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लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

छायाव्यवहारः । ( २१७ ) अर्थः-पहली छायाके अग्रसे दूसरे छायाके अग्रपर्यन्त जो मध्यकी भूमि है उससे अलग २ दोनों छायाओंको गुणा करे जो गुणन फल हो उसमें दोनो छाया- ओंको अन्तरका भाग दे जो लब्धि हो वह उसी उस छायाके अग्रसे दीपकके तलेपर्यन्तकी भूमिका प्रमाण होता है; फिर भूमि और शंकुका घात करे उसमें छायाका भाग दे. इस प्रकार दीपककी शिखाकी ऊँचाई मालूम होजाती है; जिस प्रकार अपने अनेक भेदोंसे ईश्वर करके यह संसार व्याप्त है तिसी प्रकार यहाँ- पर्यन्त लीलावतीमें जो कुछ गणित कहा वह सब त्रैराशिकसे व्याप्त है॥ ६२॥ ६३॥ उदाहरणम्- शंकोर्भार्कमितांगुलस्य सुमते दृष्टा किलाष्टांगुला छायाग्राभिमुखे करद्वयमिते न्यस्तस्य देशे पुनः ॥ तस्यैवार्कमितांगुला यदि तदा छायाप्रदीपांतरं दीपोच्चञ्च कियद्वद व्यवहृतिं छायाभिधां वेत्सि चेत् ॥४३॥ अन्वयः-हे सुमते ! किल यदि अर्कमितांगुलस्य शंकोः भा अष्टांगुला पुनः छाया ग्राभिमुखे करद्वयमिते देशे न्यस्तस्य तस्य एव छाया अर्कमितांगुला तदा प्रदीपा- न्तरं दीपोच्चयं च कियत् इति वद चेत् छायाभिधां व्यवहृतिं वेत्सि ॥ ४३ ॥ अर्थः-दीपककी चाँदनीमें दीपकसे कुछ दूरपर एक शंकु गढा है, वह १२ बारह गिरेका है; उस शंकुकी छायाका प्रमाण ८ अंगुल है, उसी छायाकी मूधपर पहिले शंकुसे दो २ हाथ आगे उसी शंकुको गाडा तो उस शंकुकी छाया १२ बारह अंगुल मिली तो कहो कि वह शंकु दीपकसे कितनी कितनी दूर पर थे और दीपक कितना ऊँचा था ? यदि छायाव्यवहारको जानते हो तो शीघ्र बताओ॥४३॥ न्यासः-अत्र छायाय- योरन्तर मंगुलात्मकं ५२ छाये च ८।१२। अनयोराद्या ८इयमने- न ५२ गुणिता ४१६ छाया प्रमाणांतरेण ४ भक्ता लब्धं भूमानम्

[चित्र-विवरण (Diagram Text): दीपकशिखोन्नतिः । शं. १/२, शं. १/२ भूः १३/३ छा. १/३ भूः १३/२ छा. १/२ शंकुवंतरभूः २]

(२१८) लीलावती।

१०४ इदं प्रथमच्छायाग्रदीप्तलयोरन्तरमित्यर्थः । एवं द्वितीयाग्रान्तरभूमानम् १५६ भूशंकुघातः प्रभया विभक्त इति जातमुभयतोऽपि दीपोच्चं सममेव हस्ताः ६ ३/८ ॥ फैलाव-अब यहां दीपकसे शंकुओंका अन्तर और दीपककी उँचाई जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार क्रिया करनेके अर्थ पहली छायाके अग्रभागसे दूसरी छायाके अग्रभागका अन्तर लिया तो ५२ बावन अंगुल मिले, इससे दोनों छायाओं ८। १२ को गुणा किया तो ४१६। ६२४ हुए; इनमें छायाओं ८ । १२ के अंतर ४ का भाग दिया तब १०४। १५६ मिले, यह अपनी अपनी छायाके अग्र- भागसे दीपकके तलेतककी भूमिका प्रमाण हुआ,परन्तु यह अंगुलात्मक है इसमें २४ का भाग दिया तब हस्तात्मक प्रमाण मिला १३/३ । १३/२ ॥ फिर अपनी अपनी छायाके अग्रभाग- पर्यन्तकी भूमि १३/३ १३/२ से अपने अपने शंकुको गुणा

करा तब १३/६ । १३/४ मिले, इनमें अपनी अपनी छाया १/३ । १/२ का भाग दिया तब १३/२ । १३/२ मिले; यही दीपककी उँचाई है, दोनों भूमियोंसे तुल्य ही मिली ॥ एवमित्यत्र छायाव्यवहारे त्रैराशिककल्पनयानयनं वर्तते । तद्यथा-प्रथमच्छाया ८ तो द्वितीयच्छाया १२ यावता- धिका तावता छायावयवेन यदि छायाग्रान्तरतुल्या भूर्ल- भ्यते तदा छायया किं किमिति एवं पृथक्पृथक् छायाप्र- दीपांतरप्रमाणं लभ्यते । ततो द्वितीयं त्रैराशिकम् । यदि छायातुल्ये भुजे शंकुः कोटिस्तदा भूतुल्ये भुजे किमिति लब्धं दीपकोच्चमुभयतोऽपि तुल्यमेव । एवं पंचराशिका- दिकमखिलं त्रैराशिककल्पनयैव सिद्धम् ॥ यथा भग- वता श्रीनारायणेन जननमरणक्लेशाऽपहारिणा निखिल-

८ छायाव्यवहारः । ( २१९ ) जगज्जननैकबीजेन सकलभुवनभावनेन गिरिसरित्सुर- नरासुरादिभिः स्वभेदैरिदं जगद्व्याप्तं तथेदमखिलं गणित- जातं त्रैराशिकेन व्याप्तम् ॥ अर्थ:-इसी प्रकार इस छाया व्यवहारमें दीपककी उँचाई आदि त्रैराशिक कल्पना करनेसे भी मिलती है सोई दिखाते हैं-प्रथम छाया ८ से दूसरी छाया १२ जितनी अधिक है उतने छायाके अवयव ४ से यदि छायाओंके अग्रभागोंके अन्तर ५२ की तुल्य भूमि मिलती है तो पहली छाया ८ से क्या मिलेगी ? यहां छायावयवको प्रमाण माना और उसको आदिमें लिखा और छाया ८ को इच्छा माना और अन्य जाति भूमि ५२ को फल मानके फल इच्छाका घात कर प्रमाणका भाग दिया तब १०४ लब्धि हुए; यही पहली छायाके अग्रभागसे दपिक | प्र. फ. इ. पर्यन्तकी भूमिका प्रमाण है; इसी प्रकार दूसरी छाया १२ | ४ ५२ ८ को इच्छा मान कर त्रैराशिक किया तब दूसरी छायाके अग्र- | ५२ गुणा भागसे दीपकके नीचे पर्यन्तकी भूमिका अंगुलात्मक प्रमाण | ८ १५६ मिला तदनन्तर दूसरा त्रैराशिक किया, यदि छाया | भा.४ ) ४१६ ( १०४ तुल्यभुजासे शंकुप्रमाण कोटि मिलता है, तो भूमितुल्य | लब्धि भुजामें क्या मिलेगा इस प्रकार त्रैराशिक करनेसे दीपककी उँचाई मिलती है यह उँचाई दोनों भूमियोंसे तुल्य ही मिलती है । इसी प्रकार पंचराशिकादि भी त्रैराशि- ककी कल्पनासे ही सिद्ध होता है; जिस प्रकार जन्ममरणरूप संसारके दुःख दूर करनेवाले सम्पूर्ण संसारकी उत्पत्तिके आदिकारण श्रीनारायण विष्णुभगवान करके संपूर्ण संसारके पर्वत नदी देवता मनुष्य और दैत्यादि अपने ही भेदोंसे यह संसार व्याप्त है तिसी प्रकार सम्पूर्ण गणितमात्र त्रैराशिकसे व्याप्त है ॥ यद्येवं तर्हि बहुभिः किमित्याशंक्याऽऽह- यदि त्रैराशिकसे ही सम्पूर्ण गणितमात्र सिद्ध हो जाता है तो फिर पूर्वोक्त बहुतसी रीतियें किस कारण वृथा बनाईं हैं ? इस प्रकार शंका करके उत्तर देते हैं- यत्किंचिद्गुणभागहारविधिना बीजेऽत्र वा गण्यते तत्रैराशिकमेव निर्मलधियामेवावगम्यं विदाम् ॥ एतद्बह्वथास्मदादिजडधीधीवृद्धिवुद्ध्या बुधैस्तद्भे- दान्सुगमान्विधाय रचितं प्राज्ञैः प्रकीर्णादिकम् ॥ ६४ ॥ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri

( २२० ) लीलावती । अन्वयः-अत्र बीजे वा गुणभागहारविधिना यत्किंचित् गण्यते तत् त्रैराशिकम् एव निर्मलधियां विदाम् एव अवगम्यम् । यत् एतत् बहुधा प्रकीर्णादिकं दृश्यते तत् प्राज्ञैः बुधैः अस्मदादिजडधीधीवृद्धिवृद्ध्या सुगमान् तद्भेदान् विधाय रचितम् ॥ ६४ ॥ अर्थः-इस पाटीगणितमें या बीजगणितमें गुणा और भागकी रीतिसे जो कुछ गणित कहा है, वह सब त्रैराशिकही है, परन्तु वह निर्मल बुद्धिवाले विद्वानोंके ही जाननेयोग्य है और जो कुछ यह अनेक प्रकारकी गणितकी रीतियें देखनेमें आती हैं, सो तीक्ष्णबुद्धिवाले पंडितोंने अस्मदादि मूढबुद्धियोंकी बुद्धिकी वृद्धि होनेके लिये उस त्रैराशिकके ही भेदोंको सरल रीतिसे रचना किया है ॥ ६४ ॥ अथ कुट्टके करणसूत्रं वृत्तपञ्चकम्-- अब कुट्टककी रीति लिखते हैं, पांचश्लोक ( कुट्टक उसको कहते हैं, जहां इस प्रकारका प्रश्न हो कि, किसी अंकको किसी अङ्कसे गुणा करा फिर उस गुणनफ- लमें कुछ अंक जोडा या घटाया, तब जो अंक सिद्ध हो उसमें किसी अंकका भाग देनेसे कुछ शेष नहीं रहता है ) ॥ भाज्यो हारः क्षेपकश्चापवर्त्यः केनाप्यादौ संभवे कुट्टकार्थम् ॥ येन च्छिन्नौ भाज्यहारौ न तेन क्षेपश्चैतद्दुष्टमुद्दिष्टमेव ॥ ६५ ॥ परस्परं भाजितयोर्ययोर्यः शेषस्तयोः स्यादपवर्तनं सः ॥ तेनापवर्तेन विभाजितौ यौ तौ भाज्यहारौ दृढसंज्ञकौ स्तः॥६६॥ मिथो भजेत्तौ दृढभाज्यहारौ यावद्विभाज्ये भवतीह रूपम् ॥ फलान्यधोऽधस्तदधो निवेश्यः क्षेपस्ततः शून्यमुपान्तिमेन ॥ ६७ ॥ स्वोर्द्धे हतेन्त्येन युते तदन्त्यं त्यजेन्मुहुः स्यादिति राशियुग्मम् ॥ ऊर्द्धो विभाज्येन दृढेन तष्टः फलं गुणः स्यादधरो हरेण ॥ ६८ ॥ एवं तदैवात्र यदा समास्ताः स्युर्ल- ब्धयश्चेद्विषमास्तदानीम् ॥ यदागतौ लब्धिगुणौ विशोध्यौ स्वतक्षणाच्छेषमितौ तु तौ स्तः॥ ६९ ॥ अन्वयः-आदौ सम्भवे कुट्टकार्थं केन अपि अंकेन भाज्यः हारः क्षेपः च अपवर्त्यः येन भाज्यहारौ छिन्नौ तेन चेत् क्षेपकः न च्छिन्द्यात् तदा एतत् उद्दिष्टं दुष्टम् एव । परस्परम् भाजितयोः ययोः यः शेषः सः तयोः अपवर्तनं स्यात् । तेन अपवर्तेन

कुट्टकव्यवहारः । (२२१) विभाजितौ यौ भाज्यहारौ तौ दृढसंज्ञकौ स्तः । यावत् विभाज्ये इह रूपं भवति तावत् दृढभाज्यहारौ मिथः भजेत् फलानि अधः अधः निवेश्यानि तदधः क्षेपः निवेश्यः । ततः शून्यं निवेश्यम् उपान्तिमेन स्वोर्ध्वे हते अन्त्येन युते तदन्त्यं त्यजेत् एवम् मुहुः कार्य्यम् इति राशियुग्मं स्यात् । दृढेन भाज्येन तष्टः ऊर्ध्वः फलं स्यात् । हरेण तष्टः अधरः गुणः स्यात् एवं तदा एव यदा ताः लब्धयः समाः स्युः चेत् विषमाः तदानीं यदागतौ लब्धिगुणौ स्वतक्षणात् विशोध्यौ, शेषमितौ तौ स्तः ॥ ६५ ॥ ६६ ॥ ६७ ॥ ६८ ॥ ६९ ॥ अर्थः-यदि पहले सम्भव हो तो कुट्टक करने के लिये किसी अंकका भाज्यहार और क्षेपमें अपवर्तन दे, जिस अपवर्तनके अंकसे भाज्य और भाजक निःशेष हो जाय, परन्तु क्षेप निःशेष न हों तो उस प्रश्नको ही दुष्ट कह दे, (पहले भाज्यहारका अपवर्तनांक जाननेकी रीति लिखते हैं, ) जिन दो अंकोंमें अपवर्त- न देना हो उनमें परस्पर एक एकमें भाग दे, जो शेष रहे, वही उन दोनों अंकोंका अपवर्तन अंक होता है, इस अपवर्तन अंकसे विभाजित (भाग दिये हुए) भाज्य और हार दृढसंज्ञक होते हैं। जबतक भाग देते देते एक शेष रह जाय तब- तक परस्पर भाग दे, जो लब्धि हों उनको नीचे नीचे लिखता जाय, उन लब्धियोंके नीचे क्षेप रक्खे, तदनन्तर शून्य रक्खे (इस प्रकार अंकोंको रखनेसे एक वल्ली (पंक्ति) बन जायगी (उस पंक्तिमें) उपान्तिक अर्थात् सबसे नीचेके दूसरे अङ्कसे उससे ऊपरके अङ्कको गुणा करे जो गुणनफल मिले उसमें अन्तके अर्थात् सबसे नीचेके अङ्कको जोड दे और फिर अंतके अंकको मिटा दे, इस प्रकार वारंवार करे तो दो राशि हो जायँगी, ऊपरकी राशिको दृढ भाज्यसे तष्टे और नीचेकी राशिको दृढ भाजक (हर) से तष्टे. (और दोनोंके तष्टनेमें लब्धि तुल्य ही ले.) दोनों स्थानोंमें तष्टनेसे जो अंक शेष रहें उनमें नीचेका अङ्क गुणा होगा, ऊपरको अङ्क लब्धि कहा जायगा यह रीति गुणलब्धिकी तब होगी; जब लब्धियोंकी वल्ली सम होगी और यदि लब्धियोंकी विषम वल्ली हो तो जो लब्धिगुण आये हैं उनमें अपने अपने तष्टनेवाले अङ्कोंको घटा दे, तब जो अङ्क शेष रहें वह गुण और लब्धि होंगे ॥ ६५ ॥ ६६ ॥ ६७ ॥ ६८ ॥ ६९ ॥ उदाहरणम्- एकविंशतियुतं शतद्वयं यद्गुणं गणकपञ्चषष्टियुक् ॥ पंचवर्जितशतद्वयोद्धृतं शुद्धिमेति गुणकं वदाशु तम् ॥ ४४ ॥ अन्वयः-हे गणक ! एकविंशतियुतं शतद्वयं यद्गुणं पञ्चषष्टियुक् पंचवर्जितशतद्व- योद्धृतं शुद्धम् एति तं गुणकम् आशु वद ॥ ४४ ॥

(२२२) लीलावती। अर्थ:-हे गणक ! दोसौ इक्कीसको जिसकिसी अंकसे गुननेपर फिर गुणित अंकोंमें ६५ मिलानेसे फिर १९५ का भाग देनेसे निःशेष हो जाता है तो कहो कि, वह कौनसा अङ्क है जिसमें २२१ को गुणा करा था ॥ ४४ ॥ न्यासः-भाज्यः २२१ हारः १९५ क्षेपः ६५ अत्र परस्परभाजितयोर्भाज्यभाजकयोः शेषम् १३ अनेन भाज्यहारक्षेपाः अपवर्तिता जाताः भाज्यः १७ हारः १५ क्षेपः ५ अनयोर्दृढभाज्यहारयोः परस्पर- भक्तयोर्लब्धान्यधोऽधस्तदधः क्षेपः तदधः शून्यं निवे- श्यमिति न्यस्ते जाता वल्ली [ १ / ७ / ५ / ० ] उपान्तिमेन स्वोर्ध्वे हते इत्यादिकरणेन जातं राशिद्वयम् ४० / ३५ एतौ दृढभाज्यहाराभ्यां १७ / १५ तष्टौ लब्धिगुणौ जातौ ६।५ इष्टाहतस्वस्वहरेण युक्ते इति वक्ष्यमाणविधिनैताविष्टगु- णितस्वतक्षणयुक्तौ वा लब्धिगुणौ २३ । २० द्विकेनेष्टेन वा ४० । ३५ इत्यादि ॥ अर्थ:-ऊपर कही हुई अपवर्तन अङ्क जाननेकी रीति के अनुसार भाज्य २२१ में भाजक १९५ का भाग दिया तब १३ शेष रहे यही यहाँ अपवर्तन अंक है इस १३ का भाज्य २२१ हार १९५ और क्षेप ६५में भाग दिया तब निःशेष हो जाता है, इस कारण यह प्रश्न भी शुद्ध है. इसका भाज्य २२१ हार १९५ क्षेप ६५ में अपवर्तन दिया तब दृढसंज्ञक हुए भाज्य १७ हर १५ क्षेप ५ इन दृढभाज्य हरमें परस्पर भाग दिया तब १५ ) १७ ( १ जो लब्धि मिली २ ) १५ ( ७ उनको नीचे लिखा १५ / २ फिर उसके नीचे दृढ १४ / १ क्षेप ५ को लिखा | १ | ७ | ५ | ० | फिर उसके नीचे शून्यलिखा तब वल्ली हुई इस वल्लीमें उपान्त्य अर्थात् अन्तके समीपके अंक ५ से उसके ऊपरके अंक ७ का गुणा करा तो पैंतीस ३५ हुए इसमें अंतके अंकको जोडा तब ३५ हुए फिर अन्तके अंक ० को मेट डाला तो ३५ / ५ इस प्रकार वल्ली हुई. अब फिर उसी प्रकार उपान्त्यके अङ्क ३५ को अपने ऊपरके अङ्क १ से गुणा करा तब ३५ हुए, इसमें अन्तके अङ्क ५ को जोडा तब ४० हुए फिर अन्तके अंकको मेट डाला तब ४० / ३५ इस प्रकार

कुट्टकव्यवहारः । (२२३) दो राशि हुई; इसमें ऊपरकी राशिको दृढभाज्य १७ से तष्टा और नीचेकी राशिको दृढ हरसे तष्टा तो शेष अंक मिले |६ ल| इसमें ऊपरकी राशि लब्धि और नीचेकी |५ गु| गुण है. यद्यपि प्रश्न गुणके अंकका ही था तथापि प्रसङ्गसे लब्धि भी आजाती है यह जो गुणक मिला है, सो सबसे छोटा है; इसको छोडकर और कोई छोटा गुणक अंक नहीं मिलेगा और यह लब्धिका अंक भी सबसे छोटा है, यह वही गुणक अंक ५ मिला है, जिससे दोसौसे इक्कीसको गुणा कर पैंसठ मिलाये जायँ और फिर १९५को भाग दिया जाय तो अंक निःशेष हो जाता है; इस गुण लब्धिसे दूसरे भी गुणलब्धि आगे कही हुई "इष्टाहतस्वस्वहरेण युक्तः"-पहली रीतिसे सबसे छोटा जो गुणलब्धि मिली है उनमें किसी इष्टसे गुणेहुए अपने २ तक्षक अंकको जोडनेसे पहलेलाई हुई गुणलब्धिसे दूसरी गुणलब्धि मिलती है अर्थात् किसी इष्टसे गुणा करे हुए भाज्यको लब्धिमें जोडै और उसी इष्टसे गुणा करे हुए भाजकको गुणमें जोडे इस रीतिसे अनेक प्रकारकी गुणलब्धि मिलती है; जिस प्रकार यहाँ पहली रीतिसे लाई हुई लब्धि ६ है और गुण ५ है और दृढभाज्य १७ और दृढभाजक १५ है; यह दृढभाज्यभाजक लब्धि और गुणके तक्षक हैं; इन १७ । १५ को इष्ट १ से गुणा किया तब लब्धिगुणमें ६ । ५ जोडा तो २३ । २० हुए, यहां जो गुणक अंक २० मिला है उससे भी २२१ को गुणा कर ६५ जोडे और १९५ का भाग दिया तब निःशेष हो जाता है; इसी प्रकार २ को इष्ट माननेसे ३९ । ४०, तीनको इष्ट मानने से ५० । ५७ इसी प्रकार नाना प्रकारके इष्ट माननेसे गुणलब्धि नाना प्रकारके होते हैं । कुट्टकान्तरे करणसूत्रंवृत्तम्- कुट्टक करनेकी और रीति श्लोक एक- भवति कुट्टविधेर्युतिभाज्ययोः समपवर्तितयोरपि वा गुणः ॥ भवति यो युतिभाजकयोः पुनः स च भवेदपवर्तनसंगुणः॥७०॥ अन्वयः-समपवर्तितयोः युतिभाज्ययोः अपि कुट्टविधेः गुणः भवति वा यः समपवर्तितयोः युतिभाजकयोः गुणः भवति स च पुनः अपवर्तनसंगुणः गुणः भवेत् ॥ ७० ॥ अर्थः-जिस प्रकार पहले भाज्य भाजक और क्षेप इन तीनोंमें अपवर्तन देकर दृढभाज्य, भाजक और क्षेप बनाके गुणलब्धि मिलती है; तिसी प्रकारके केवल भाज्य क्षेपमें भी अपवर्तन देकर पहली रीतिसे वल्ली बनाकर कही हुई रीतिसे गुण और लब्धि लावे, यदि भाजक और क्षेपमें अपवर्तन देकर गुणका साधन करा हो

( २२४ ) लीलावती । तो उस गुणको अपवर्तन अंकसे गुणा करे तब गुण होगा; फिर गुणसे भाज्यको गुणा करके जो गुणनफल मिले उसमें क्षेपको जोडकर या घटाकर हरका भाग देजो मिले वह लब्धिका प्रमाण होगा ॥ ७० ॥ उदाहरणम्- शतं हतं येन युतं नवत्या विवर्जितं वा विहृतं त्रिषष्ट्या ॥ निरग्रकं स्याद्वद मे गुणं तं स्पष्टं पटीयान्यदि कुट्टकेऽसि। ४५। अन्वयः-हे सखे ! शतं येन हतं नवत्या युतं वा विवर्जितं त्रिषष्ट्या विहृतं निरग्रकं स्यात् । यदि कुट्टके पटीयान् असि तर्हि तं गुणं मे स्पष्टं वद ॥ ४५ ॥ अर्थः-हे मित्र ! सौको जिस किसी अंकसे गुणा कर उसमें ९० नव्वे जोडे या घटाये फिर ६३ तिरसठका भाग दिया तो निःशेष होगया; यदि कुट्टकके गणितमें चतुर हो तो कहो कि, वह कौनसा अंक है जिससे कि, सौको गुणा किया था॥४५॥ न्यासः-भाज्यः १०० हारः ६३ क्षेपः ९० | १ जाता पूर्व वल्लब्धिक्षेपाणां वल्ली उपान्तिमेन | १ स्वोर्द्धे हतेऽन्त्येन युत इत्यादि करणेन जातं | १ राशिद्वयं २४३०/१५३० जातौ पूर्ववल्लब्धिगुणौ ३० । १८ | २ अथवा भाज्यक्षेपौ दशभिरपवर्त्य भाज्यः १० क्षेपः९ | २ परस्परभजनाल्लब्धानि फलानि क्षेपं शून्यं चाधोऽ- | १ धो निवेश्य जाता वल्ली { १/१/१/९/० } पूर्ववल्लब्धो गुणः ४५ अत्र | ९० लब्धिर्न ग्राह्या यतो लब्धयो विषमा जाताः अतो | ० हरेण ४५ स्वतक्षणा ६३ तस्माद्विशोधिते जातो गुणः स एव १८ गुणन्नभाज्ये क्षेप ९० युते हर ६३ तष्ट लब्धिश्च ३० अथवा हारक्षेपौ ६३ । ९० नवभिरपवर्तितौ जातौ हारक्षेपौ ७ । १० लब्धो गुणः २ क्षेपहारापवर्तन- ९ गुणितौ जातः स एव गुणः १८ अत्रलब्धि- { १४/३/१०/० } भाज्यः १०० भाजक ६३ क्षेपे ९०- क्षेपाणां वल्ली भ्यो लब्धिश्च ३०

कुट्टकव्यवहारः । ( २२५ ) अथवा भाज्यक्षेपौ पुनर्हारक्षेपौ चापवर्तितौ जातौ भाज्य- हारौ १० । ७ क्षेपः १ ॥ अत्र पूर्ववत् ⎧ गुणश्च २ हारक्षेपापवर्तनेन गुणितो जातः जाता वल्ली ⎩ स एव गुणः १८ पूर्ववल्लब्धिश्च ३० दृष्टाहतस्वस्वहरेण युक्त इत्यादिनाऽथवा गुणलब्धी ८१ । १३० फैलाव-यहां भाज्य १०० हर ६३ क्षेप ९० है, पहले कही हुई रीति के अनुसार वल्ली बनानेके लिये भाज्य १०० में भाजक ६३ का भाग दिया तब १ एक मिला १ फिर ३७ बचे उसका तिरसठमें भाग दिया तब एक मिला, इसको वल्लीमें १ लिखा फिर २६ बचे इसका तीस ३० में भाग दिया तब एक लब्धि हुई, १ इसको भी वल्लीमें लिखा, फिर ११ बचे, इसका छव्वीसमें भाग दिया तब दो २ २ लब्धि हुए, इनको भी वल्लीमें लिखा, फिर ४ बचे, इसका ग्यारहमें भाग २ दिया तब दो लब्धि हुए, इनको भी वल्लीमें लिखा, फिर ३ बाकी रहे, १ इसका चारमें भाग दिया तब एक लब्धि हुआ, उसको वल्लीमें लिखा, तब ९० ९० एक बच रहा, इस कारण वल्लीमें अब लब्धियोंके नीचे क्षेप ९० को लिखा, ०० तदनन्तर सबसे नीचे शून्य लिखा तब वल्ली बन गयी, यह समवल्ली हुई इसमें उपा- न्त्यके अङ्कसे उसके ऊपरके अङ्कको गुणाकर नीचेका मिलाकर अन्तके अङ्कको मेट दे, इस पहले कही हुई रीति के अनुसार गणित करते करते दोनों राशि मिलीं ३४५० / १८९० इन दोनों राशियोंको अपने अपने तक्षक १०० । ६३ से तष्टा तो रहे ३० / १८ इनमें १८ गुण है और ३० लब्धि है ॥ अथवा भाज्य १०० क्षेप ९० में दशका परिवर्तन दिया तब तीनों राशि हुई भाज्य १० हर ६३ क्षेप ९ यहाँ भी पहले कही हुई रीति के अनुसार वल्ली ० बनाई और उपान्त्यके अंकसे उसके ऊपरके अङ्कको गुणा करके अन्तको ६ जोडकर अंतका अंक मिटाडाला, इस प्रकार गणित करते करते दोनों राशि ३ मिलीं २७ / १७० इनमें अपने अपने तक्षक १० । ६३ से तष्टा तो ८ / ३५ रहे. ९ परन्तु विषमवल्ली है इस कारण पहले कही हुई रीतिके अनुसार इन्हें ८ / ३५ अपने अपने तक्षक १० । ६३ मेंसे घटा दिया तो शेष ३ / १८ रहे, इनमें गुण १८ है ० सो तो ठीक है और यदि लब्धि ठीक जाननी हो तो भाज्यसे गुणको गुणा करनेसे जो गुणन फल हो उसमें क्षेपको जोडकर हरका भाग दे जो मिले वह लब्धि है, यहाँ इसी प्रकार किया तो ३० लब्धि मिली ॥ १५ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri

(२२६) लीलावती । अथवा हर ६३ क्षेप ९० में नौ ९ से अपवर्तन दिया तब हार ७ क्षेप ९ हुए; यहाँ पहले कही हुई रीति के अनुसार भाज्य १०० हार ७ का परस्पर ∣ १४ भाग देकर लब्धि नीचे नीचे रखते गये, फिर उन लब्धियों के नीचे क्षेप को ∣ ३ रखा क्षेप के नीचे शून्य रक्खा तब समवल्ली हुई, फिर ऊपर कही हुई रीति के ∣ १० अनुसार उपान्त्य के अङ्क १० से उसके ऊपर के ३ को गुणा किया तो ∣ ० ३० हुए; इसमें अन्त का अंक जोडा और अन्के अंक को मेट दिया तब वल्ली हुई $\begin{matrix} १४ ३० १० \end{matrix}$ यहाँ फिर उपान्त के अंक ३० से उसके ऊपर के अंक १४ को गुणा करा तो ४२० हुए; इसमें अन्त के अंक १० को जोडकर अन्त्य के अंक को मेट दिया, तब सबसे ऊपर के अंक $\frac{४३०}{३०}$ मिले, इन दोनों राशियों को अपने अपने तक्षक १००।७ से तष्टा तो $\frac{३०}{२}$ हुए, इनमें २ गुण हैं और ३० लब्धि है अब ऊपर कही हुई रीति के अनुसार २ गुण को अपवर्तन अंक ९ से गुणा किया तो वही पहला गुणक अङ्क १८ मिला और लब्धि ३० मिली ॥ अथवा पहले भाज्य १०० क्षेप में दश का अपवर्तन दिया तब १०।९ हुए, फिर अपवर्तितक्षेप ९ और हार ६३ में नौ का अपवर्तन दिया तब क्षेप १ हार ७ हुए; इस प्रकार करने से भाज्य १० क्षेप १ हार ७ हुए; यहां पहले कही हुई रीति के अनु- सार भाज्य १० और हार ७ का परस्पर भाग देकर उसका लब्धियों के ∣ १ नीचे क्षेप को लिखा, फिर उसके नीचे शून्य लिखा तो समवल्ली बनी, यहां पहले ∣ २ कही हुई रीति के अनुसार ऊपर के दोनों अंक $\frac{३}{२}$ मिले, यहां गुण २ है, इसको ∣ १ पहले कही हुई रीति के अनुसार हार क्षेप के अपवर्तन अंक ९ से इस गुण २ ∣ ० को गुणा किया तो १८ हुए यही पहले लाया हुआ गुणक अंक मिला और पहले कही हुई रीति के अनुसार भाज्य १०० भाजक ६३ क्षेप ९० से लब्धि मिली, ३० यहां “इष्टाहतस्वस्वहरेण युक्ते” इन गुणलब्धि में इष्ट से गुणे हुए अपने अपने तक्षक को जोड दे; इस रीति के अनुसार अनेक प्रकार की गुणलब्धि मिलती है, जैसे ऊपर मिली हुई गुणलब्धि १८।३० में इष्ट १ से गुणे हुए अपने अपने तक्षक ६३।१०० के जोडने से गुणलब्धि मिली ८१ । १३० इसी प्रकार दो २ के इष्ट से गुणलब्धि मिली १४४ । २३० तीन के इष्ट से गुणलब्धि मिली २०७ । ३३० इस प्रकार के जितनी प्रकार के इष्ट मानें जायेंगे; उतनी ही प्रकार की गुणलब्धि होंगी. कुट्टकान्तरे करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्– कुट्टक में ऋणक्षेप के गुण और लब्धि जानने की रीति आधा श्लोक में– क्षेपजे तक्षणाच्छुद्धे गुणाप्ती स्तो वियोगजे ॥ ५५ ॥

कुट्टकव्यवहारः । (२२७) अन्वयः-यत उक्तं तत् क्षेपजे वियोगजे तु तक्षणात् शुद्धे गुणाप्ती स्तः ॥ अर्थः-जो कुछ ऊपर रीति कही सो धनक्षेपकी थी यदि ऋणक्षेप हो तो वल्लीसे जो गुणलब्धि मिलें उन्हें अपने अपने तक्षकमेंसे घटा दे जो शेष रहें उनको गुण और लब्धि जाने ॥ ५५ ॥ अत्र पूर्वोदाहरणे नवतिक्षेपे यौ लब्धिगुणौ जातौ ३० । १८ एतौ स्वतक्षणाभ्यामाभ्यां १०० । ६३ शोधितौ ये शेषके तन्मितौ लब्धिगुणौ नवतिशोधने ज्ञातव्यौ ७० । ४५ एतयोरपि स्वतक्षणं क्षेप इति १७० । १०८ अथवा २७० । १७१ ॥ फैलाव-यहाँ पहले ही उदाहरणमें अर्थात् भाज्य १०० हार ६३ क्षेप ९० से जो गुणलब्धि मिले हैं १८ । ३० इनको अपने अपने तक्षक ६३ । १०० मेंसे घटाया तो ४५ । ७० रहे; यही लब्धि गुण आवेंगे, यदि नब्बेको जोडनेकी जगह घटाया जाय तो, क्योंकि यदि १०० को ऋणक्षेपकी रीतिसे लाये हुए ४५ गुणसे गुणा किया तब ४५०० हुए, इसमें ९० को घटाया तो ४४१० रहे, इनमें ६३ का भाग दिया तो निःशेष हो गया और ७० लब्धि हुए; इससे मालूम हुआ कि, ऊपरकी रीतिके अनुसार ऋणक्षेपमें लाये हुए लब्धि ७० और गुणा ४५ ठीक हैं; इन ४५ । ७० गुणलब्धियोंमें भी इष्टसे गुणे हुए अपने अपने तक्षक जोडनेसे अनेक प्रकारकी गुणलब्धि मिल जाती हैं, जैसे ऋणक्षेपकी गुणलब्धि ४५। ७० हैं, इनमें एक १ इष्टसे गुणा किये हुए अपने अपने तक्षक ६३ । १०० को जोडा तब १०८ । १७० इसी प्रकारका २ दोके इष्टसे १७१ । २७० गुण और लब्धि होते हैं ॥ द्वितीयोदाहरणम्- यद्गुणा गणक षष्टिरन्विता वर्जिता च दशभिः षडुत्तरैः ॥ स्यात्त्रयोदशहता निरग्रका तं गुणं कथय मे पृथक्पृथक्४६ ॥ अन्वयः-हे गणक ! यद्गुणा षष्टिः षडुत्तरैः दशभिः अन्विता वा वर्जिता ततः त्रयोदशहता निरग्रका स्यात् तं गुणम् मे पृथक् पृथक् कथय ॥ ४६ ॥ अर्थः-हे गणक ! जिस किसी अङ्कसे गुणा करेहुए साठमें सोलह १६ घटा दिये या जोड दिये, तदनन्तर तेरहका भाग देनेसे कुछ शेष नहीं रहता है, तो कहो जिस अङ्कसे गुणा करके सोलह १६ जोडे और जिस अङ्कसे गुणा करके सोल- हको घटाया वह अङ्क कौन है जिससे ६० को गुणा किया जाय ॥ ४६ ॥

(१४) लीलावती। न्यासः-भाज्यः ६० हारः १३ क्षेपः १६ प्राग्वल्लुब्धा $\begin{vmatrix} ४ २ १ १ १ १६ ० \end{vmatrix}$ तथा जाते गुणाप्ती २।८ अत्रापि लब्धयो वल्ली विषमाः अतो गुणाप्ती स्वलक्षणाभ्यां १३ । ६० शोधिते जाते ११ । ५२ एवं षोडश- क्षेपे एतावेव लब्धिगुणौ ११ । ५२ स्वस्वहराभ्यां शोधितौ जातौ षोडशविशुद्धौ २ । ८ फैलाव-भाज्य ६० हार १३ क्षेप १६ यहाँ भाज्य ६० हार १३ का परस्पर भाग दिया और लब्धियोंको $\begin{vmatrix} ४ २ १ १ १ १६ ० \end{vmatrix}$ पहले कही हुई रीतिके अनुसार उपान्तके क्रमसे नीचे २ लिखा और अङ्कसे उसके ऊपरके अङ्कको गुणा करके उन लब्धियोंके नीचे क्षेपको गुणित अंकमें अन्तके अंकको जोडकर और उसके नीचे शून्य लिखा तो अन्तके अंकको मेट दिया, इस प्रकार करते वल्ली बनी करते गुणलब्धि २।८ मिले परन्तु यहां वल्लीमें सात अंक हैं, इस कारण विषम वल्ली है, इस कारण वल्लीसे प्राप्त हुए गुणलब्धि २।८ को अपने अपने तक्षक १३ । ६० मेंसे घटाया तो ११ । ५२ शेष रहे । यह गुण और लब्धि धनक्षेपके हुए और इसी प्रकार यदि ऋणक्षेप १६ हों तो ऊपरकी रीतिसे प्राप्त हुए गुणलब्धि ११ । ५२ को ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार अपने अपने तक्षक १३ और ६० में घटाया तो २।८ गुणलब्धि मिली, वही ऋणक्षेपमें होंगे, क्योंकि ६० को ११ से गुणा करा तब ६६० हुए इसमें सोलह १६ जोडे तब ६७६ इसमें १३ तेरहका भाग दिया तो निःशेष हो गया और ५२ लब्धि हुए, इस प्रकार करनेसे वही लब्धिगुण मिले जो कि ऊपरकी रीतिसे आये थे परन्तु यह धनक्षेपके लब्धि गुणकी उपपत्ति हुई और ऋणक्षेपमें ६० को २ से गुणा करा तब १२० हुए इसमें १६ घटाये १०४ बचे इसमें १३ तेरहका भाग दिया तो निःशेष हो गया और ८ लब्धि हुए. यह वही गुणक और वही लब्धि मिले जो कि, ऊपर ऋणक्षेपकी रीतिसे आयेथे. इसी प्रकार सब जगहपर उपपत्ति करके गुणा और लब्धिकी शुद्धाशुद्धि जानना चाहिये ॥ कुट्टकान्तरे करणसूत्रं सार्द्ध वृत्तम्- कुट्टककी और रीति देढ श्लोकमें-

कुट्टकव्यवहारः । ( २२९ ) गुणलब्ध्योः समं ग्राह्यं धीमता तक्षणे फलम् ॥ ७१ ॥ हरतष्टे धनक्षेपे गुणलब्धी तु पूर्ववत्। क्षेपतक्षणलाभाढ्या लब्धिः शुद्धौ तु वर्जिता ॥ ७२ ॥ अन्वयः-धीमता गुणलब्ध्योः तक्षणे फलं समं ग्राह्यम् । धनक्षेपे हरतष्टे सति पूर्व- वत् गुणलब्धी साध्ये । लब्धिः क्षेपतक्षणलाभाढ्या कार्या शुद्धौ तु वर्जिता कार्या ॥ ७१ ॥ ७२ ॥ अर्थः-बुद्धिमान् कुट्टककी गुणलब्धिको अपने २ तक्षकसे तष्टनेमें भागहारकी लब्धि समानही ले हारसे क्षेप अधिक होतो क्षेपमें जितने वार घट सके हारका भाग दे जो क्षेपमेंसे भाग देकर शेष रहे उसको ही क्षेप मानकर पहले कही हुई रीतिके अनुसार गुण और लब्धि साधन करे जो गुण मिले उसको तो ठीक जाने और धनक्षेप हो तौ क्षेपमें हरका भाग देनेसे जो लब्धि मिली थी उसको ऊपर सिद्ध करी हुई लब्धि जोडकर उसको लब्धि माने और यदि ऋणक्षेप हो तो क्षेपमें हरका भाग देनेसे जो लब्धि मिली है उसको ऊपर सिद्ध करी हुई लब्धिमें घटा दे जो शेष रहे उसको लब्धि माने ॥ ७१ ॥ ७२ ॥ उदाहरणम्- येन संगुणिताः पंच त्रयोविंशतिसंयुताः ॥ वर्जिता वा त्रिभिर्भक्ता निरग्राः स्युः स को गुणः ॥ ४७ ॥ अन्वयः-पंच येन संगुणिताः त्रयोविंशतिसंयुताः वा वर्जिताः ततः त्रिभिःभक्ताः निरग्राः स्युः सः गुणः कः ॥ ४७ ॥ अर्थः-पांचको किसी अंकसे गुणा करके जो गुणनफल हो उसमें तेईस जोड दे या घटा दे फिर तीनका भाग दे तो कुछ बाकी नहीं रहता है. तो कहो जिससे पांचको गुणा किया वह गुणक अंक क्या है ? ॥ ४७ ॥ न्यासः-भाज्यः ५ हारः ३ क्षेपः २३ अत्र } १ पूर्ववज्जातं राशिद्वयम् ४६/३३ एतौ भाज्यहाराभ्यां वल्ली } १ २३ तष्टौ अत्राधोराशौ २३ त्रिभिस्तष्टे ० सप्त ७ लभ्यते ऊर्ध्वराशौ ४६ पंचभिस्तष्टे नव ९ लभ्यन्ते तत्र नव न ग्राह्याः । “गुणलब्ध्योः समं ग्राह्यं धीमता तक्षणे फलम्” इति अतः सप्तैव ग्राह्याः। एवं जाते

( २३० ) लीलावती । गुणाप्ती २ । ११ । "क्षेपजे तक्षणाच्छुद्धे" इति त्रयोविंशति शुद्धौ जाता विपरीतशोधनादवशिष्टा लब्धिः ६ शुद्धौ जाते १ । ६ " इष्टाहतस्वस्वहरेण युक्ते" इति वक्ष्यमाणविधिना "धनर्णयोरन्तरमेव योगः" इति बीजो- क्त्या च इष्टगुणितस्वहारक्षेपणेन यथा धनलब्धिः स्यादि- ति तथा कृते जाते गुणाप्ती ७ । ४ एवं सर्वत्र ॥ अथवा "हरतष्टे धनक्षेपे " इति । न्यासः- भाज्यः ५ हारः ३ क्षेपः २ ॥ पूर्ववज्जाते गुणाप्ती २ । ४ एते स्वस्वहराभ्यां शोधिते विशुद्धि ११ । २ जाते "क्षेपतक्षणलाभाढ्या लब्धिः" इति जातौ क्षेपजौ लब्धिगुणौ ११ । २ "शुद्धौ तु वर्जिता" इति शुद्धिजौ भवतः । किन्त्वत्र शुद्धा न भवति । तस्माद्विपरीतशोध- नेन ऋणलब्धिः ६ गुणः १ धनलब्ध्यर्थं द्विगुणे स्वहारे क्षिप्ते सति जाते ७ । ४ फैलाव-भाज्य ५ हार ३ क्षेप २३ यहां पहले कही हुई रीति के अनुसार वल्ली बनाई १ फिर पहले कही हुई रीतिके अनुसार उपान्त के अंक से उसके २ ३ ० ऊपरके अंकको गुणा कर उसमें अन्त अंक जोड दिया, फिर अन्तके अंकको मिटा दिया, इस प्रकार जहां तक एक शेष रहा तहांतक बारंबार करनेसे ऊपरकी दो राशियें मिलीं, ४६ २३ इनको भाज्य ५ और हार ३ से तष्टा अर्थात् नीचेकी राशि २३ को हार ३ से तष्टा तो सात लब्धि मिले, फिर ऊपरकी राशि ४६ को भाज्य ५ से तष्टा तो नौ ९ लब्धि मिल सकते हैं, परन्तु ९ लब्धि नहीं लेना चाहिए क्योंकि " गुणलब्ध्योः सममित्यादि " रीतिके अनुसार दोनोंको तष्टनेमें लब्धि समान ही लेना चाहिए; इस कारण नौ ९ लब्धि न लेकर पहलेके बराबर सात ही लब्धि लिये तब दोनों स्थानोंमें तष्टनेपर रहे २ । ११ यही यहां गुण लब्धि हुए; यह धनक्षेपके गुण लब्धि सिद्ध हुए; और उन २ । ११ को अपने २ तक्षक ३ । ५ में से विपरीत रीतिसे घटा दिया तो १ । ६ रहे, परन्तु यहां लब्धि ऋण है क्योंकि उलटी रीतिसे घटाया है, इसको धन करनेके लिए इष्ट २ से गुणा किये हुए अपने २ तक्षकको पहली गुण लब्धिमें

जोड़ दे, आगे इस प्रकार लिखेंगे, इस कारण इष्ट २ से गुणा करे हुए अपने २ तक्षक ६ । १० को पहिली गुण लब्धि १ । ६ में जोडा, अर्थात् यहां ऊपरकी राशिमें ६ ऋण हैं और "ऋण धनका अन्तर करना ही योग्य होता है" ऐसा बीजगणित का नियम है, इस कारण ऋण ६ का और इष्ट २ से गुणा किये हुए अपने २ तक्षक १० का अन्तर किया तो चार हुए, और इष्ट २ से गुणा किये हुए तक्षक ६ को गुण १ में जोडा तो ७ हुए; अर्थात् इस रीतिके अनुसार गुण लब्धि मिले ७ । ४ ॥ ऊपर कही हुई "हरतष्टे धनक्षेपे" इस रीतिको पहले उदाहरण भाज्य ५ हर ३ क्षेप २३ में दिखाते हैं । यहां ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार हर ३ का क्षेप २३ में भाग देने से लब्धि हुए ७ इसको अलग लिखा और शेष दो २ जो बचे उनको क्षेप २ मानकर न्यास हुआ, भाज्य ५ हार ३ क्षेप २ अब पहले कही हुई रीतिसे वल्ली हुई १ १ २ ० फिर वल्लीसे गुणलब्धि मिले २ । ४ यहां गुण तो २ यही रहेगा परन्तु लब्धि ४ में वह अंक जोड दिया, जो पहिले लब्धि ७ मिला था, तो ११ लब्धि हुई, यह गुण लब्धि पहले गुण लब्धिकी तुल्य आये, परंतु यह धनक्षेपमें होते हैं, यदि ऋण क्षेप हो तो वल्लीसे प्राप्त हुई लब्धि मिले, उसमें क्षेप में हरका भाग देनेसे प्राप्त हुई लब्धिको घटाकर जो शेष रहे वह लब्धि होती है. जैसे पहले ही उदाहरणमें क्षेपमें हरका भाग देनेसे प्राप्ति हुई लब्धि ७ मिले, और शेष रहे दो उन्हें क्षेप मान कर पहली रीतिसे वल्ली बनाई तो उस वल्लीसे गुण और लब्धि मिले २ । ४ परन्तु यह धन क्षेपके हैं; इन्हें अपने २ तक्षक ३ । ५ में से घटाया तब शेष रहे १ । १ यह ऋण क्षेपकी गुणलब्धि हुई, यह गुणा तो ठीक है, परन्तु क्षेपमें हरका भाग देने से जो ७ सात लब्धि मिले थे, उनको लब्धि १ एक में घटाया तो एकमें सात नहीं घट सकते, इस कारण विपरीत अन्तर किया. अर्थात् सात ७ में १ एक को घटाया तो ऋणलब्धि मिली ६ इसको धनलब्धि करनेके लिये इष्ट २ से गुणा करे हुए अपने २ तक्षक ६ । १० में जोडा, तो ७ गुण और "धनर्णयो- रन्तरेमेव योगः" इस रीतिके अनुसार लब्धि ४ हुए ॥ कुट्टकान्तरे करणसूत्रं वृत्तम्- कुट्टककी और रीति श्लोक १ क्षेपाभावोऽथवा यत्र क्षेपः शुद्धो हरोद्धृतः ॥ ज्ञेयः शून्यं गुणस्तत्र क्षेपो हारहृतः फलम् ॥ ७३ ॥

( २३२ ) लीलावती । अन्वयः-यत्र क्षेपाभावः तत्र अथवा यत्र हरोद्धतः क्षेपः शुद्धः भवति तत्र अपि शून्यं गुणः ज्ञेयः हारहतः क्षेपः फलं भवति ॥ ७३ ॥ अर्थः-जिस कुट्टकके उदाहरणमें क्षेप शून्य हो तहां गुणक भी शून्य जानना, क्षेपमें हरका भाग देने से जो लब्धि मिले वह लब्धि होती है, अथवा जहां हरका भाग देनेसे क्षेपमें कुछ शेष न बचता हो तहां भी शून्य ही गुणक होता है और क्षेपमें हरका भाग देने से जो मिले वह लब्धि होती है ॥ ७३ ॥ उदाहरणम्- येन पञ्च गुणिताः खसंयुताः पञ्चषष्टिसहिताश्च तेऽथवा ॥ स्युस्त्रयोदशहता निरग्रकास्तं गुणं गणक कीर्तयाऽऽशु मे ४८ अन्वयः-येन गुणिताः पंच खसंयुताः अथवा पंचषष्टिसहिताः च ते त्रयो दशहताः निरग्रकाः स्युः हे गणक ! तं गुणं मे आशु कीर्तय ॥ ४८ ॥ अर्थः-किसी अंक से गुणा किये हुए पांच ५ में शून्य जोडा या ६५ जोडे, फिर तेरहका भाग दिया तो कुछ शेष नहीं रहा तो हे गणक ! उस गुणक अंकको बताओ जिससे कि, पांचको गुणा किया जाय ॥ ४८ ॥ न्यासः-भाज्यः ५ हारः १३ क्षेपः शून्यम् ० . “ ज्ञेयः शून्यं ० गुणस्तत्र क्षेपो हारहृतः फलमिति” ॥ क्षेपाभावे गुणाप्ती ० । ० इष्टाहतेत्यथवा १३ । ५ वा २६ । १० ॥ फैलाव-भाज्य ५ हार १३ क्षेप० यहां क्षेप० शून्य है, इस कारण ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार शून्य० ही गुणक होगा और शून्यमें किसी अंकका भाग देनेसे शून्य ही लब्धि होता है इस कारण यहां क्षेपमें हरका भाग दिया तो शून्य ही लब्धि हुआ; इस प्रकार गुणलब्धि मिले । ० । ० । न्यासः-भाज्यः ५ हारः १३ क्षेपः ६५ “क्षेपः शुद्धो हरोद्धतः । ज्ञेयः शून्यं गुणस्तत्र क्षेपो हारहृतः फल- मिति” जाते गुणाप्ती ० । ५ ॥ फैलाव-भाज्य ५ हार १३ क्षेप ६५ यहां क्षेप ६५ में हार १३ का भाग देनेसे कुछ शेष नहीं रहता है; इस कारण ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार गुण मिला० और क्षेपमें हरका भाग देनेसे ५ मिले यही लब्धि हुई इस प्रकार गुणलब्धि० । ५ मिले॥

कुट्टकव्यवहारः । ( २३३ ) अथ सर्वत्र कुट्टके गुणलब्ध्योरनेकधा दर्शनार्थं करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्- अब सब जगह कुट्टकमें अनेक प्रकारकी गुणलब्धि दिखानेकी रीति आधा श्लोक- इष्टाहतस्वस्वहरेण युक्ते ते वा भवेतां बहुधा गुणाप्ती ॥ ऽऽ ॥ अन्वयः-वा ते गुणाप्ती इष्टाहतस्वस्वहरेण युक्ते बहुधा भवेताम् ॥ अर्थः-अथवा वही गुणलब्धि इष्टसे गुणे हुए अपने अपने तक्षकमें जोड़नेसे अनेक प्रकारके हो जाते हैं ॥ अस्योदाहरणानि दर्शितानि पूर्वमिति । इसके उदाहरण पहले दिखाचुके हैं, इस कारण यहां नहीं लिखे. अथ स्थिरकुट्टककरणसूत्रं वृत्तम्- अब स्थिर कुट्टककी रीति लिखते हैं एक श्लोकमें- क्षेपे तु रूपे यदि वा विशुद्धे स्यातां क्रमाद्ये गुणकारलब्धी ॥ अभीप्सितक्षेपविशुद्धिनिघ्ने स्वहारतष्टे भवतस्तयोस्ते ॥ ७४ ॥ अन्वयः-यदि रूपे क्षेपे वा विशुद्धे तयोः ये गुणकारलब्धी स्यातां ते क्रमात् अभीप्सितक्षेपविशुद्धिनिघ्ने स्वहारतष्टे तयोः ते भवतः ॥ ७४ ॥ अर्थः-जहां इष्टक्षेपका अंक बडा हो वहां रूप १ को क्षेप मानकर पहले कही हुई रीतिसे गुणलब्धि लावे फिर उस गुणलब्धिको इष्टक्षेपसे गुणा करके उसको अपने अपने तक्षकसे तष्टे जो शेष बचे उसको गुणलब्धि जाने, यह गुणलब्धि धनक्षेपकी है, यदि ऋणक्षेप हो तो इन गुणलब्धिको अपने अपने तक्षकमेंसे घटादे जो शेष रहे वह गुणलब्धि होती है ॥ ७४ ॥ प्रथमोदाहरणे दृढभाज्यहारयोः रूपक्षेपयोर्न्यासः-भाज्यः १७ हारः १५ क्षेपः १ अत्र गुणाप्ती ७ । ८ एते त्विष्ट-- क्षेपेण पञ्चकेन गुणिते स्वहारतष्टे च जाते ५ । ६ ॥ अथ रूपशुद्धौ गुणाप्ती ७ । ८ तक्षणाच्छुद्धौ जातौ लब्धि- गुणौ ९ । ८ एते पञ्चगुणे स्वहारतष्टे च जाते १० । ११ एवं षष्टिविशुद्धौ ॥ एवं सर्वत्र ॥ फैलाव-इसको"एकविंशतियुतमित्यादि"पहिले उदाहरणमें दिखलाते हैं-भाज्य १७ हार १५ क्षेप ५ यहां इष्टक्षेप पांच ५ है, इसके स्थानमें रूप १ को क्षेप

(२३४) लीलावती। माना तब भाज्य १७ हार १६ क्षेप १ ऐसा न्यास हुआ. पहली रीतिसे वल्ली बनाई ${|c|} १ १ १ ० $ इस वल्लीसे गुणलब्धिरूप दो राशि ७ । ८ इनको ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार इष्टक्षेप ५ से गुणा करा तो हुए ३५ । ४० इनको अपने २ तक्षक १६ । १७ से तष्टा तो शेष बचे ५ । ६ यही इस उदाहरणमें धनक्षेपकी गुणलब्धि हैं, इन ही गुणलब्धिको अपने अपने तक्षक १६ । १७ मेंसे घटाया तो शेष रहे, १० । ११ यही ऋणक्षेपकी गुण लब्धि हुई, इसी प्रकार सब जगह जानना ॥ अस्य ग्रहगणिते उपयोगस्तदर्थं किंचिदुच्यते- इस कुट्टकका ग्रहोंकी गणितमें प्रयोजन पडता हैं उसीके लिये कुछ कहते हैं- कल्प्याऽथ शुद्धिविकलावशेषं षष्टिश्च भाज्यः कुदिनानि हारः ॥ ७५ ॥ तज्जं फलं स्युर्विकला गुणस्तु लिप्ताग्रमस्माच्च कला लवाग्रम् ॥ एवं तदूर्द्धं च तथा- धिमासावमाग्राभ्यां दिवसा रवीन्द्रोः ॥ ७६ ॥ अन्वयः-अथ विकलावशेषं शुद्धिः कल्प्या षष्टिः च भाज्यः कल्प्यः कुदिनानि हारः कल्प्यः तज्जं फलं विकलाः स्युः गुणाः तु लिप्ताग्रम् अस्मात् च फलं कलाः गुणः तु लवाग्रम्। एवं तदूर्ध्वं च कार्यं तथा अधिमासावमाग्राभ्यां रवीन्द्रोः दिवसाः स्युः ॥ ७५ ॥ ७६ ॥ अर्थः-कल्पभगणसे त्रैराशिक करके जो ग्रह मिले उसकी विकलाओंके शेषसे ग्रह और सायन अहर्गण तथा अधिमास शेष और अवमशेषसे सौरदिन तथा चांद- दिन जाननेके लिये पहिले विकला शेषको ऋणक्षेप कल्पना करे, साठको भाज्यक- ल्पना करे और कुदिनोंको हारकल्पना करके कुट्टककी रीतिसे वल्ली बनावे उस वल्लीसे जो लब्धि मिले उसको विकला जाने और गुणको कलाशेष जाने, इस कलाशेषको ऋणक्षेप मानकर फिर कुट्टककी रीतिसे गुणलब्धि लावे जो लब्धि मिले उसको कला जाने और गुणको भाग शेष जाने इसी प्रकार क्रिया करता जाय फिर अधि- मास शेष और अवम शेषसे सूर्य्य और चंद्रमाके दिन लावे ॥ ७५ ॥ ग्रहस्य विकलावशेषेण ग्रहाहर्गणयोरानयनं तद्यथा तत्र षष्टिर्भाज्यः कुदिनानि हारः विकलावशेषं शुद्धिरिति प्रकल्प्य साध्ये गुणाप्ती तत्र लब्धिर्विकलाः स्युः। गुणस्तु कलावशेषम् ।

कुट्टकव्यवहारः । (२३५) एवं कलावशेषः शुद्धिस्तत्र षष्टिर्भाज्यः कुदिनानि हारः लब्धिः कला । गुणस्तु भागशेषम् ॥ भागशेषं शुद्धिस्रिं- शद्भाज्यः कुदिनानि हारः फलं भागाः।गुणो राशिशेषम् ॥ एवं राशिशेषे शुद्धिर्द्वादशभाज्यः । कुदिनानि हारः फलं गतराशयः । गुणो भगणशेषम् ॥ कल्पभगणो भाज्यः कुदिनानि हारः भगणशेषम् । शुद्धिः फलं गतभगणः गणोऽहर्गणः स्यादिति ॥ अस्योदाहरणानि-त्रिप्रश्नाध्याये ॥ एवं कल्पाधिमासाः भाज्याः रविदिनानि हारः अधिमास- शेषं शुद्धिः फलं गताधिमासाः । गुणो गतरविदिवसाः ॥ एवं युगावमानि भाज्यः चान्द्रदिवसा हारः । अवमशेषं शुद्धिः । फलं गतावमानि । गुणो गतचान्द्रदिवसाः ॥ अर्थः-ग्रहकी विकलाके शेषसे ग्रह और अहर्गण मिलता है, सो दिखाते हैं, साठ ६० को भाज्य माना, कुदिनोंको हार माना, विकला शेषको ऋणक्षेप माना फिर कुट्टककी रीतिसे गुणलब्धि साधे तहाँ जो लब्धि मिले वह विकला होती है और गुण कलावशेष होता है. फिर कलावशेषको ऋणक्षेप माने साठको भाज्य माने और कुदिनोंको हार मान- कर कुट्टककी रीति गुणलब्धि साधे, तहां जो लब्धि मिले वह कला होती है और गुण भागशेष होता है. फिर भागशेषको ऋणक्षेप माने तीसको भाज्य माने और कुदिनोंको हार मानकर कुट्टककी रीतिसे जो लब्धि मिले उसको भाग माने और गुणको राशिशेष मानै. फिर राशिशेषको ऋणक्षेप माने, बारहको भाज्य माने कुदिनोंको हार मानकर जो कुट्टककी रीतिसे लब्धि मिलेउसको गतराशि माने और गुणको भगणशेष माने. फिर भगणशेषको ऋणक्षेप माने, कल्पभगणको भाज्य माने, कुदिनोंको हार माने- तब कुट्टककी रीतिसे जो लब्धि मिले उसको गतभगण माने, गुणको अहर्गण माने. इसके उदाहरण-त्रिप्रश्नाध्यायमें कहे हैं. इसी प्रकार कल्पाधिमासको भाज्यमानै;रविदिनोंको हार माने;अधिमास शेषको ऋणक्षेप माने; तब कुट्टककी रीतिसे जो लब्धि मिले उसको गताधिमास जाने गुणको गतसूर्य्यदिन माने. CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri

( २३६ ) लीलावती । फिर इसी प्रकार युगावमोंको भाज्यमाने चन्द्रदिनोंको हार माने और अवमशेषके ऋणक्षेप मानकर कुट्टककी रीतिसे जो लब्धि मिले उसको गत अवम जाने, गुणको गत चन्द्रदिन जाने. संश्लिष्टकुट्टके करणसूत्रं वृत्तम्- मिले बहु कुट्टकमें गुणलब्धि जाननेकी रीति एक श्लोक- एको हरश्चेद्गुणकौ विभिन्नौ तदा गुणैक्यं परिकल्प्य भाज्यम् ॥ अग्रैक्यमग्रं क्रम उक्तवद्यः संश्लिष्टसंज्ञः स्फुटकुट्टकोऽसौ ॥७७॥ अन्वयः-चेत् हरः एकः गुणकौ विभिन्नौ स्यातां तदा गुणैक्यं भाज्यं परिकल्प्य अग्रैक्यम् अग्रं परिकल्प्य यः उक्तवत् क्रमः असौ संश्लिष्टसंज्ञः स्फुटकुट्टकः ॥ ७७ ॥ अर्थः-यदि हर एक हो और गुणक भिन्न भिन्न कई हों तो गुणकोंके योगको भाज्य कल्पना करें और शेषके ऐक्यको ऋणक्षेप कल्पना करे, फिर पहलेहीकी अनुसार वल्लीसे गुणलब्धि लावें, इसको संश्लिष्ट कुट्टक कहते हैं ॥ ७७ ॥ उदाहरणम्- कः पंचनिघ्नो विहृतस्त्रिषष्ट्या सप्तावशेषोऽथ स एव राशिः ॥ दशाहतः स्याद्विहृतस्त्रिषष्ट्या चतुर्दशाग्रो वद राशिमेनम् ॥४९। अन्वयः-कः राशिः पञ्चनिघ्नः त्रिषष्ट्या विहृतः सप्तावशेषः स्यात् । अथ सः एव राशिः दशाहतः त्रिषष्ट्या विहृतः चतुर्दशाग्रः स्यात् । एनं राशिं वद ॥ ४९ ॥ अर्थः- कौनसा राशि है? जिसको पांचसे गुणाकर तिरसठका भाग देनेसे सात ७ बाकी रहते हैं और उसी राशिको दशसे गुणाकर तिरसठका भाग देनेसे चौदह बचते हैं तो कहो वह कौन राशि है ॥ ४९ ॥ अत्र गुणैक्यं भाज्यः अग्रैक्यं शुद्धिः ॥ न्यासः- भाज्य १५ हारः ६३ क्षेपः २१ पूर्ववज्जातो गुणः ७ फलम् ५ एतौ स्वतक्षणाभ्यां शोधितौ जातौ वियोगजौ लब्धिगुणौ ३ ॥ १४ ॥ फैलाव-यहां गुणयोग भाज्य होता है और शेषयोग क्षेप होता है इस कारण गुणों ५ । १० को जोडा तो १५ हुए; यही भाज्य हुआ और शेषों ७ । १४ को जोडा तो २१ हुए; यही क्षेप है;इस प्रकार भाज्य १५ क्षेप २१ हर ६३ हुआ; इनमें तीनका अपवर्तन दिया तो दृढभाज्य ५ हार ७ क्षेप २१ हुए; इनसे पहले कही हुई रीतिके CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri