भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

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कुट्टकव्यवहारः । (२२७) अन्वयः-यत उक्तं तत् क्षेपजे वियोगजे तु तक्षणात् शुद्धे गुणाप्ती स्तः ॥ अर्थः-जो कुछ ऊपर रीति कही सो धनक्षेपकी थी यदि ऋणक्षेप हो तो वल्लीसे जो गुणलब्धि मिलें उन्हें अपने अपने तक्षकमेंसे घटा दे जो शेष रहें उनको गुण और लब्धि जाने ॥ ५५ ॥ अत्र पूर्वोदाहरणे नवतिक्षेपे यौ लब्धिगुणौ जातौ ३० । १८ एतौ स्वतक्षणाभ्यामाभ्यां १०० । ६३ शोधितौ ये शेषके तन्मितौ लब्धिगुणौ नवतिशोधने ज्ञातव्यौ ७० । ४५ एतयोरपि स्वतक्षणं क्षेप इति १७० । १०८ अथवा २७० । १७१ ॥ फैलाव-यहाँ पहले ही उदाहरणमें अर्थात् भाज्य १०० हार ६३ क्षेप ९० से जो गुणलब्धि मिले हैं १८ । ३० इनको अपने अपने तक्षक ६३ । १०० मेंसे घटाया तो ४५ । ७० रहे; यही लब्धि गुण आवेंगे, यदि नब्बेको जोडनेकी जगह घटाया जाय तो, क्योंकि यदि १०० को ऋणक्षेपकी रीतिसे लाये हुए ४५ गुणसे गुणा किया तब ४५०० हुए, इसमें ९० को घटाया तो ४४१० रहे, इनमें ६३ का भाग दिया तो निःशेष हो गया और ७० लब्धि हुए; इससे मालूम हुआ कि, ऊपरकी रीतिके अनुसार ऋणक्षेपमें लाये हुए लब्धि ७० और गुणा ४५ ठीक हैं; इन ४५ । ७० गुणलब्धियोंमें भी इष्टसे गुणे हुए अपने अपने तक्षक जोडनेसे अनेक प्रकारकी गुणलब्धि मिल जाती हैं, जैसे ऋणक्षेपकी गुणलब्धि ४५। ७० हैं, इनमें एक १ इष्टसे गुणा किये हुए अपने अपने तक्षक ६३ । १०० को जोडा तब १०८ । १७० इसी प्रकारका २ दोके इष्टसे १७१ । २७० गुण और लब्धि होते हैं ॥ द्वितीयोदाहरणम्- यद्गुणा गणक षष्टिरन्विता वर्जिता च दशभिः षडुत्तरैः ॥ स्यात्त्रयोदशहता निरग्रका तं गुणं कथय मे पृथक्पृथक्४६ ॥ अन्वयः-हे गणक ! यद्गुणा षष्टिः षडुत्तरैः दशभिः अन्विता वा वर्जिता ततः त्रयोदशहता निरग्रका स्यात् तं गुणम् मे पृथक् पृथक् कथय ॥ ४६ ॥ अर्थः-हे गणक ! जिस किसी अङ्कसे गुणा करेहुए साठमें सोलह १६ घटा दिये या जोड दिये, तदनन्तर तेरहका भाग देनेसे कुछ शेष नहीं रहता है, तो कहो जिस अङ्कसे गुणा करके सोलह १६ जोडे और जिस अङ्कसे गुणा करके सोल- हको घटाया वह अङ्क कौन है जिससे ६० को गुणा किया जाय ॥ ४६ ॥