लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछायाव्यवहारः । ( २१७ ) अर्थः-पहली छायाके अग्रसे दूसरे छायाके अग्रपर्यन्त जो मध्यकी भूमि है उससे अलग २ दोनों छायाओंको गुणा करे जो गुणन फल हो उसमें दोनो छाया- ओंको अन्तरका भाग दे जो लब्धि हो वह उसी उस छायाके अग्रसे दीपकके तलेपर्यन्तकी भूमिका प्रमाण होता है; फिर भूमि और शंकुका घात करे उसमें छायाका भाग दे. इस प्रकार दीपककी शिखाकी ऊँचाई मालूम होजाती है; जिस प्रकार अपने अनेक भेदोंसे ईश्वर करके यह संसार व्याप्त है तिसी प्रकार यहाँ- पर्यन्त लीलावतीमें जो कुछ गणित कहा वह सब त्रैराशिकसे व्याप्त है॥ ६२॥ ६३॥ उदाहरणम्- शंकोर्भार्कमितांगुलस्य सुमते दृष्टा किलाष्टांगुला छायाग्राभिमुखे करद्वयमिते न्यस्तस्य देशे पुनः ॥ तस्यैवार्कमितांगुला यदि तदा छायाप्रदीपांतरं दीपोच्चञ्च कियद्वद व्यवहृतिं छायाभिधां वेत्सि चेत् ॥४३॥ अन्वयः-हे सुमते ! किल यदि अर्कमितांगुलस्य शंकोः भा अष्टांगुला पुनः छाया ग्राभिमुखे करद्वयमिते देशे न्यस्तस्य तस्य एव छाया अर्कमितांगुला तदा प्रदीपा- न्तरं दीपोच्चयं च कियत् इति वद चेत् छायाभिधां व्यवहृतिं वेत्सि ॥ ४३ ॥ अर्थः-दीपककी चाँदनीमें दीपकसे कुछ दूरपर एक शंकु गढा है, वह १२ बारह गिरेका है; उस शंकुकी छायाका प्रमाण ८ अंगुल है, उसी छायाकी मूधपर पहिले शंकुसे दो २ हाथ आगे उसी शंकुको गाडा तो उस शंकुकी छाया १२ बारह अंगुल मिली तो कहो कि वह शंकु दीपकसे कितनी कितनी दूर पर थे और दीपक कितना ऊँचा था ? यदि छायाव्यवहारको जानते हो तो शीघ्र बताओ॥४३॥ न्यासः-अत्र छायाय- योरन्तर मंगुलात्मकं ५२ छाये च ८।१२। अनयोराद्या ८इयमने- न ५२ गुणिता ४१६ छाया प्रमाणांतरेण ४ भक्ता लब्धं भूमानम्
[चित्र-विवरण (Diagram Text): दीपकशिखोन्नतिः । शं. १/२, शं. १/२ भूः १३/३ छा. १/३ भूः १३/२ छा. १/२ शंकुवंतरभूः २]