भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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( २१६ ) लीलावती । अर्थ:-छायाको शंकु और दीपककी उँचाईके अन्तरसे गुणा करे तब जो गुणन- फल हो उसमें शंकुको घटा दे तब जो शेष बचे वह शंकु और दीपककी मध्यकी भूमिका प्रमाण होता है ॥ ८५ ॥ उदाहरणं पूर्वोक्तमेव- जो कि पहिले उदाहरणमें छायाका प्रमाण सोलह १६ अंगुल कहा है और दीपककी उँचाई ११०/२४ है; शंकु १६ सोलह अंगुल है तहां दीपक और शंकुकी मध्यकी भूमिका प्रमाण कहो. दीपोच्छ्राय: ११०/२४ शंक्वंगुलानि १२ छाया १६ लब्धा: शंकुप्रदी- पान्तरहस्ताः ३ ॥ दीपोच्छ्रितिः ११०/२४ शंकुः १/२ भू. ३ छा. २/३ फैलाव-अब दीपककी उँचाई तथा शंकु प्रमाण और छाया जानकर दीपक और शंकुके बीचकी भूमिका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीति के अनुसार दीपककी उँचाई ११०/२४ और शंकु १/२ अंतर छाया २/३ को दीपककी उंचाई ११०/२४ शंकुः १/२ भू. अंतर ३ छा. २/३ गुणा करा तब ३/२ हुआ, इसमें शंकु १/२ का भाग लिया तब ३ मिले, यही दपिकके और शंकुके मध्यकी भूमिका प्रमाण है ॥ छायाप्रदीपांतरदीपौच्च्यानयनाय करणसूत्रं सार्द्धं वृत्तम्- दो शंकु और उनकी छाया और पहले शंकुतलसे दूसरे शंकुतलकी छायाके अन्त- पर्यन्तकी भूमि जानकर दीपककी उँचाई और दीपतल शंकुके मध्यकी भूमिके जाननेकी रीति डेढ़ श्लोकमें- छायाग्रयोरन्तरसंगुणा भा छायाप्रमाणांतरहृद्भवेद्भूः ॥ ६२ ॥ भूशंकुघातः प्रभया विभक्तः प्रजायते दीपशिखोच्चयमेवम् ॥ त्रैराशिकेनैव यदेतदुक्तं व्याप्तं स्वभेदैर्हरिणेव विश्वम् ॥ ६३ ॥ अन्वयः-छायाग्रयोः अंतरसंगुणा भा छायाप्रमाणांतरहत् भूः भवेत् । भूशंकु- घातः प्रभया विभक्तः कार्य्यः एवं दीपशिखोच्चयं जायते हरिणा स्वभेदैः व्याप्तम् विश्वम् इव यत् उक्तम् एतत् सर्वं त्रैराशिकेन एव व्याप्तम् ॥ ६२ ॥ ६३ ॥ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri