०}{३}$ से गुणा करा
तो २०००/३ हुए, इसमें अपने अपने गुणक २ । ४ । १ १/३ का भाग दिया तब २०००/६ २०००/१२ । ६०००/१२ हुए; इनमें हरका भाग दिया, तब ३३३ १/३ । १६६ २/३ । ५०० । हुए,यह क्रमसे तीनों ३० । १५ । ४५ । परिधिका खारीप्रमाण अर्थात् घनहस्त फल हुआ। इति राशिव्यवहारः ॥ अथ छायाव्यवहारः । —-—•✦•—-— अथ छायाव्यवहारे करणसूत्रं वृत्तम्- दीपकके बालनेसे जो छाया पडती है; उसके मापनेकी रीति एक श्लोकमें कहते हैं:- छाययोः कर्णयोरंतरे ये तयोर्वर्गविश्लेषभक्ता रसाङ्गीषवः ॥ सैकलब्धेः पदघ्नं तु कर्णान्तरं भांतरेणोनयुक्तं दले स्तः प्रभे॥६०॥ अन्वयः-छाययोः कर्णयोः च य अन्तरे तयोः वर्गाविश्लेषभक्ताः रसाङ्गीषद्वः। कार्याः । सैकलब्धेः पदघ्नं कर्णान्तरम् भांतरेण ऊनयुक्तं कार्यं तयोः दले प्रभे स्तः। अर्थः-दोनों छायाओंके अन्तरका वर्ग करें और दोनों कर्णोंके अन्तरका भी वर्ग करें; फिर इन दोनों वर्गोंका भी अंतर करें, जो शेष रहे, उसका ५७६ पांचसौ छियत्तरमें भाग दे तब जो लब्धि मिले उसमें एक और जोड ले उसका वर्गमूल ले उससे कर्णोंके अंतरको गुणा करें; जो गुणनफल हो उसको दो स्थानोंमें लिखे एक स्थानमें छायाओंके अन्तरको घटा दे और एक स्थानमें जोड दे फिर दोनों स्थानोंके अङ्कोंको आधा कर ले वही दोनों छायाओंके प्रमाण होंगे ॥ ६० ॥ उदाहरणम्- नंदचंद्रैर्मितं छाययोरंतरं कर्णयोश्चान्तरं विश्वतुल्यं ययोः ॥ ते प्रभे वक्ति यो युक्तिमान्वेत्त्यसौ व्यक्तमव्यक्तयुक्तं हि मन्येऽ खिलम् ॥ ४१ ॥ अन्वयः-ययोः छाययोः अन्तरं नंदचन्द्रैः मितम्। कर्णयोः अंतरं च विश्वतुल्यम्। ते प्रभे यः युक्तिमान् वक्ति हि मन्ये असौ अव्यक्तयुक्तम् अखिलं व्यक्तं वेत्ति ४१॥ अर्थः-जिन छायाओंका अन्तर १९ उन्नीस है और कर्णोंका अन्तर १३ है, उन छायाओंके प्रमाणको जो बुद्धिमान् कहता है जानता हूं, वह निश्चय करके बीज- गणितसहित सम्पूर्ण पाटीगणितको जानता है ॥ ४१ ॥
छायाव्यवहारः । ( २१३ ) न्यासः-छायान्तरं १९ कर्णा- न्तरम् १३ अनयोर्वर्गान्त- रेण १९२ भक्ता रसाद्रीषवः ५७६ लब्धं ३ सैकस्या ४ स्य मूलम् २ अनेन कर्णान्तरं गुणितम् २६ द्विःस्थं २६ छायान्तरेण १९ ऊनयुते ७ । ४५ तदर्द्धे लब्धे छाये ७/२ ४५/२ तत्कृत्योर्योगपदमित्यादिना जातौ कर्णौ २५/२ ५१/२ फैलाव-छायाओं और कर्णोंका अन्तर जानकर छायाओंका और कर्णोंका प्रमाण जानना है; तहां पहले छायाओंका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार छायाओंके अन्तर १९ का वर्ग किया तब ३६१ हुए और कर्णोंके अन्तर १३ का वर्ग किया तब १६९ हुए; इन दोनों ३६१ । १६९ का अन्तर किया तो १९२ हुए, इसका पांचसौ छियत्तर ५७६ में भाग दिया तब ३ लब्धि हुए, इसमें १ एक जोडा तब ४ चार हुए, इसका मूल लिया तब २ मिले, इससे कर्णान्तर १३ को गुणा करा तब २६ हुए, इसको दो स्थानोंमें २६ । २६ लिखा एक स्थान छायांतर १९ को घटाया तो ७ सात शेष रहे, फिर दूसरे स्थानमें छायांतर १९ को जोडा तब ४५ हुए, इन दोनोंको आधा करा तब ७/२ ४५/२ हुए, यही दोनों छायाओंका प्रमाण है, फिर छाया और शंकुसे “तत्कृत्योर्योगपदम्” इस पहले कही हुई रीतिके अनुसार कर्णोंका प्रमाण २५/२ ५१/२ मिला ॥ छायांतरे करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्- छाया जाननेकी दूसरी रीति आधा श्लोक- शंकुः प्रदीपतलशंकुतलान्तरघ्न- श्चाया भवेद्विनरदीपशिखौच्यभक्तः ॥ऽऽ॥ अन्वयः-प्रदीपतलशंकुतलांतरघ्नः शंकुः विनिरदीपशिखौच्यभक्तः कार्य्यः तदा छाया भवेत् ॥ ऽ ऽ ॥
( २१४ ) लीलावती । अर्थ:-दीपकके तलेके और शंकुके तलेके मध्यकी भूमिके प्रमाणसे शंकुको गुणा करे, जो गुणन फल हो, उसमें शंकु और दीपककी शिखाकी उँचाईके अंतरका भाग दे जो लब्धि मिले वह शंकुकी छायाका प्रमाण होगा ॥ ९९ ॥ उदाहरणम्- शंकुप्रदीपांतरभूस्त्रिहस्ता दीपोच्छ्रितिः सार्द्धकरत्रया चेत् ॥ शंकोस्तदार्कांगुलसम्मितस्य तस्य प्रभा स्यात्कियती वदाशु ४२ ॥ अन्वयः-चेत् शंकुप्रदीपान्तरभूमिः त्रिहस्ता दीपोच्छ्रितिः च सार्द्धकरत्रया तदा अर्कांगुलसाम्मितस्य तस्य शंकोः कियती प्रभा स्यात् इति आशु वद ॥ ४२ ॥ अर्थः-यदि शंकुके और दीपके मध्यकी भूमिका प्रमाण तीन हाथ है और दीपककी उँचाई साढ़ेतीन ७/२ हाथ है तो बारह अंगुलके शंकुकी कितनी छाया होगी ? यह शीघ्र कहो ॥ ४२ ॥ न्यासः-शंकुः १/२ प्रदीपशंकुतलांतरम् ३ अन- योर्घातः ३/२ विनरदीपशिखौच्येन ३ भक्तो लब्धानि छायांगुलानि ॥ १२ ॥ फैलाव- यहां छायाका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार शंकु १/२ को शंकुतल और दीपतलके मध्यकी भूमि ३ से गुणा किया तब ३/२ हुए; इसमें शंकु १/२ और दीपककी उँचाई ७/२ के अंतर ३का भाग दिया तब १/२ मिले यही छायाका प्रमाण है. अथ दीपोच्छ्रित्यानयनाय करणसूत्रं वृत्तार्- र्द्धम्- दीपककी उँचाईका प्रमाण जाननेकी रीति आधा श्लोकमें लिखते हैं- छायाहते तु नरदीप्तलांतरघ्ने शङ्कौ भवेन्नरयुते खलु दीपकोच्च्यम् ॥ ६१ ॥ अन्वयः-खलु शंकौ नरदीप्तलांतरघ्ने छायाहते नरयुते च दीपकोच्च्यं भवत् ॥ ६१ ॥
५. छाया-व्यवहार, कुट्टक व अंकपाश (क्रमचय-संचय)
छायाव्यवहारः । (२१६) अर्थः-दीपककी उँचाई जाननेके लिये शंकुको शंकु और दीपकके मध्यकी भूमिके प्रमाणसे गुणा करे, फिर छायाके प्रमाणका भाग दे जो लब्धि मिले उसमें शंकुके प्रमाणको जोड दे तब दीपककी उँचाई मिलती है ॥ ६१ ॥ उदाहरणम्- प्रदीपशंकन्तरभूमित्रिहस्ता छायांगुलैः षोडशभिः समाचेत् ॥ दीपोच्छ्रितिरस्यात्कियती वदाऽऽशु प्रदीपशंकन्तरमुच्यतां मे ॥ ४२ ॥ अन्वयः-चेत् प्रदीपशंकंतरभूमिः त्रिहस्ता षोडशभिः अंगुलैः समा छाया तदा दीपोच्छ्रितिः कियती स्यात् इति मे आशु वद प्रदीपशंकन्तरं च उच्यताम् ॥ ४२ ॥ अर्थः-यदि दीपक और शंकुके मध्यकी भूमिका प्रमाण ३ हाथ है और १६ सोलह अंगुलके प्रमाणकी छाया है, तो दीपककी उँचाई कितनी होगी ? यह मुझसे शीघ्र कहो और दीपक और शंकुका अन्तर भी कहो ॥ ४२ ॥ न्यासः- शंकुः १२ छायांगुलानि १६ । शंकुप्रदीपान्तरहस्ताः ३ । लब्धं दीपकोच्च्यं हस्ताः ११/४ । फैलाव-छायाका प्रमाण तथा दीपक और शंकुके मध्यकी भूमिका प्रमाण जान- कर दीपककी उँचाई जाननेके लिये शंकु १/२ को शंकु और दीपके मध्यकी भूमि ३ से गुणा किया तब ३/२ हुए; इसमें छाया २/३ का भाग दिया तब ९/४ हुए; इसमें शंकु १/२ को जोडा तब ११/४ हुए; यही दीपककी उँचाई है. प्रदीपशंकंतरभूमानानयनाय करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्- दीपक और शंकुके बीचकी भूमिका प्रमाण जाननेके लिये रीति आधा श्लोक- विशंकुदीपोच्छ्रयसंगुणा भा शंकूद्धता दीपनरान्तरं स्यात् ॥ ऽऽ ॥ अन्वयः-भा विशंकुदीपोच्छ्रयसंगुणा शंकूद्धता दीपनरान्तरं स्यात् ॥ ऽऽ ॥
( २१६ ) लीलावती । अर्थ:-छायाको शंकु और दीपककी उँचाईके अन्तरसे गुणा करे तब जो गुणन- फल हो उसमें शंकुको घटा दे तब जो शेष बचे वह शंकु और दीपककी मध्यकी भूमिका प्रमाण होता है ॥ ८५ ॥ उदाहरणं पूर्वोक्तमेव- जो कि पहिले उदाहरणमें छायाका प्रमाण सोलह १६ अंगुल कहा है और दीपककी उँचाई ११०/२४ है; शंकु १६ सोलह अंगुल है तहां दीपक और शंकुकी मध्यकी भूमिका प्रमाण कहो. दीपोच्छ्राय: ११०/२४ शंक्वंगुलानि १२ छाया १६ लब्धा: शंकुप्रदी- पान्तरहस्ताः ३ ॥ दीपोच्छ्रितिः ११०/२४ शंकुः १/२ भू. ३ छा. २/३ फैलाव-अब दीपककी उँचाई तथा शंकु प्रमाण और छाया जानकर दीपक और शंकुके बीचकी भूमिका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीति के अनुसार दीपककी उँचाई ११०/२४ और शंकु १/२ अंतर छाया २/३ को दीपककी उंचाई ११०/२४ शंकुः १/२ भू. अंतर ३ छा. २/३ गुणा करा तब ३/२ हुआ, इसमें शंकु १/२ का भाग लिया तब ३ मिले, यही दपिकके और शंकुके मध्यकी भूमिका प्रमाण है ॥ छायाप्रदीपांतरदीपौच्च्यानयनाय करणसूत्रं सार्द्धं वृत्तम्- दो शंकु और उनकी छाया और पहले शंकुतलसे दूसरे शंकुतलकी छायाके अन्त- पर्यन्तकी भूमि जानकर दीपककी उँचाई और दीपतल शंकुके मध्यकी भूमिके जाननेकी रीति डेढ़ श्लोकमें- छायाग्रयोरन्तरसंगुणा भा छायाप्रमाणांतरहृद्भवेद्भूः ॥ ६२ ॥ भूशंकुघातः प्रभया विभक्तः प्रजायते दीपशिखोच्चयमेवम् ॥ त्रैराशिकेनैव यदेतदुक्तं व्याप्तं स्वभेदैर्हरिणेव विश्वम् ॥ ६३ ॥ अन्वयः-छायाग्रयोः अंतरसंगुणा भा छायाप्रमाणांतरहत् भूः भवेत् । भूशंकु- घातः प्रभया विभक्तः कार्य्यः एवं दीपशिखोच्चयं जायते हरिणा स्वभेदैः व्याप्तम् विश्वम् इव यत् उक्तम् एतत् सर्वं त्रैराशिकेन एव व्याप्तम् ॥ ६२ ॥ ६३ ॥ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri
छायाव्यवहारः । ( २१७ ) अर्थः-पहली छायाके अग्रसे दूसरे छायाके अग्रपर्यन्त जो मध्यकी भूमि है उससे अलग २ दोनों छायाओंको गुणा करे जो गुणन फल हो उसमें दोनो छाया- ओंको अन्तरका भाग दे जो लब्धि हो वह उसी उस छायाके अग्रसे दीपकके तलेपर्यन्तकी भूमिका प्रमाण होता है; फिर भूमि और शंकुका घात करे उसमें छायाका भाग दे. इस प्रकार दीपककी शिखाकी ऊँचाई मालूम होजाती है; जिस प्रकार अपने अनेक भेदोंसे ईश्वर करके यह संसार व्याप्त है तिसी प्रकार यहाँ- पर्यन्त लीलावतीमें जो कुछ गणित कहा वह सब त्रैराशिकसे व्याप्त है॥ ६२॥ ६३॥ उदाहरणम्- शंकोर्भार्कमितांगुलस्य सुमते दृष्टा किलाष्टांगुला छायाग्राभिमुखे करद्वयमिते न्यस्तस्य देशे पुनः ॥ तस्यैवार्कमितांगुला यदि तदा छायाप्रदीपांतरं दीपोच्चञ्च कियद्वद व्यवहृतिं छायाभिधां वेत्सि चेत् ॥४३॥ अन्वयः-हे सुमते ! किल यदि अर्कमितांगुलस्य शंकोः भा अष्टांगुला पुनः छाया ग्राभिमुखे करद्वयमिते देशे न्यस्तस्य तस्य एव छाया अर्कमितांगुला तदा प्रदीपा- न्तरं दीपोच्चयं च कियत् इति वद चेत् छायाभिधां व्यवहृतिं वेत्सि ॥ ४३ ॥ अर्थः-दीपककी चाँदनीमें दीपकसे कुछ दूरपर एक शंकु गढा है, वह १२ बारह गिरेका है; उस शंकुकी छायाका प्रमाण ८ अंगुल है, उसी छायाकी मूधपर पहिले शंकुसे दो २ हाथ आगे उसी शंकुको गाडा तो उस शंकुकी छाया १२ बारह अंगुल मिली तो कहो कि वह शंकु दीपकसे कितनी कितनी दूर पर थे और दीपक कितना ऊँचा था ? यदि छायाव्यवहारको जानते हो तो शीघ्र बताओ॥४३॥ न्यासः-अत्र छायाय- योरन्तर मंगुलात्मकं ५२ छाये च ८।१२। अनयोराद्या ८इयमने- न ५२ गुणिता ४१६ छाया प्रमाणांतरेण ४ भक्ता लब्धं भूमानम्
[चित्र-विवरण (Diagram Text): दीपकशिखोन्नतिः । शं. १/२, शं. १/२ भूः १३/३ छा. १/३ भूः १३/२ छा. १/२ शंकुवंतरभूः २]
(२१८) लीलावती।
१०४ इदं प्रथमच्छायाग्रदीप्तलयोरन्तरमित्यर्थः । एवं द्वितीयाग्रान्तरभूमानम् १५६ भूशंकुघातः प्रभया विभक्त इति जातमुभयतोऽपि दीपोच्चं सममेव हस्ताः ६ ३/८ ॥ फैलाव-अब यहां दीपकसे शंकुओंका अन्तर और दीपककी उँचाई जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार क्रिया करनेके अर्थ पहली छायाके अग्रभागसे दूसरी छायाके अग्रभागका अन्तर लिया तो ५२ बावन अंगुल मिले, इससे दोनों छायाओं ८। १२ को गुणा किया तो ४१६। ६२४ हुए; इनमें छायाओं ८ । १२ के अंतर ४ का भाग दिया तब १०४। १५६ मिले, यह अपनी अपनी छायाके अग्र- भागसे दीपकके तलेतककी भूमिका प्रमाण हुआ,परन्तु यह अंगुलात्मक है इसमें २४ का भाग दिया तब हस्तात्मक प्रमाण मिला १३/३ । १३/२ ॥ फिर अपनी अपनी छायाके अग्रभाग- पर्यन्तकी भूमि १३/३ १३/२ से अपने अपने शंकुको गुणा
करा तब १३/६ । १३/४ मिले, इनमें अपनी अपनी छाया १/३ । १/२ का भाग दिया तब १३/२ । १३/२ मिले; यही दीपककी उँचाई है, दोनों भूमियोंसे तुल्य ही मिली ॥ एवमित्यत्र छायाव्यवहारे त्रैराशिककल्पनयानयनं वर्तते । तद्यथा-प्रथमच्छाया ८ तो द्वितीयच्छाया १२ यावता- धिका तावता छायावयवेन यदि छायाग्रान्तरतुल्या भूर्ल- भ्यते तदा छायया किं किमिति एवं पृथक्पृथक् छायाप्र- दीपांतरप्रमाणं लभ्यते । ततो द्वितीयं त्रैराशिकम् । यदि छायातुल्ये भुजे शंकुः कोटिस्तदा भूतुल्ये भुजे किमिति लब्धं दीपकोच्चमुभयतोऽपि तुल्यमेव । एवं पंचराशिका- दिकमखिलं त्रैराशिककल्पनयैव सिद्धम् ॥ यथा भग- वता श्रीनारायणेन जननमरणक्लेशाऽपहारिणा निखिल-
