लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(१४) लीलावती। न्यासः-भाज्यः ६० हारः १३ क्षेपः १६ प्राग्वल्लुब्धा $\begin{vmatrix} ४ २ १ १ १ १६ ० \end{vmatrix}$ तथा जाते गुणाप्ती २।८ अत्रापि लब्धयो वल्ली विषमाः अतो गुणाप्ती स्वलक्षणाभ्यां १३ । ६० शोधिते जाते ११ । ५२ एवं षोडश- क्षेपे एतावेव लब्धिगुणौ ११ । ५२ स्वस्वहराभ्यां शोधितौ जातौ षोडशविशुद्धौ २ । ८ फैलाव-भाज्य ६० हार १३ क्षेप १६ यहाँ भाज्य ६० हार १३ का परस्पर भाग दिया और लब्धियोंको $\begin{vmatrix} ४ २ १ १ १ १६ ० \end{vmatrix}$ पहले कही हुई रीतिके अनुसार उपान्तके क्रमसे नीचे २ लिखा और अङ्कसे उसके ऊपरके अङ्कको गुणा करके उन लब्धियोंके नीचे क्षेपको गुणित अंकमें अन्तके अंकको जोडकर और उसके नीचे शून्य लिखा तो अन्तके अंकको मेट दिया, इस प्रकार करते वल्ली बनी करते गुणलब्धि २।८ मिले परन्तु यहां वल्लीमें सात अंक हैं, इस कारण विषम वल्ली है, इस कारण वल्लीसे प्राप्त हुए गुणलब्धि २।८ को अपने अपने तक्षक १३ । ६० मेंसे घटाया तो ११ । ५२ शेष रहे । यह गुण और लब्धि धनक्षेपके हुए और इसी प्रकार यदि ऋणक्षेप १६ हों तो ऊपरकी रीतिसे प्राप्त हुए गुणलब्धि ११ । ५२ को ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार अपने अपने तक्षक १३ और ६० में घटाया तो २।८ गुणलब्धि मिली, वही ऋणक्षेपमें होंगे, क्योंकि ६० को ११ से गुणा करा तब ६६० हुए इसमें सोलह १६ जोडे तब ६७६ इसमें १३ तेरहका भाग दिया तो निःशेष हो गया और ५२ लब्धि हुए, इस प्रकार करनेसे वही लब्धिगुण मिले जो कि ऊपरकी रीतिसे आये थे परन्तु यह धनक्षेपके लब्धि गुणकी उपपत्ति हुई और ऋणक्षेपमें ६० को २ से गुणा करा तब १२० हुए इसमें १६ घटाये १०४ बचे इसमें १३ तेरहका भाग दिया तो निःशेष हो गया और ८ लब्धि हुए. यह वही गुणक और वही लब्धि मिले जो कि, ऊपर ऋणक्षेपकी रीतिसे आयेथे. इसी प्रकार सब जगहपर उपपत्ति करके गुणा और लब्धिकी शुद्धाशुद्धि जानना चाहिये ॥ कुट्टकान्तरे करणसूत्रं सार्द्ध वृत्तम्- कुट्टककी और रीति देढ श्लोकमें-