लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुट्टकव्यवहारः । ( २२९ ) गुणलब्ध्योः समं ग्राह्यं धीमता तक्षणे फलम् ॥ ७१ ॥ हरतष्टे धनक्षेपे गुणलब्धी तु पूर्ववत्। क्षेपतक्षणलाभाढ्या लब्धिः शुद्धौ तु वर्जिता ॥ ७२ ॥ अन्वयः-धीमता गुणलब्ध्योः तक्षणे फलं समं ग्राह्यम् । धनक्षेपे हरतष्टे सति पूर्व- वत् गुणलब्धी साध्ये । लब्धिः क्षेपतक्षणलाभाढ्या कार्या शुद्धौ तु वर्जिता कार्या ॥ ७१ ॥ ७२ ॥ अर्थः-बुद्धिमान् कुट्टककी गुणलब्धिको अपने २ तक्षकसे तष्टनेमें भागहारकी लब्धि समानही ले हारसे क्षेप अधिक होतो क्षेपमें जितने वार घट सके हारका भाग दे जो क्षेपमेंसे भाग देकर शेष रहे उसको ही क्षेप मानकर पहले कही हुई रीतिके अनुसार गुण और लब्धि साधन करे जो गुण मिले उसको तो ठीक जाने और धनक्षेप हो तौ क्षेपमें हरका भाग देनेसे जो लब्धि मिली थी उसको ऊपर सिद्ध करी हुई लब्धि जोडकर उसको लब्धि माने और यदि ऋणक्षेप हो तो क्षेपमें हरका भाग देनेसे जो लब्धि मिली है उसको ऊपर सिद्ध करी हुई लब्धिमें घटा दे जो शेष रहे उसको लब्धि माने ॥ ७१ ॥ ७२ ॥ उदाहरणम्- येन संगुणिताः पंच त्रयोविंशतिसंयुताः ॥ वर्जिता वा त्रिभिर्भक्ता निरग्राः स्युः स को गुणः ॥ ४७ ॥ अन्वयः-पंच येन संगुणिताः त्रयोविंशतिसंयुताः वा वर्जिताः ततः त्रिभिःभक्ताः निरग्राः स्युः सः गुणः कः ॥ ४७ ॥ अर्थः-पांचको किसी अंकसे गुणा करके जो गुणनफल हो उसमें तेईस जोड दे या घटा दे फिर तीनका भाग दे तो कुछ बाकी नहीं रहता है. तो कहो जिससे पांचको गुणा किया वह गुणक अंक क्या है ? ॥ ४७ ॥ न्यासः-भाज्यः ५ हारः ३ क्षेपः २३ अत्र } १ पूर्ववज्जातं राशिद्वयम् ४६/३३ एतौ भाज्यहाराभ्यां वल्ली } १ २३ तष्टौ अत्राधोराशौ २३ त्रिभिस्तष्टे ० सप्त ७ लभ्यते ऊर्ध्वराशौ ४६ पंचभिस्तष्टे नव ९ लभ्यन्ते तत्र नव न ग्राह्याः । “गुणलब्ध्योः समं ग्राह्यं धीमता तक्षणे फलम्” इति अतः सप्तैव ग्राह्याः। एवं जाते