८ छायाव्यवहारः । ( २१९ ) जगज्जननैकबीजेन सकलभुवनभावनेन गिरिसरित्सुर- नरासुरादिभिः स्वभेदैरिदं जगद्व्याप्तं तथेदमखिलं गणित- जातं त्रैराशिकेन व्याप्तम् ॥ अर्थ:-इसी प्रकार इस छाया व्यवहारमें दीपककी उँचाई आदि त्रैराशिक कल्पना करनेसे भी मिलती है सोई दिखाते हैं-प्रथम छाया ८ से दूसरी छाया १२ जितनी अधिक है उतने छायाके अवयव ४ से यदि छायाओंके अग्रभागोंके अन्तर ५२ की तुल्य भूमि मिलती है तो पहली छाया ८ से क्या मिलेगी ? यहां छायावयवको प्रमाण माना और उसको आदिमें लिखा और छाया ८ को इच्छा माना और अन्य जाति भूमि ५२ को फल मानके फल इच्छाका घात कर प्रमाणका भाग दिया तब १०४ लब्धि हुए; यही पहली छायाके अग्रभागसे दपिक | प्र. फ. इ. पर्यन्तकी भूमिका प्रमाण है; इसी प्रकार दूसरी छाया १२ | ४ ५२ ८ को इच्छा मान कर त्रैराशिक किया तब दूसरी छायाके अग्र- | ५२ गुणा भागसे दीपकके नीचे पर्यन्तकी भूमिका अंगुलात्मक प्रमाण | ८ १५६ मिला तदनन्तर दूसरा त्रैराशिक किया, यदि छाया | भा.४ ) ४१६ ( १०४ तुल्यभुजासे शंकुप्रमाण कोटि मिलता है, तो भूमितुल्य | लब्धि भुजामें क्या मिलेगा इस प्रकार त्रैराशिक करनेसे दीपककी उँचाई मिलती है यह उँचाई दोनों भूमियोंसे तुल्य ही मिलती है । इसी प्रकार पंचराशिकादि भी त्रैराशि- ककी कल्पनासे ही सिद्ध होता है; जिस प्रकार जन्ममरणरूप संसारके दुःख दूर करनेवाले सम्पूर्ण संसारकी उत्पत्तिके आदिकारण श्रीनारायण विष्णुभगवान करके संपूर्ण संसारके पर्वत नदी देवता मनुष्य और दैत्यादि अपने ही भेदोंसे यह संसार व्याप्त है तिसी प्रकार सम्पूर्ण गणितमात्र त्रैराशिकसे व्याप्त है ॥ यद्येवं तर्हि बहुभिः किमित्याशंक्याऽऽह- यदि त्रैराशिकसे ही सम्पूर्ण गणितमात्र सिद्ध हो जाता है तो फिर पूर्वोक्त बहुतसी रीतियें किस कारण वृथा बनाईं हैं ? इस प्रकार शंका करके उत्तर देते हैं- यत्किंचिद्गुणभागहारविधिना बीजेऽत्र वा गण्यते तत्रैराशिकमेव निर्मलधियामेवावगम्यं विदाम् ॥ एतद्बह्वथास्मदादिजडधीधीवृद्धिवुद्ध्या बुधैस्तद्भे- दान्सुगमान्विधाय रचितं प्राज्ञैः प्रकीर्णादिकम् ॥ ६४ ॥ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri
( २२० ) लीलावती । अन्वयः-अत्र बीजे वा गुणभागहारविधिना यत्किंचित् गण्यते तत् त्रैराशिकम् एव निर्मलधियां विदाम् एव अवगम्यम् । यत् एतत् बहुधा प्रकीर्णादिकं दृश्यते तत् प्राज्ञैः बुधैः अस्मदादिजडधीधीवृद्धिवृद्ध्या सुगमान् तद्भेदान् विधाय रचितम् ॥ ६४ ॥ अर्थः-इस पाटीगणितमें या बीजगणितमें गुणा और भागकी रीतिसे जो कुछ गणित कहा है, वह सब त्रैराशिकही है, परन्तु वह निर्मल बुद्धिवाले विद्वानोंके ही जाननेयोग्य है और जो कुछ यह अनेक प्रकारकी गणितकी रीतियें देखनेमें आती हैं, सो तीक्ष्णबुद्धिवाले पंडितोंने अस्मदादि मूढबुद्धियोंकी बुद्धिकी वृद्धि होनेके लिये उस त्रैराशिकके ही भेदोंको सरल रीतिसे रचना किया है ॥ ६४ ॥ अथ कुट्टके करणसूत्रं वृत्तपञ्चकम्-- अब कुट्टककी रीति लिखते हैं, पांचश्लोक ( कुट्टक उसको कहते हैं, जहां इस प्रकारका प्रश्न हो कि, किसी अंकको किसी अङ्कसे गुणा करा फिर उस गुणनफ- लमें कुछ अंक जोडा या घटाया, तब जो अंक सिद्ध हो उसमें किसी अंकका भाग देनेसे कुछ शेष नहीं रहता है ) ॥ भाज्यो हारः क्षेपकश्चापवर्त्यः केनाप्यादौ संभवे कुट्टकार्थम् ॥ येन च्छिन्नौ भाज्यहारौ न तेन क्षेपश्चैतद्दुष्टमुद्दिष्टमेव ॥ ६५ ॥ परस्परं भाजितयोर्ययोर्यः शेषस्तयोः स्यादपवर्तनं सः ॥ तेनापवर्तेन विभाजितौ यौ तौ भाज्यहारौ दृढसंज्ञकौ स्तः॥६६॥ मिथो भजेत्तौ दृढभाज्यहारौ यावद्विभाज्ये भवतीह रूपम् ॥ फलान्यधोऽधस्तदधो निवेश्यः क्षेपस्ततः शून्यमुपान्तिमेन ॥ ६७ ॥ स्वोर्द्धे हतेन्त्येन युते तदन्त्यं त्यजेन्मुहुः स्यादिति राशियुग्मम् ॥ ऊर्द्धो विभाज्येन दृढेन तष्टः फलं गुणः स्यादधरो हरेण ॥ ६८ ॥ एवं तदैवात्र यदा समास्ताः स्युर्ल- ब्धयश्चेद्विषमास्तदानीम् ॥ यदागतौ लब्धिगुणौ विशोध्यौ स्वतक्षणाच्छेषमितौ तु तौ स्तः॥ ६९ ॥ अन्वयः-आदौ सम्भवे कुट्टकार्थं केन अपि अंकेन भाज्यः हारः क्षेपः च अपवर्त्यः येन भाज्यहारौ छिन्नौ तेन चेत् क्षेपकः न च्छिन्द्यात् तदा एतत् उद्दिष्टं दुष्टम् एव । परस्परम् भाजितयोः ययोः यः शेषः सः तयोः अपवर्तनं स्यात् । तेन अपवर्तेन
कुट्टकव्यवहारः । (२२१) विभाजितौ यौ भाज्यहारौ तौ दृढसंज्ञकौ स्तः । यावत् विभाज्ये इह रूपं भवति तावत् दृढभाज्यहारौ मिथः भजेत् फलानि अधः अधः निवेश्यानि तदधः क्षेपः निवेश्यः । ततः शून्यं निवेश्यम् उपान्तिमेन स्वोर्ध्वे हते अन्त्येन युते तदन्त्यं त्यजेत् एवम् मुहुः कार्य्यम् इति राशियुग्मं स्यात् । दृढेन भाज्येन तष्टः ऊर्ध्वः फलं स्यात् । हरेण तष्टः अधरः गुणः स्यात् एवं तदा एव यदा ताः लब्धयः समाः स्युः चेत् विषमाः तदानीं यदागतौ लब्धिगुणौ स्वतक्षणात् विशोध्यौ, शेषमितौ तौ स्तः ॥ ६५ ॥ ६६ ॥ ६७ ॥ ६८ ॥ ६९ ॥ अर्थः-यदि पहले सम्भव हो तो कुट्टक करने के लिये किसी अंकका भाज्यहार और क्षेपमें अपवर्तन दे, जिस अपवर्तनके अंकसे भाज्य और भाजक निःशेष हो जाय, परन्तु क्षेप निःशेष न हों तो उस प्रश्नको ही दुष्ट कह दे, (पहले भाज्यहारका अपवर्तनांक जाननेकी रीति लिखते हैं, ) जिन दो अंकोंमें अपवर्त- न देना हो उनमें परस्पर एक एकमें भाग दे, जो शेष रहे, वही उन दोनों अंकोंका अपवर्तन अंक होता है, इस अपवर्तन अंकसे विभाजित (भाग दिये हुए) भाज्य और हार दृढसंज्ञक होते हैं। जबतक भाग देते देते एक शेष रह जाय तब- तक परस्पर भाग दे, जो लब्धि हों उनको नीचे नीचे लिखता जाय, उन लब्धियोंके नीचे क्षेप रक्खे, तदनन्तर शून्य रक्खे (इस प्रकार अंकोंको रखनेसे एक वल्ली (पंक्ति) बन जायगी (उस पंक्तिमें) उपान्तिक अर्थात् सबसे नीचेके दूसरे अङ्कसे उससे ऊपरके अङ्कको गुणा करे जो गुणनफल मिले उसमें अन्तके अर्थात् सबसे नीचेके अङ्कको जोड दे और फिर अंतके अंकको मिटा दे, इस प्रकार वारंवार करे तो दो राशि हो जायँगी, ऊपरकी राशिको दृढ भाज्यसे तष्टे और नीचेकी राशिको दृढ भाजक (हर) से तष्टे. (और दोनोंके तष्टनेमें लब्धि तुल्य ही ले.) दोनों स्थानोंमें तष्टनेसे जो अंक शेष रहें उनमें नीचेका अङ्क गुणा होगा, ऊपरको अङ्क लब्धि कहा जायगा यह रीति गुणलब्धिकी तब होगी; जब लब्धियोंकी वल्ली सम होगी और यदि लब्धियोंकी विषम वल्ली हो तो जो लब्धिगुण आये हैं उनमें अपने अपने तष्टनेवाले अङ्कोंको घटा दे, तब जो अङ्क शेष रहें वह गुण और लब्धि होंगे ॥ ६५ ॥ ६६ ॥ ६७ ॥ ६८ ॥ ६९ ॥ उदाहरणम्- एकविंशतियुतं शतद्वयं यद्गुणं गणकपञ्चषष्टियुक् ॥ पंचवर्जितशतद्वयोद्धृतं शुद्धिमेति गुणकं वदाशु तम् ॥ ४४ ॥ अन्वयः-हे गणक ! एकविंशतियुतं शतद्वयं यद्गुणं पञ्चषष्टियुक् पंचवर्जितशतद्व- योद्धृतं शुद्धम् एति तं गुणकम् आशु वद ॥ ४४ ॥
(२२२) लीलावती। अर्थ:-हे गणक ! दोसौ इक्कीसको जिसकिसी अंकसे गुननेपर फिर गुणित अंकोंमें ६५ मिलानेसे फिर १९५ का भाग देनेसे निःशेष हो जाता है तो कहो कि, वह कौनसा अङ्क है जिसमें २२१ को गुणा करा था ॥ ४४ ॥ न्यासः-भाज्यः २२१ हारः १९५ क्षेपः ६५ अत्र परस्परभाजितयोर्भाज्यभाजकयोः शेषम् १३ अनेन भाज्यहारक्षेपाः अपवर्तिता जाताः भाज्यः १७ हारः १५ क्षेपः ५ अनयोर्दृढभाज्यहारयोः परस्पर- भक्तयोर्लब्धान्यधोऽधस्तदधः क्षेपः तदधः शून्यं निवे- श्यमिति न्यस्ते जाता वल्ली [ १ / ७ / ५ / ० ] उपान्तिमेन स्वोर्ध्वे हते इत्यादिकरणेन जातं राशिद्वयम् ४० / ३५ एतौ दृढभाज्यहाराभ्यां १७ / १५ तष्टौ लब्धिगुणौ जातौ ६।५ इष्टाहतस्वस्वहरेण युक्ते इति वक्ष्यमाणविधिनैताविष्टगु- णितस्वतक्षणयुक्तौ वा लब्धिगुणौ २३ । २० द्विकेनेष्टेन वा ४० । ३५ इत्यादि ॥ अर्थ:-ऊपर कही हुई अपवर्तन अङ्क जाननेकी रीति के अनुसार भाज्य २२१ में भाजक १९५ का भाग दिया तब १३ शेष रहे यही यहाँ अपवर्तन अंक है इस १३ का भाज्य २२१ हार १९५ और क्षेप ६५में भाग दिया तब निःशेष हो जाता है, इस कारण यह प्रश्न भी शुद्ध है. इसका भाज्य २२१ हार १९५ क्षेप ६५ में अपवर्तन दिया तब दृढसंज्ञक हुए भाज्य १७ हर १५ क्षेप ५ इन दृढभाज्य हरमें परस्पर भाग दिया तब १५ ) १७ ( १ जो लब्धि मिली २ ) १५ ( ७ उनको नीचे लिखा १५ / २ फिर उसके नीचे दृढ १४ / १ क्षेप ५ को लिखा | १ | ७ | ५ | ० | फिर उसके नीचे शून्यलिखा तब वल्ली हुई इस वल्लीमें उपान्त्य अर्थात् अन्तके समीपके अंक ५ से उसके ऊपरके अंक ७ का गुणा करा तो पैंतीस ३५ हुए इसमें अंतके अंकको जोडा तब ३५ हुए फिर अन्तके अंक ० को मेट डाला तो ३५ / ५ इस प्रकार वल्ली हुई. अब फिर उसी प्रकार उपान्त्यके अङ्क ३५ को अपने ऊपरके अङ्क १ से गुणा करा तब ३५ हुए, इसमें अन्तके अङ्क ५ को जोडा तब ४० हुए फिर अन्तके अंकको मेट डाला तब ४० / ३५ इस प्रकार
कुट्टकव्यवहारः । (२२३) दो राशि हुई; इसमें ऊपरकी राशिको दृढभाज्य १७ से तष्टा और नीचेकी राशिको दृढ हरसे तष्टा तो शेष अंक मिले |६ ल| इसमें ऊपरकी राशि लब्धि और नीचेकी |५ गु| गुण है. यद्यपि प्रश्न गुणके अंकका ही था तथापि प्रसङ्गसे लब्धि भी आजाती है यह जो गुणक मिला है, सो सबसे छोटा है; इसको छोडकर और कोई छोटा गुणक अंक नहीं मिलेगा और यह लब्धिका अंक भी सबसे छोटा है, यह वही गुणक अंक ५ मिला है, जिससे दोसौसे इक्कीसको गुणा कर पैंसठ मिलाये जायँ और फिर १९५को भाग दिया जाय तो अंक निःशेष हो जाता है; इस गुण लब्धिसे दूसरे भी गुणलब्धि आगे कही हुई "इष्टाहतस्वस्वहरेण युक्तः"-पहली रीतिसे सबसे छोटा जो गुणलब्धि मिली है उनमें किसी इष्टसे गुणेहुए अपने २ तक्षक अंकको जोडनेसे पहलेलाई हुई गुणलब्धिसे दूसरी गुणलब्धि मिलती है अर्थात् किसी इष्टसे गुणा करे हुए भाज्यको लब्धिमें जोडै और उसी इष्टसे गुणा करे हुए भाजकको गुणमें जोडे इस रीतिसे अनेक प्रकारकी गुणलब्धि मिलती है; जिस प्रकार यहाँ पहली रीतिसे लाई हुई लब्धि ६ है और गुण ५ है और दृढभाज्य १७ और दृढभाजक १५ है; यह दृढभाज्यभाजक लब्धि और गुणके तक्षक हैं; इन १७ । १५ को इष्ट १ से गुणा किया तब लब्धिगुणमें ६ । ५ जोडा तो २३ । २० हुए, यहां जो गुणक अंक २० मिला है उससे भी २२१ को गुणा कर ६५ जोडे और १९५ का भाग दिया तब निःशेष हो जाता है; इसी प्रकार २ को इष्ट माननेसे ३९ । ४०, तीनको इष्ट मानने से ५० । ५७ इसी प्रकार नाना प्रकारके इष्ट माननेसे गुणलब्धि नाना प्रकारके होते हैं । कुट्टकान्तरे करणसूत्रंवृत्तम्- कुट्टक करनेकी और रीति श्लोक एक- भवति कुट्टविधेर्युतिभाज्ययोः समपवर्तितयोरपि वा गुणः ॥ भवति यो युतिभाजकयोः पुनः स च भवेदपवर्तनसंगुणः॥७०॥ अन्वयः-समपवर्तितयोः युतिभाज्ययोः अपि कुट्टविधेः गुणः भवति वा यः समपवर्तितयोः युतिभाजकयोः गुणः भवति स च पुनः अपवर्तनसंगुणः गुणः भवेत् ॥ ७० ॥ अर्थः-जिस प्रकार पहले भाज्य भाजक और क्षेप इन तीनोंमें अपवर्तन देकर दृढभाज्य, भाजक और क्षेप बनाके गुणलब्धि मिलती है; तिसी प्रकारके केवल भाज्य क्षेपमें भी अपवर्तन देकर पहली रीतिसे वल्ली बनाकर कही हुई रीतिसे गुण और लब्धि लावे, यदि भाजक और क्षेपमें अपवर्तन देकर गुणका साधन करा हो
( २२४ ) लीलावती । तो उस गुणको अपवर्तन अंकसे गुणा करे तब गुण होगा; फिर गुणसे भाज्यको गुणा करके जो गुणनफल मिले उसमें क्षेपको जोडकर या घटाकर हरका भाग देजो मिले वह लब्धिका प्रमाण होगा ॥ ७० ॥ उदाहरणम्- शतं हतं येन युतं नवत्या विवर्जितं वा विहृतं त्रिषष्ट्या ॥ निरग्रकं स्याद्वद मे गुणं तं स्पष्टं पटीयान्यदि कुट्टकेऽसि। ४५। अन्वयः-हे सखे ! शतं येन हतं नवत्या युतं वा विवर्जितं त्रिषष्ट्या विहृतं निरग्रकं स्यात् । यदि कुट्टके पटीयान् असि तर्हि तं गुणं मे स्पष्टं वद ॥ ४५ ॥ अर्थः-हे मित्र ! सौको जिस किसी अंकसे गुणा कर उसमें ९० नव्वे जोडे या घटाये फिर ६३ तिरसठका भाग दिया तो निःशेष होगया; यदि कुट्टकके गणितमें चतुर हो तो कहो कि, वह कौनसा अंक है जिससे कि, सौको गुणा किया था॥४५॥ न्यासः-भाज्यः १०० हारः ६३ क्षेपः ९० | १ जाता पूर्व वल्लब्धिक्षेपाणां वल्ली उपान्तिमेन | १ स्वोर्द्धे हतेऽन्त्येन युत इत्यादि करणेन जातं | १ राशिद्वयं २४३०/१५३० जातौ पूर्ववल्लब्धिगुणौ ३० । १८ | २ अथवा भाज्यक्षेपौ दशभिरपवर्त्य भाज्यः १० क्षेपः९ | २ परस्परभजनाल्लब्धानि फलानि क्षेपं शून्यं चाधोऽ- | १ धो निवेश्य जाता वल्ली { १/१/१/९/० } पूर्ववल्लब्धो गुणः ४५ अत्र | ९० लब्धिर्न ग्राह्या यतो लब्धयो विषमा जाताः अतो | ० हरेण ४५ स्वतक्षणा ६३ तस्माद्विशोधिते जातो गुणः स एव १८ गुणन्नभाज्ये क्षेप ९० युते हर ६३ तष्ट लब्धिश्च ३० अथवा हारक्षेपौ ६३ । ९० नवभिरपवर्तितौ जातौ हारक्षेपौ ७ । १० लब्धो गुणः २ क्षेपहारापवर्तन- ९ गुणितौ जातः स एव गुणः १८ अत्रलब्धि- { १४/३/१०/० } भाज्यः १०० भाजक ६३ क्षेपे ९०- क्षेपाणां वल्ली भ्यो लब्धिश्च ३०
कुट्टकव्यवहारः । ( २२५ ) अथवा भाज्यक्षेपौ पुनर्हारक्षेपौ चापवर्तितौ जातौ भाज्य- हारौ १० । ७ क्षेपः १ ॥ अत्र पूर्ववत् ⎧ गुणश्च २ हारक्षेपापवर्तनेन गुणितो जातः जाता वल्ली ⎩ स एव गुणः १८ पूर्ववल्लब्धिश्च ३० दृष्टाहतस्वस्वहरेण युक्त इत्यादिनाऽथवा गुणलब्धी ८१ । १३० फैलाव-यहां भाज्य १०० हर ६३ क्षेप ९० है, पहले कही हुई रीति के अनुसार वल्ली बनानेके लिये भाज्य १०० में भाजक ६३ का भाग दिया तब १ एक मिला १ फिर ३७ बचे उसका तिरसठमें भाग दिया तब एक मिला, इसको वल्लीमें १ लिखा फिर २६ बचे इसका तीस ३० में भाग दिया तब एक लब्धि हुई, १ इसको भी वल्लीमें लिखा, फिर ११ बचे, इसका छव्वीसमें भाग दिया तब दो २ २ लब्धि हुए, इनको भी वल्लीमें लिखा, फिर ४ बचे, इसका ग्यारहमें भाग २ दिया तब दो लब्धि हुए, इनको भी वल्लीमें लिखा, फिर ३ बाकी रहे, १ इसका चारमें भाग दिया तब एक लब्धि हुआ, उसको वल्लीमें लिखा, तब ९० ९० एक बच रहा, इस कारण वल्लीमें अब लब्धियोंके नीचे क्षेप ९० को लिखा, ०० तदनन्तर सबसे नीचे शून्य लिखा तब वल्ली बन गयी, यह समवल्ली हुई इसमें उपा- न्त्यके अङ्कसे उसके ऊपरके अङ्कको गुणाकर नीचेका मिलाकर अन्तके अङ्कको मेट दे, इस पहले कही हुई रीति के अनुसार गणित करते करते दोनों राशि मिलीं ३४५० / १८९० इन दोनों राशियोंको अपने अपने तक्षक १०० । ६३ से तष्टा तो रहे ३० / १८ इनमें १८ गुण है और ३० लब्धि है ॥ अथवा भाज्य १०० क्षेप ९० में दशका परिवर्तन दिया तब तीनों राशि हुई भाज्य १० हर ६३ क्षेप ९ यहाँ भी पहले कही हुई रीति के अनुसार वल्ली ० बनाई और उपान्त्यके अंकसे उसके ऊपरके अङ्कको गुणा करके अन्तको ६ जोडकर अंतका अंक मिटाडाला, इस प्रकार गणित करते करते दोनों राशि ३ मिलीं २७ / १७० इनमें अपने अपने तक्षक १० । ६३ से तष्टा तो ८ / ३५ रहे. ९ परन्तु विषमवल्ली है इस कारण पहले कही हुई रीतिके अनुसार इन्हें ८ / ३५ अपने अपने तक्षक १० । ६३ मेंसे घटा दिया तो शेष ३ / १८ रहे, इनमें गुण १८ है ० सो तो ठीक है और यदि लब्धि ठीक जाननी हो तो भाज्यसे गुणको गुणा करनेसे जो गुणन फल हो उसमें क्षेपको जोडकर हरका भाग दे जो मिले वह लब्धि है, यहाँ इसी प्रकार किया तो ३० लब्धि मिली ॥ १५ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri
(२२६) लीलावती । अथवा हर ६३ क्षेप ९० में नौ ९ से अपवर्तन दिया तब हार ७ क्षेप ९ हुए; यहाँ पहले कही हुई रीति के अनुसार भाज्य १०० हार ७ का परस्पर ∣ १४ भाग देकर लब्धि नीचे नीचे रखते गये, फिर उन लब्धियों के नीचे क्षेप को ∣ ३ रखा क्षेप के नीचे शून्य रक्खा तब समवल्ली हुई, फिर ऊपर कही हुई रीति के ∣ १० अनुसार उपान्त्य के अङ्क १० से उसके ऊपर के ३ को गुणा किया तो ∣ ० ३० हुए; इसमें अन्त का अंक जोडा और अन्के अंक को मेट दिया तब वल्ली हुई $\begin{matrix} १४ ३० १० \end{matrix}$ यहाँ फिर उपान्त के अंक ३० से उसके ऊपर के अंक १४ को गुणा करा तो ४२० हुए; इसमें अन्त के अंक १० को जोडकर अन्त्य के अंक को मेट दिया, तब सबसे ऊपर के अंक $\frac{४३०}{३०}$ मिले, इन दोनों राशियों को अपने अपने तक्षक १००।७ से तष्टा तो $\frac{३०}{२}$ हुए, इनमें २ गुण हैं और ३० लब्धि है अब ऊपर कही हुई रीति के अनुसार २ गुण को अपवर्तन अंक ९ से गुणा किया तो वही पहला गुणक अङ्क १८ मिला और लब्धि ३० मिली ॥ अथवा पहले भाज्य १०० क्षेप में दश का अपवर्तन दिया तब १०।९ हुए, फिर अपवर्तितक्षेप ९ और हार ६३ में नौ का अपवर्तन दिया तब क्षेप १ हार ७ हुए; इस प्रकार करने से भाज्य १० क्षेप १ हार ७ हुए; यहां पहले कही हुई रीति के अनु- सार भाज्य १० और हार ७ का परस्पर भाग देकर उसका लब्धियों के ∣ १ नीचे क्षेप को लिखा, फिर उसके नीचे शून्य लिखा तो समवल्ली बनी, यहां पहले ∣ २ कही हुई रीति के अनुसार ऊपर के दोनों अंक $\frac{३}{२}$ मिले, यहां गुण २ है, इसको ∣ १ पहले कही हुई रीति के अनुसार हार क्षेप के अपवर्तन अंक ९ से इस गुण २ ∣ ० को गुणा किया तो १८ हुए यही पहले लाया हुआ गुणक अंक मिला और पहले कही हुई रीति के अनुसार भाज्य १०० भाजक ६३ क्षेप ९० से लब्धि मिली, ३० यहां “इष्टाहतस्वस्वहरेण युक्ते” इन गुणलब्धि में इष्ट से गुणे हुए अपने अपने तक्षक को जोड दे; इस रीति के अनुसार अनेक प्रकार की गुणलब्धि मिलती है, जैसे ऊपर मिली हुई गुणलब्धि १८।३० में इष्ट १ से गुणे हुए अपने अपने तक्षक ६३।१०० के जोडने से गुणलब्धि मिली ८१ । १३० इसी प्रकार दो २ के इष्ट से गुणलब्धि मिली १४४ । २३० तीन के इष्ट से गुणलब्धि मिली २०७ । ३३० इस प्रकार के जितनी प्रकार के इष्ट मानें जायेंगे; उतनी ही प्रकार की गुणलब्धि होंगी. कुट्टकान्तरे करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्– कुट्टक में ऋणक्षेप के गुण और लब्धि जानने की रीति आधा श्लोक में– क्षेपजे तक्षणाच्छुद्धे गुणाप्ती स्तो वियोगजे ॥ ५५ ॥
कुट्टकव्यवहारः । (२२७) अन्वयः-यत उक्तं तत् क्षेपजे वियोगजे तु तक्षणात् शुद्धे गुणाप्ती स्तः ॥ अर्थः-जो कुछ ऊपर रीति कही सो धनक्षेपकी थी यदि ऋणक्षेप हो तो वल्लीसे जो गुणलब्धि मिलें उन्हें अपने अपने तक्षकमेंसे घटा दे जो शेष रहें उनको गुण और लब्धि जाने ॥ ५५ ॥ अत्र पूर्वोदाहरणे नवतिक्षेपे यौ लब्धिगुणौ जातौ ३० । १८ एतौ स्वतक्षणाभ्यामाभ्यां १०० । ६३ शोधितौ ये शेषके तन्मितौ लब्धिगुणौ नवतिशोधने ज्ञातव्यौ ७० । ४५ एतयोरपि स्वतक्षणं क्षेप इति १७० । १०८ अथवा २७० । १७१ ॥ फैलाव-यहाँ पहले ही उदाहरणमें अर्थात् भाज्य १०० हार ६३ क्षेप ९० से जो गुणलब्धि मिले हैं १८ । ३० इनको अपने अपने तक्षक ६३ । १०० मेंसे घटाया तो ४५ । ७० रहे; यही लब्धि गुण आवेंगे, यदि नब्बेको जोडनेकी जगह घटाया जाय तो, क्योंकि यदि १०० को ऋणक्षेपकी रीतिसे लाये हुए ४५ गुणसे गुणा किया तब ४५०० हुए, इसमें ९० को घटाया तो ४४१० रहे, इनमें ६३ का भाग दिया तो निःशेष हो गया और ७० लब्धि हुए; इससे मालूम हुआ कि, ऊपरकी रीतिके अनुसार ऋणक्षेपमें लाये हुए लब्धि ७० और गुणा ४५ ठीक हैं; इन ४५ । ७० गुणलब्धियोंमें भी इष्टसे गुणे हुए अपने अपने तक्षक जोडनेसे अनेक प्रकारकी गुणलब्धि मिल जाती हैं, जैसे ऋणक्षेपकी गुणलब्धि ४५। ७० हैं, इनमें एक १ इष्टसे गुणा किये हुए अपने अपने तक्षक ६३ । १०० को जोडा तब १०८ । १७० इसी प्रकारका २ दोके इष्टसे १७१ । २७० गुण और लब्धि होते हैं ॥ द्वितीयोदाहरणम्- यद्गुणा गणक षष्टिरन्विता वर्जिता च दशभिः षडुत्तरैः ॥ स्यात्त्रयोदशहता निरग्रका तं गुणं कथय मे पृथक्पृथक्४६ ॥ अन्वयः-हे गणक ! यद्गुणा षष्टिः षडुत्तरैः दशभिः अन्विता वा वर्जिता ततः त्रयोदशहता निरग्रका स्यात् तं गुणम् मे पृथक् पृथक् कथय ॥ ४६ ॥ अर्थः-हे गणक ! जिस किसी अङ्कसे गुणा करेहुए साठमें सोलह १६ घटा दिये या जोड दिये, तदनन्तर तेरहका भाग देनेसे कुछ शेष नहीं रहता है, तो कहो जिस अङ्कसे गुणा करके सोलह १६ जोडे और जिस अङ्कसे गुणा करके सोल- हको घटाया वह अङ्क कौन है जिससे ६० को गुणा किया जाय ॥ ४६ ॥