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लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

कुट्टकव्यवहारः । (२२७) अन्वयः-यत उक्तं तत् क्षेपजे वियोगजे तु तक्षणात् शुद्धे गुणाप्ती स्तः ॥ अर्थः-जो कुछ ऊपर रीति कही सो धनक्षेपकी थी यदि ऋणक्षेप हो तो वल्लीसे जो गुणलब्धि मिलें उन्हें अपने अपने तक्षकमेंसे घटा दे जो शेष रहें उनको गुण और लब्धि जाने ॥ ५५ ॥ अत्र पूर्वोदाहरणे नवतिक्षेपे यौ लब्धिगुणौ जातौ ३० । १८ एतौ स्वतक्षणाभ्यामाभ्यां १०० । ६३ शोधितौ ये शेषके तन्मितौ लब्धिगुणौ नवतिशोधने ज्ञातव्यौ ७० । ४५ एतयोरपि स्वतक्षणं क्षेप इति १७० । १०८ अथवा २७० । १७१ ॥ फैलाव-यहाँ पहले ही उदाहरणमें अर्थात् भाज्य १०० हार ६३ क्षेप ९० से जो गुणलब्धि मिले हैं १८ । ३० इनको अपने अपने तक्षक ६३ । १०० मेंसे घटाया तो ४५ । ७० रहे; यही लब्धि गुण आवेंगे, यदि नब्बेको जोडनेकी जगह घटाया जाय तो, क्योंकि यदि १०० को ऋणक्षेपकी रीतिसे लाये हुए ४५ गुणसे गुणा किया तब ४५०० हुए, इसमें ९० को घटाया तो ४४१० रहे, इनमें ६३ का भाग दिया तो निःशेष हो गया और ७० लब्धि हुए; इससे मालूम हुआ कि, ऊपरकी रीतिके अनुसार ऋणक्षेपमें लाये हुए लब्धि ७० और गुणा ४५ ठीक हैं; इन ४५ । ७० गुणलब्धियोंमें भी इष्टसे गुणे हुए अपने अपने तक्षक जोडनेसे अनेक प्रकारकी गुणलब्धि मिल जाती हैं, जैसे ऋणक्षेपकी गुणलब्धि ४५। ७० हैं, इनमें एक १ इष्टसे गुणा किये हुए अपने अपने तक्षक ६३ । १०० को जोडा तब १०८ । १७० इसी प्रकारका २ दोके इष्टसे १७१ । २७० गुण और लब्धि होते हैं ॥ द्वितीयोदाहरणम्- यद्गुणा गणक षष्टिरन्विता वर्जिता च दशभिः षडुत्तरैः ॥ स्यात्त्रयोदशहता निरग्रका तं गुणं कथय मे पृथक्पृथक्४६ ॥ अन्वयः-हे गणक ! यद्गुणा षष्टिः षडुत्तरैः दशभिः अन्विता वा वर्जिता ततः त्रयोदशहता निरग्रका स्यात् तं गुणम् मे पृथक् पृथक् कथय ॥ ४६ ॥ अर्थः-हे गणक ! जिस किसी अङ्कसे गुणा करेहुए साठमें सोलह १६ घटा दिये या जोड दिये, तदनन्तर तेरहका भाग देनेसे कुछ शेष नहीं रहता है, तो कहो जिस अङ्कसे गुणा करके सोलह १६ जोडे और जिस अङ्कसे गुणा करके सोल- हको घटाया वह अङ्क कौन है जिससे ६० को गुणा किया जाय ॥ ४६ ॥

(१४) लीलावती। न्यासः-भाज्यः ६० हारः १३ क्षेपः १६ प्राग्वल्लुब्धा $\begin{vmatrix} ४ २ १ १ १ १६ ० \end{vmatrix}$ तथा जाते गुणाप्ती २।८ अत्रापि लब्धयो वल्ली विषमाः अतो गुणाप्ती स्वलक्षणाभ्यां १३ । ६० शोधिते जाते ११ । ५२ एवं षोडश- क्षेपे एतावेव लब्धिगुणौ ११ । ५२ स्वस्वहराभ्यां शोधितौ जातौ षोडशविशुद्धौ २ । ८ फैलाव-भाज्य ६० हार १३ क्षेप १६ यहाँ भाज्य ६० हार १३ का परस्पर भाग दिया और लब्धियोंको $\begin{vmatrix} ४ २ १ १ १ १६ ० \end{vmatrix}$ पहले कही हुई रीतिके अनुसार उपान्तके क्रमसे नीचे २ लिखा और अङ्कसे उसके ऊपरके अङ्कको गुणा करके उन लब्धियोंके नीचे क्षेपको गुणित अंकमें अन्तके अंकको जोडकर और उसके नीचे शून्य लिखा तो अन्तके अंकको मेट दिया, इस प्रकार करते वल्ली बनी करते गुणलब्धि २।८ मिले परन्तु यहां वल्लीमें सात अंक हैं, इस कारण विषम वल्ली है, इस कारण वल्लीसे प्राप्त हुए गुणलब्धि २।८ को अपने अपने तक्षक १३ । ६० मेंसे घटाया तो ११ । ५२ शेष रहे । यह गुण और लब्धि धनक्षेपके हुए और इसी प्रकार यदि ऋणक्षेप १६ हों तो ऊपरकी रीतिसे प्राप्त हुए गुणलब्धि ११ । ५२ को ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार अपने अपने तक्षक १३ और ६० में घटाया तो २।८ गुणलब्धि मिली, वही ऋणक्षेपमें होंगे, क्योंकि ६० को ११ से गुणा करा तब ६६० हुए इसमें सोलह १६ जोडे तब ६७६ इसमें १३ तेरहका भाग दिया तो निःशेष हो गया और ५२ लब्धि हुए, इस प्रकार करनेसे वही लब्धिगुण मिले जो कि ऊपरकी रीतिसे आये थे परन्तु यह धनक्षेपके लब्धि गुणकी उपपत्ति हुई और ऋणक्षेपमें ६० को २ से गुणा करा तब १२० हुए इसमें १६ घटाये १०४ बचे इसमें १३ तेरहका भाग दिया तो निःशेष हो गया और ८ लब्धि हुए. यह वही गुणक और वही लब्धि मिले जो कि, ऊपर ऋणक्षेपकी रीतिसे आयेथे. इसी प्रकार सब जगहपर उपपत्ति करके गुणा और लब्धिकी शुद्धाशुद्धि जानना चाहिये ॥ कुट्टकान्तरे करणसूत्रं सार्द्ध वृत्तम्- कुट्टककी और रीति देढ श्लोकमें-

कुट्टकव्यवहारः । ( २२९ ) गुणलब्ध्योः समं ग्राह्यं धीमता तक्षणे फलम् ॥ ७१ ॥ हरतष्टे धनक्षेपे गुणलब्धी तु पूर्ववत्। क्षेपतक्षणलाभाढ्या लब्धिः शुद्धौ तु वर्जिता ॥ ७२ ॥ अन्वयः-धीमता गुणलब्ध्योः तक्षणे फलं समं ग्राह्यम् । धनक्षेपे हरतष्टे सति पूर्व- वत् गुणलब्धी साध्ये । लब्धिः क्षेपतक्षणलाभाढ्या कार्या शुद्धौ तु वर्जिता कार्या ॥ ७१ ॥ ७२ ॥ अर्थः-बुद्धिमान् कुट्टककी गुणलब्धिको अपने २ तक्षकसे तष्टनेमें भागहारकी लब्धि समानही ले हारसे क्षेप अधिक होतो क्षेपमें जितने वार घट सके हारका भाग दे जो क्षेपमेंसे भाग देकर शेष रहे उसको ही क्षेप मानकर पहले कही हुई रीतिके अनुसार गुण और लब्धि साधन करे जो गुण मिले उसको तो ठीक जाने और धनक्षेप हो तौ क्षेपमें हरका भाग देनेसे जो लब्धि मिली थी उसको ऊपर सिद्ध करी हुई लब्धि जोडकर उसको लब्धि माने और यदि ऋणक्षेप हो तो क्षेपमें हरका भाग देनेसे जो लब्धि मिली है उसको ऊपर सिद्ध करी हुई लब्धिमें घटा दे जो शेष रहे उसको लब्धि माने ॥ ७१ ॥ ७२ ॥ उदाहरणम्- येन संगुणिताः पंच त्रयोविंशतिसंयुताः ॥ वर्जिता वा त्रिभिर्भक्ता निरग्राः स्युः स को गुणः ॥ ४७ ॥ अन्वयः-पंच येन संगुणिताः त्रयोविंशतिसंयुताः वा वर्जिताः ततः त्रिभिःभक्ताः निरग्राः स्युः सः गुणः कः ॥ ४७ ॥ अर्थः-पांचको किसी अंकसे गुणा करके जो गुणनफल हो उसमें तेईस जोड दे या घटा दे फिर तीनका भाग दे तो कुछ बाकी नहीं रहता है. तो कहो जिससे पांचको गुणा किया वह गुणक अंक क्या है ? ॥ ४७ ॥ न्यासः-भाज्यः ५ हारः ३ क्षेपः २३ अत्र } १ पूर्ववज्जातं राशिद्वयम् ४६/३३ एतौ भाज्यहाराभ्यां वल्ली } १ २३ तष्टौ अत्राधोराशौ २३ त्रिभिस्तष्टे ० सप्त ७ लभ्यते ऊर्ध्वराशौ ४६ पंचभिस्तष्टे नव ९ लभ्यन्ते तत्र नव न ग्राह्याः । “गुणलब्ध्योः समं ग्राह्यं धीमता तक्षणे फलम्” इति अतः सप्तैव ग्राह्याः। एवं जाते

( २३० ) लीलावती । गुणाप्ती २ । ११ । "क्षेपजे तक्षणाच्छुद्धे" इति त्रयोविंशति शुद्धौ जाता विपरीतशोधनादवशिष्टा लब्धिः ६ शुद्धौ जाते १ । ६ " इष्टाहतस्वस्वहरेण युक्ते" इति वक्ष्यमाणविधिना "धनर्णयोरन्तरमेव योगः" इति बीजो- क्त्या च इष्टगुणितस्वहारक्षेपणेन यथा धनलब्धिः स्यादि- ति तथा कृते जाते गुणाप्ती ७ । ४ एवं सर्वत्र ॥ अथवा "हरतष्टे धनक्षेपे " इति । न्यासः- भाज्यः ५ हारः ३ क्षेपः २ ॥ पूर्ववज्जाते गुणाप्ती २ । ४ एते स्वस्वहराभ्यां शोधिते विशुद्धि ११ । २ जाते "क्षेपतक्षणलाभाढ्या लब्धिः" इति जातौ क्षेपजौ लब्धिगुणौ ११ । २ "शुद्धौ तु वर्जिता" इति शुद्धिजौ भवतः । किन्त्वत्र शुद्धा न भवति । तस्माद्विपरीतशोध- नेन ऋणलब्धिः ६ गुणः १ धनलब्ध्यर्थं द्विगुणे स्वहारे क्षिप्ते सति जाते ७ । ४ फैलाव-भाज्य ५ हार ३ क्षेप २३ यहां पहले कही हुई रीति के अनुसार वल्ली बनाई १ फिर पहले कही हुई रीतिके अनुसार उपान्त के अंक से उसके २ ३ ० ऊपरके अंकको गुणा कर उसमें अन्त अंक जोड दिया, फिर अन्तके अंकको मिटा दिया, इस प्रकार जहां तक एक शेष रहा तहांतक बारंबार करनेसे ऊपरकी दो राशियें मिलीं, ४६ २३ इनको भाज्य ५ और हार ३ से तष्टा अर्थात् नीचेकी राशि २३ को हार ३ से तष्टा तो सात लब्धि मिले, फिर ऊपरकी राशि ४६ को भाज्य ५ से तष्टा तो नौ ९ लब्धि मिल सकते हैं, परन्तु ९ लब्धि नहीं लेना चाहिए क्योंकि " गुणलब्ध्योः सममित्यादि " रीतिके अनुसार दोनोंको तष्टनेमें लब्धि समान ही लेना चाहिए; इस कारण नौ ९ लब्धि न लेकर पहलेके बराबर सात ही लब्धि लिये तब दोनों स्थानोंमें तष्टनेपर रहे २ । ११ यही यहां गुण लब्धि हुए; यह धनक्षेपके गुण लब्धि सिद्ध हुए; और उन २ । ११ को अपने २ तक्षक ३ । ५ में से विपरीत रीतिसे घटा दिया तो १ । ६ रहे, परन्तु यहां लब्धि ऋण है क्योंकि उलटी रीतिसे घटाया है, इसको धन करनेके लिए इष्ट २ से गुणा किये हुए अपने २ तक्षकको पहली गुण लब्धिमें

जोड़ दे, आगे इस प्रकार लिखेंगे, इस कारण इष्ट २ से गुणा करे हुए अपने २ तक्षक ६ । १० को पहिली गुण लब्धि १ । ६ में जोडा, अर्थात् यहां ऊपरकी राशिमें ६ ऋण हैं और "ऋण धनका अन्तर करना ही योग्य होता है" ऐसा बीजगणित का नियम है, इस कारण ऋण ६ का और इष्ट २ से गुणा किये हुए अपने २ तक्षक १० का अन्तर किया तो चार हुए, और इष्ट २ से गुणा किये हुए तक्षक ६ को गुण १ में जोडा तो ७ हुए; अर्थात् इस रीतिके अनुसार गुण लब्धि मिले ७ । ४ ॥ ऊपर कही हुई "हरतष्टे धनक्षेपे" इस रीतिको पहले उदाहरण भाज्य ५ हर ३ क्षेप २३ में दिखाते हैं । यहां ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार हर ३ का क्षेप २३ में भाग देने से लब्धि हुए ७ इसको अलग लिखा और शेष दो २ जो बचे उनको क्षेप २ मानकर न्यास हुआ, भाज्य ५ हार ३ क्षेप २ अब पहले कही हुई रीतिसे वल्ली हुई १ १ २ ० फिर वल्लीसे गुणलब्धि मिले २ । ४ यहां गुण तो २ यही रहेगा परन्तु लब्धि ४ में वह अंक जोड दिया, जो पहिले लब्धि ७ मिला था, तो ११ लब्धि हुई, यह गुण लब्धि पहले गुण लब्धिकी तुल्य आये, परंतु यह धनक्षेपमें होते हैं, यदि ऋण क्षेप हो तो वल्लीसे प्राप्त हुई लब्धि मिले, उसमें क्षेप में हरका भाग देनेसे प्राप्त हुई लब्धिको घटाकर जो शेष रहे वह लब्धि होती है. जैसे पहले ही उदाहरणमें क्षेपमें हरका भाग देनेसे प्राप्ति हुई लब्धि ७ मिले, और शेष रहे दो उन्हें क्षेप मान कर पहली रीतिसे वल्ली बनाई तो उस वल्लीसे गुण और लब्धि मिले २ । ४ परन्तु यह धन क्षेपके हैं; इन्हें अपने २ तक्षक ३ । ५ में से घटाया तब शेष रहे १ । १ यह ऋण क्षेपकी गुणलब्धि हुई, यह गुणा तो ठीक है, परन्तु क्षेपमें हरका भाग देने से जो ७ सात लब्धि मिले थे, उनको लब्धि १ एक में घटाया तो एकमें सात नहीं घट सकते, इस कारण विपरीत अन्तर किया. अर्थात् सात ७ में १ एक को घटाया तो ऋणलब्धि मिली ६ इसको धनलब्धि करनेके लिये इष्ट २ से गुणा करे हुए अपने २ तक्षक ६ । १० में जोडा, तो ७ गुण और "धनर्णयो- रन्तरेमेव योगः" इस रीतिके अनुसार लब्धि ४ हुए ॥ कुट्टकान्तरे करणसूत्रं वृत्तम्- कुट्टककी और रीति श्लोक १ क्षेपाभावोऽथवा यत्र क्षेपः शुद्धो हरोद्धृतः ॥ ज्ञेयः शून्यं गुणस्तत्र क्षेपो हारहृतः फलम् ॥ ७३ ॥

( २३२ ) लीलावती । अन्वयः-यत्र क्षेपाभावः तत्र अथवा यत्र हरोद्धतः क्षेपः शुद्धः भवति तत्र अपि शून्यं गुणः ज्ञेयः हारहतः क्षेपः फलं भवति ॥ ७३ ॥ अर्थः-जिस कुट्टकके उदाहरणमें क्षेप शून्य हो तहां गुणक भी शून्य जानना, क्षेपमें हरका भाग देने से जो लब्धि मिले वह लब्धि होती है, अथवा जहां हरका भाग देनेसे क्षेपमें कुछ शेष न बचता हो तहां भी शून्य ही गुणक होता है और क्षेपमें हरका भाग देने से जो मिले वह लब्धि होती है ॥ ७३ ॥ उदाहरणम्- येन पञ्च गुणिताः खसंयुताः पञ्चषष्टिसहिताश्च तेऽथवा ॥ स्युस्त्रयोदशहता निरग्रकास्तं गुणं गणक कीर्तयाऽऽशु मे ४८ अन्वयः-येन गुणिताः पंच खसंयुताः अथवा पंचषष्टिसहिताः च ते त्रयो दशहताः निरग्रकाः स्युः हे गणक ! तं गुणं मे आशु कीर्तय ॥ ४८ ॥ अर्थः-किसी अंक से गुणा किये हुए पांच ५ में शून्य जोडा या ६५ जोडे, फिर तेरहका भाग दिया तो कुछ शेष नहीं रहा तो हे गणक ! उस गुणक अंकको बताओ जिससे कि, पांचको गुणा किया जाय ॥ ४८ ॥ न्यासः-भाज्यः ५ हारः १३ क्षेपः शून्यम् ० . “ ज्ञेयः शून्यं ० गुणस्तत्र क्षेपो हारहृतः फलमिति” ॥ क्षेपाभावे गुणाप्ती ० । ० इष्टाहतेत्यथवा १३ । ५ वा २६ । १० ॥ फैलाव-भाज्य ५ हार १३ क्षेप० यहां क्षेप० शून्य है, इस कारण ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार शून्य० ही गुणक होगा और शून्यमें किसी अंकका भाग देनेसे शून्य ही लब्धि होता है इस कारण यहां क्षेपमें हरका भाग दिया तो शून्य ही लब्धि हुआ; इस प्रकार गुणलब्धि मिले । ० । ० । न्यासः-भाज्यः ५ हारः १३ क्षेपः ६५ “क्षेपः शुद्धो हरोद्धतः । ज्ञेयः शून्यं गुणस्तत्र क्षेपो हारहृतः फल- मिति” जाते गुणाप्ती ० । ५ ॥ फैलाव-भाज्य ५ हार १३ क्षेप ६५ यहां क्षेप ६५ में हार १३ का भाग देनेसे कुछ शेष नहीं रहता है; इस कारण ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार गुण मिला० और क्षेपमें हरका भाग देनेसे ५ मिले यही लब्धि हुई इस प्रकार गुणलब्धि० । ५ मिले॥

कुट्टकव्यवहारः । ( २३३ ) अथ सर्वत्र कुट्टके गुणलब्ध्योरनेकधा दर्शनार्थं करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्- अब सब जगह कुट्टकमें अनेक प्रकारकी गुणलब्धि दिखानेकी रीति आधा श्लोक- इष्टाहतस्वस्वहरेण युक्ते ते वा भवेतां बहुधा गुणाप्ती ॥ ऽऽ ॥ अन्वयः-वा ते गुणाप्ती इष्टाहतस्वस्वहरेण युक्ते बहुधा भवेताम् ॥ अर्थः-अथवा वही गुणलब्धि इष्टसे गुणे हुए अपने अपने तक्षकमें जोड़नेसे अनेक प्रकारके हो जाते हैं ॥ अस्योदाहरणानि दर्शितानि पूर्वमिति । इसके उदाहरण पहले दिखाचुके हैं, इस कारण यहां नहीं लिखे. अथ स्थिरकुट्टककरणसूत्रं वृत्तम्- अब स्थिर कुट्टककी रीति लिखते हैं एक श्लोकमें- क्षेपे तु रूपे यदि वा विशुद्धे स्यातां क्रमाद्ये गुणकारलब्धी ॥ अभीप्सितक्षेपविशुद्धिनिघ्ने स्वहारतष्टे भवतस्तयोस्ते ॥ ७४ ॥ अन्वयः-यदि रूपे क्षेपे वा विशुद्धे तयोः ये गुणकारलब्धी स्यातां ते क्रमात् अभीप्सितक्षेपविशुद्धिनिघ्ने स्वहारतष्टे तयोः ते भवतः ॥ ७४ ॥ अर्थः-जहां इष्टक्षेपका अंक बडा हो वहां रूप १ को क्षेप मानकर पहले कही हुई रीतिसे गुणलब्धि लावे फिर उस गुणलब्धिको इष्टक्षेपसे गुणा करके उसको अपने अपने तक्षकसे तष्टे जो शेष बचे उसको गुणलब्धि जाने, यह गुणलब्धि धनक्षेपकी है, यदि ऋणक्षेप हो तो इन गुणलब्धिको अपने अपने तक्षकमेंसे घटादे जो शेष रहे वह गुणलब्धि होती है ॥ ७४ ॥ प्रथमोदाहरणे दृढभाज्यहारयोः रूपक्षेपयोर्न्यासः-भाज्यः १७ हारः १५ क्षेपः १ अत्र गुणाप्ती ७ । ८ एते त्विष्ट-- क्षेपेण पञ्चकेन गुणिते स्वहारतष्टे च जाते ५ । ६ ॥ अथ रूपशुद्धौ गुणाप्ती ७ । ८ तक्षणाच्छुद्धौ जातौ लब्धि- गुणौ ९ । ८ एते पञ्चगुणे स्वहारतष्टे च जाते १० । ११ एवं षष्टिविशुद्धौ ॥ एवं सर्वत्र ॥ फैलाव-इसको"एकविंशतियुतमित्यादि"पहिले उदाहरणमें दिखलाते हैं-भाज्य १७ हार १५ क्षेप ५ यहां इष्टक्षेप पांच ५ है, इसके स्थानमें रूप १ को क्षेप

(२३४) लीलावती। माना तब भाज्य १७ हार १६ क्षेप १ ऐसा न्यास हुआ. पहली रीतिसे वल्ली बनाई ${|c|} १ १ १ ० $ इस वल्लीसे गुणलब्धिरूप दो राशि ७ । ८ इनको ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार इष्टक्षेप ५ से गुणा करा तो हुए ३५ । ४० इनको अपने २ तक्षक १६ । १७ से तष्टा तो शेष बचे ५ । ६ यही इस उदाहरणमें धनक्षेपकी गुणलब्धि हैं, इन ही गुणलब्धिको अपने अपने तक्षक १६ । १७ मेंसे घटाया तो शेष रहे, १० । ११ यही ऋणक्षेपकी गुण लब्धि हुई, इसी प्रकार सब जगह जानना ॥ अस्य ग्रहगणिते उपयोगस्तदर्थं किंचिदुच्यते- इस कुट्टकका ग्रहोंकी गणितमें प्रयोजन पडता हैं उसीके लिये कुछ कहते हैं- कल्प्याऽथ शुद्धिविकलावशेषं षष्टिश्च भाज्यः कुदिनानि हारः ॥ ७५ ॥ तज्जं फलं स्युर्विकला गुणस्तु लिप्ताग्रमस्माच्च कला लवाग्रम् ॥ एवं तदूर्द्धं च तथा- धिमासावमाग्राभ्यां दिवसा रवीन्द्रोः ॥ ७६ ॥ अन्वयः-अथ विकलावशेषं शुद्धिः कल्प्या षष्टिः च भाज्यः कल्प्यः कुदिनानि हारः कल्प्यः तज्जं फलं विकलाः स्युः गुणाः तु लिप्ताग्रम् अस्मात् च फलं कलाः गुणः तु लवाग्रम्। एवं तदूर्ध्वं च कार्यं तथा अधिमासावमाग्राभ्यां रवीन्द्रोः दिवसाः स्युः ॥ ७५ ॥ ७६ ॥ अर्थः-कल्पभगणसे त्रैराशिक करके जो ग्रह मिले उसकी विकलाओंके शेषसे ग्रह और सायन अहर्गण तथा अधिमास शेष और अवमशेषसे सौरदिन तथा चांद- दिन जाननेके लिये पहिले विकला शेषको ऋणक्षेप कल्पना करे, साठको भाज्यक- ल्पना करे और कुदिनोंको हारकल्पना करके कुट्टककी रीतिसे वल्ली बनावे उस वल्लीसे जो लब्धि मिले उसको विकला जाने और गुणको कलाशेष जाने, इस कलाशेषको ऋणक्षेप मानकर फिर कुट्टककी रीतिसे गुणलब्धि लावे जो लब्धि मिले उसको कला जाने और गुणको भाग शेष जाने इसी प्रकार क्रिया करता जाय फिर अधि- मास शेष और अवम शेषसे सूर्य्य और चंद्रमाके दिन लावे ॥ ७५ ॥ ग्रहस्य विकलावशेषेण ग्रहाहर्गणयोरानयनं तद्यथा तत्र षष्टिर्भाज्यः कुदिनानि हारः विकलावशेषं शुद्धिरिति प्रकल्प्य साध्ये गुणाप्ती तत्र लब्धिर्विकलाः स्युः। गुणस्तु कलावशेषम् ।

कुट्टकव्यवहारः । (२३५) एवं कलावशेषः शुद्धिस्तत्र षष्टिर्भाज्यः कुदिनानि हारः लब्धिः कला । गुणस्तु भागशेषम् ॥ भागशेषं शुद्धिस्रिं- शद्भाज्यः कुदिनानि हारः फलं भागाः।गुणो राशिशेषम् ॥ एवं राशिशेषे शुद्धिर्द्वादशभाज्यः । कुदिनानि हारः फलं गतराशयः । गुणो भगणशेषम् ॥ कल्पभगणो भाज्यः कुदिनानि हारः भगणशेषम् । शुद्धिः फलं गतभगणः गणोऽहर्गणः स्यादिति ॥ अस्योदाहरणानि-त्रिप्रश्नाध्याये ॥ एवं कल्पाधिमासाः भाज्याः रविदिनानि हारः अधिमास- शेषं शुद्धिः फलं गताधिमासाः । गुणो गतरविदिवसाः ॥ एवं युगावमानि भाज्यः चान्द्रदिवसा हारः । अवमशेषं शुद्धिः । फलं गतावमानि । गुणो गतचान्द्रदिवसाः ॥ अर्थः-ग्रहकी विकलाके शेषसे ग्रह और अहर्गण मिलता है, सो दिखाते हैं, साठ ६० को भाज्य माना, कुदिनोंको हार माना, विकला शेषको ऋणक्षेप माना फिर कुट्टककी रीतिसे गुणलब्धि साधे तहाँ जो लब्धि मिले वह विकला होती है और गुण कलावशेष होता है. फिर कलावशेषको ऋणक्षेप माने साठको भाज्य माने और कुदिनोंको हार मान- कर कुट्टककी रीति गुणलब्धि साधे, तहां जो लब्धि मिले वह कला होती है और गुण भागशेष होता है. फिर भागशेषको ऋणक्षेप माने तीसको भाज्य माने और कुदिनोंको हार मानकर कुट्टककी रीतिसे जो लब्धि मिले उसको भाग माने और गुणको राशिशेष मानै. फिर राशिशेषको ऋणक्षेप माने, बारहको भाज्य माने कुदिनोंको हार मानकर जो कुट्टककी रीतिसे लब्धि मिलेउसको गतराशि माने और गुणको भगणशेष माने. फिर भगणशेषको ऋणक्षेप माने, कल्पभगणको भाज्य माने, कुदिनोंको हार माने- तब कुट्टककी रीतिसे जो लब्धि मिले उसको गतभगण माने, गुणको अहर्गण माने. इसके उदाहरण-त्रिप्रश्नाध्यायमें कहे हैं. इसी प्रकार कल्पाधिमासको भाज्यमानै;रविदिनोंको हार माने;अधिमास शेषको ऋणक्षेप माने; तब कुट्टककी रीतिसे जो लब्धि मिले उसको गताधिमास जाने गुणको गतसूर्य्यदिन माने. CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri

( २३६ ) लीलावती । फिर इसी प्रकार युगावमोंको भाज्यमाने चन्द्रदिनोंको हार माने और अवमशेषके ऋणक्षेप मानकर कुट्टककी रीतिसे जो लब्धि मिले उसको गत अवम जाने, गुणको गत चन्द्रदिन जाने. संश्लिष्टकुट्टके करणसूत्रं वृत्तम्- मिले बहु कुट्टकमें गुणलब्धि जाननेकी रीति एक श्लोक- एको हरश्चेद्गुणकौ विभिन्नौ तदा गुणैक्यं परिकल्प्य भाज्यम् ॥ अग्रैक्यमग्रं क्रम उक्तवद्यः संश्लिष्टसंज्ञः स्फुटकुट्टकोऽसौ ॥७७॥ अन्वयः-चेत् हरः एकः गुणकौ विभिन्नौ स्यातां तदा गुणैक्यं भाज्यं परिकल्प्य अग्रैक्यम् अग्रं परिकल्प्य यः उक्तवत् क्रमः असौ संश्लिष्टसंज्ञः स्फुटकुट्टकः ॥ ७७ ॥ अर्थः-यदि हर एक हो और गुणक भिन्न भिन्न कई हों तो गुणकोंके योगको भाज्य कल्पना करें और शेषके ऐक्यको ऋणक्षेप कल्पना करे, फिर पहलेहीकी अनुसार वल्लीसे गुणलब्धि लावें, इसको संश्लिष्ट कुट्टक कहते हैं ॥ ७७ ॥ उदाहरणम्- कः पंचनिघ्नो विहृतस्त्रिषष्ट्या सप्तावशेषोऽथ स एव राशिः ॥ दशाहतः स्याद्विहृतस्त्रिषष्ट्या चतुर्दशाग्रो वद राशिमेनम् ॥४९। अन्वयः-कः राशिः पञ्चनिघ्नः त्रिषष्ट्या विहृतः सप्तावशेषः स्यात् । अथ सः एव राशिः दशाहतः त्रिषष्ट्या विहृतः चतुर्दशाग्रः स्यात् । एनं राशिं वद ॥ ४९ ॥ अर्थः- कौनसा राशि है? जिसको पांचसे गुणाकर तिरसठका भाग देनेसे सात ७ बाकी रहते हैं और उसी राशिको दशसे गुणाकर तिरसठका भाग देनेसे चौदह बचते हैं तो कहो वह कौन राशि है ॥ ४९ ॥ अत्र गुणैक्यं भाज्यः अग्रैक्यं शुद्धिः ॥ न्यासः- भाज्य १५ हारः ६३ क्षेपः २१ पूर्ववज्जातो गुणः ७ फलम् ५ एतौ स्वतक्षणाभ्यां शोधितौ जातौ वियोगजौ लब्धिगुणौ ३ ॥ १४ ॥ फैलाव-यहां गुणयोग भाज्य होता है और शेषयोग क्षेप होता है इस कारण गुणों ५ । १० को जोडा तो १५ हुए; यही भाज्य हुआ और शेषों ७ । १४ को जोडा तो २१ हुए; यही क्षेप है;इस प्रकार भाज्य १५ क्षेप २१ हर ६३ हुआ; इनमें तीनका अपवर्तन दिया तो दृढभाज्य ५ हार ७ क्षेप २१ हुए; इनसे पहले कही हुई रीतिके CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri

अनुसार गुणलब्धि मिली ७। २ यह धनक्षेपकी है. ऋण क्षेपमें इन ७ । २ गुण- लोभ्यको अपने अपने तक्षक २१। ५ मेंसे घटाया तौ १४ । ३ रहे,यही ऋणक्षेपकी गुणलब्धि हुई ॥ इति लीलावत्यां कुट्टकाध्यायः । इति श्रीभास्कराचार्य्यविरचितलीलावत्याः स्वरूपप्रकाश- भाषाटीकायां कुट्टकाध्यायः॥ अथ गणितपाशे निर्द्दिष्टौकैः संख्यायाः विभेदे करणसूत्रं वृत्तम्- अब गणितपाशमें दिये हुए कुछ अंकोंको अलट पलट करके भेदोंकी संख्या और भेदोंकी संख्याओंका योग जाननेकी रीति- स्थानान्तमेकादिचयाङ्कघातः संख्याविभेदा नियतैः स्यु- रंकैः ॥ भक्तोऽकमित्यांकसमासनिघ्नः स्थानेषु युक्तो मितिसंयुतिः स्यात् ॥ ७८ ॥ अन्वयः-स्थानान्तम् एकादिचयाङ्कघातः कार्य्यः तदा नियतैः अंकैःसंख्याविभेदाः स्युः। सः एकादिचयांकघातः अंकसमासनिघ्नः अंकमित्या भक्तः ततः स्थानेषु युक्तः मितिसंयुतिः स्यात् ॥ ७८ ॥ अर्थः-जितने स्थानोंमें अंक दिये जायें उतने ही स्थानोंमें एक आदि अंक लिखकर परस्पर घात कर ले, जो गुणनफल हो वही उन अंकोंके भेदोंकी संख्या होगी, परन्तु दिये हुए अंकोंमें एक ही अंक दूसरी बार न हो और उसी एक आदि अङ्कोंके घातको दिये हुए अङ्कोंको योगसे गुणा करके जितने स्थानोंमें अङ्क दिये हों उस स्थानसंख्याका भाग दे जो लब्धि हो उसको जितने स्थानोंमें अंक दिये हों उतने ही स्थानोंमें एक एक स्थान बढा कर लिखके जोड ले तब सब भेदोंके अंकोंका योग मिलता है ॥ ७८ ॥ उदाहरणम्- द्विकाष्टकाभ्यां त्रिनवाष्टकैर्वा निरंतरं द्व्यादिनवावसानैः ॥ संख्याविभेदाः कति संभवंति तत्संख्यैक्यानि पृथग्व- दाशु ॥ ५० ॥ अन्वयः-द्विकाष्टकाभ्यां वा त्रिनवाष्टकैः तथा निरन्तरं द्व्यादिनवावसानैः कति संख्याविभेदाः सम्भवन्ति । तत्संख्यैक्यानि च पृथक् आशु वद ॥ ५० ॥

अर्थः-दो और आठके और तीन नौ आठके तथा दोसे लेकर नौ पर्यन्त अङ्कोंके कितने संख्या भेद होंगे ? और उन भेदोंके अङ्कोंका योग क्या होगा यह अलग अलग शीघ्र कहो ॥ ५० ॥ न्यासः २। ८ अत्र स्थाने २ स्थानान्तमेकादिचयांकौ १।२ घातः २ एवं जातौ संख्याभेदौ २ अथ स एव घातोंकसमास १० निघ्नः २० अंकमित्यानया २ भक्तः १० स्थानद्वये युक्तो जातं संख्यैक्यम् ११० ॥ फैलाव-२।८ यहां दिये हुए अङ्क दो हैं,इस कारण एक आदि १।२ दो अङ्कों- हीका घात किया तो २ हुए, इतने ही भेद होंगे, जैसे २८।८२ उसी एक आदि अंकोंके घात २ को दिये हुए अंकों २।८ के योग १० से गुणा किया तो २० हुए, इसमें दिये हुए अंकोंकी स्थान संख्या २ का भाग दिया तो लब्धि हुए १० इसको दो स्थानोंमें एक एक स्थान बढाकर लिखा तो १० १० ऐसा हुआ इसको जोडा तो ११० हुए; यही यह उन दोनों भेदों २८।८२ की संख्याका योग ११० हुआ. द्वितीयोदाहरणे न्यासः-३ । ९ । ८ अत्रैकादिचयांकाः १।२।३ घातः ६ एतावन्तः संख्याभेदाः घातः ६ अंकमास २० हतः १२० अंकमित्या ३ भक्तः ४० स्थानत्रये युक्तो जातं संख्यैक्यम् ४४४० ॥ फैलाव-दूसरे उदाहरणमें ३।९।८ अंक है, यहां पहले ३ ९।८ इन कही हुई रीति के अनुसार एक आदि १।२।३ तीन अंकों- अङ्कोंके भेदोंका का घात किया तो ६ हुए, यहां छ ६ ही भेद होंगे, फिर स्वरूप- एकादि अंकोंके घात ६ को दिये हुए अंकों ३।९।८ के ३ ८ ९ योग २० गुणा किया तो १२० हुए; इसमें अंकोंकी स्थान ३ ९ ८ संख्या ३ का भाग दिया तो ४० लब्धि हुए इनको एक एक ८ ९ ३ स्थान बढाकर तीन स्थानोंमें लिखकर ४० जोडा तो ४४४० ८ ९ हुए यह उन छवों भेदोंकी संख्याका योग है ॥ ९ ८ ३ ९ ३ ८ तृतीयोदाहरणे न्यासः-२। ३। ४। ५। ६। ७। ८। ९ एवमत्र संख्याभेदाश्चत्वारिंशत्सहस्त्राणि शतत्रयं विश-

तिश्र्व४०३२० संख्यैक्यञ्च चतुर्विंशतिनिखर्वाणि त्रिषष्टि- पद्मानि नवनवतिकोटयो नवनवतिलक्षाः पञ्चसप्ततिसह- स्राणि शतत्रयं षष्टिश्च २४६३९९९९७५३६०। फैलाव-इस तीसरे उदाहरणमें २।३।४।५।६।७।८।९अंक हैं. पहले कही हुई रीतिके अनुसार एक आदि १।२।३।४।५।६।७।८ आठ अंकोंका घात किया तब चालीस हजार तीनसौ बीस ४०३२० भेद हुए; उनका स्वरूप अति विस्तार होनेके कारण नहीं लिखा, फिर एकादि अंकोंकें घात ४०३२० को दिये हुए अंकोंके योग ४४ से गुणा करा तो १७७४०८० हुए, इस स्थानसंख्या ८ को भाग दिया तो २२१७६० मिले। इनको एक २ स्थान बढाकर आठ स्थानमें लिखकर जोडा तो चौबीस निखर्व, तिरसठ पद्म, निन्यान्नवे करोड, निन्यान्नवे लक्ष, पछत्तर हजार तीनसो साठ २४६३९९९९७५३६० हुए यह उनचालीस हजार तीनसौ बीस भेदोंके अंकोंका योग हुआ॥ उदाहरणम्- पाशांकुशाहिडमरूककपालशूलैः खट्वांगशक्तिशरचापयुतै- र्भवन्ति ॥ अन्योन्यहस्तकलिंतैः कति मूर्तिभेदाः शंभो- र्हरेरिव गदारिसरोजशंखैः ॥ ५१ ॥ अन्वयः-अन्योन्यहस्तकलिंतैः गदारिसरोजशंखैः हरेः इव शम्भोः अन्योन्यहस्तक- लितैः खट्वांगशक्तिशरचापयुतैः पाशांकुशाहिडमरूककपालशूलैः मूर्तिभेदाः कति भवंति ? ॥ ५१ ॥ अर्थः-इस हाथका उस हाथमें पलटनेसे गदा, चक्र, पद्म, शंखसे विष्णुभगवान्‌के भेदोंकी तरह शिवजी महाराजके खट्वांग, शक्ति, बाण, धनु, पाश अंकुश, सर्प, डमरू, कपाल और त्रिशूलको क्रमसे दशों हाथमें धारण करनेसे मूर्तियोंके कितने भेद होंगे? अर्थात् चारों भुजाओंके आयुध क्रमसे बदलनेसे विष्णुभगवान्‌की मूर्तिके कितने भेद होंगे ? और दशों हाथोंके आयुध क्रमसे बदलनेसे दशभुज शिवजी महाराजकी मूर्तिके कितने भेद होंगे ? ॥ ५१ ॥ न्यासः-स्थानानि १० जाता मूर्तिभेदाः शिवस्य ३६२८८०० एवं हरेश्च २४ फैलाव-दशभुज शिवजीकी मूर्तियोंके भेद जाननेके लिये एकादि १।२।३। ४।५।६।७।८।९।१० दश पर्य्यन्त अंकोंका घात किया तो छत्तीस लाख

( २४० ) लीलावती । अठाईस हजार आठसौ ३६२८८०० हुए, यही दशभुज शिवजीकी मूर्तियोंके भेद होंगे. इसीप्रकार विष्णु भगवान्‌की मूर्तियोंके भेद जाननेके लिये एकादि १ । २ । ३ । ४ पर्य्यन्त अंकोंका घात किया तो २४ हुए, यही चतुर्भुज विष्णु भगवान्‌की मूर्तियोंके भेद हुए. विशेषे करणसूत्रं वृत्तम्- दिये हुए अंकोंके भेद जाननेकी विशेष रीति एक श्लोक- यावत्स्थानेषु तुल्यांखास्तद्भेदैस्तु पृथक्कृतैः ॥ प्राग्भेदा विहृता भेदास्तत्संख्यैक्यञ्च पूर्ववत् ॥ ७९ ॥ अन्वयः-यावत्स्थानेषु तुल्यांकारः स्युः तद्भेदैः तु पृथक्कृतैः विहृताः प्राग्भेदाः भेदाः स्युः तत्संख्यैक्यं च पूर्ववत् साध्यम् ॥ ७९ ॥ अर्थः-जितने स्थानोंमें एकसे अंक हों उनके अलग भेद लाकर उसका पहली रीतिसे लाये हुए सब अंकोंके भेदमें भाग दे जो लब्धि हो वही भेदोंकी संख्या होगी और भेदोंकी संख्याओंको योग पहली रीतिसे लावे ॥ ७९ ॥ अतोद्देशकः- इस विषयका उदाहरण- द्विद्व्येकभूपरिमितैः कति संख्यकाः स्युस्तासां युतिश्च गणकाऽऽशु मम प्रचक्ष्व ॥ अम्भोधिकुम्भिशरभूतशरै- स्तथांकैश्चेदंकपाशमिति युक्तिविशारदोऽसि ॥ ५२ ॥ अन्वयः-द्विद्व्येकभूपरिमितैः तथा अम्भोधिकुम्भिशरभूतशरैः अंकैःकतिसंख्यकाः स्युः तासां युतिः च का स्यात् । हे गणक ! चेत् अंकपाशमिति युक्तिविशारदः असि तर्हि मम आशु प्रचक्ष्व ॥ ५२ ॥ अर्थः-दो दो एक एक २ । २ । १ । १ के तथा चार, आठ, पांच, पांच, पांच ४ । ८ । ५ । ५ । ५ के कितने भेद होंगे ? और उनका योग भी क्या होगा ? हे गणक ! यदि अंकपाशके गणितमें चतुर हो तो मुझसे शीघ्र कहो ॥ ५२ ॥ न्यासः-२ । २ । १ । १ अत्र प्राग्वद्भेदाः २४ याव- त्स्थानेषु तुल्यांका इति । अथैवं प्रथमं तावत्स्थानद्वये तुल्यौ प्राग्वत्स्थानद्वयाज्जातौ भेदौ २ । पुनरत्रापि स्थानद्वये तुल्यौ तत्राप्येवं भेदौ २ भेदाभ्यां प्राग्व-

गणितपाशव्यवहारः। (२४१) द्भेदाः २४ भक्ता जाताः ६ तद्यथा २२११ । २१२१ । २११२ । १२१२ । १२२१ । ११२२ पूर्ववत्संख्यैक्यं च ९९९९ फैलाव-२।२।१ । १ इन चारों अंकोंके पहली रीतिसे भेदमिले २४ यहां दो दो स्थानोंमें हैं और एक एक भी दो स्थानोंमें हैं, इसकारण ऊपर कही हुई रीति के अनुसार दो दो स्थानोंके अलग भेद लिये तो २।२ मिले इन ४ का पहले भेदों २४ में भाग दिया तो ६ छ लब्धि यही यहां भेदोंकी संख्या हैं, इससे विशेष और कोई भेद नहीं होता; इन भेदोंकी संख्याका योग जाननेके लिये ऊपर मिले हुए भेदों ६ को दिये हुए अंकों २२११ के योग ६ से गुणा किया तब ३६ हुए, इसमें स्थानसंख्या ४ का भग दिया तो ९ लब्धि हुए; इनको एक एक स्थान बढाकर चार स्थानोंमें लिखकर जोडा तो नौ हजार नौसौ निन्यान्नवे हुए. ९९९९ २ २ १ १ २ १ २ १ २ १ १ २ १ २ १ २ १ २ २ १ १ १ २ २ ९ ९ ९ ९ जो. न्यासः-४।८।५।५।५ अत्रापि पूर्ववद्भेदाः १२० स्थानत्रयोत्थभेदैः ६ भक्ता जाताः २० तद्यथा- ४ ८ ५ ५ ५ | ८ ४ ५ ५ ५ | ५ ४ ८ ५ ५ ५ ८ ४ ५ ५ | ५ ५ ४ ८ ५ | ५ ५ ८ ४ ५ ५ ५ ५ ४ ८ | ५ ५ ५ ८ ४ | ४ ५ ८ ५ ५ ४ ५ ५ ८ ५ | ४ ५ ५ ५ ८ | ८ ५ ४ ५ ५ ८ ५ ५ ४ ५ | ८ ५ ५ ५ ४ | ५ ४ ५ ८ ५ ५ ८ ५ ४ ५ | ५ ५ ४ ५ ८ | ५ ५ ८ ५ ४ ५ ४ ५ ५ ८ | ५ ८ ५ ५ ४ | एवं विंशतिः॥ अथ संख्यैक्यं च १११९९८८॥ १६

( २४२ ) लीलावती। फैलाव-दूसरे उदाहरण ४। ८ । ५ । ५ । ५ । में पहली रीतिसे एक आदि १ । २ । ३ । ४ । ५ पाँच अंकोंका घात १२० हुआ, इस उदाहरणमें तीन स्थान ५ । ५ । ५ तुल्य हैं; इस कारण ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार उन तीनों तुल्य अंकोंके अलग भेद लिये तो ६ मिले इनका पहले सब अंकोंसे मिले हुए भेदों १२० में भाग दिया तो २० बीस लब्धि मिले, यही ऊपरके अंकोंके भेद हुए; उन भेदोंकी संख्याओंका योग ११९९९८८ ॥ अनियतांकैरतुल्यैश्च विभेदे करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्- अनियत और अतुल्य अंकोंके भेद जाननेकी रीति आधा श्लोक- स्थानान्तमेकापचितान्तिमांक- घातः समांकैश्च मितिप्रभेदाः ॥५५॥ अन्वयः-स्थानांतम् एकापचितांतिमांकघातः समांकैः मितिप्रभेदाः स्युः ॥ अर्थः-स्थानान्तपर्य्यन्त अन्तके अंकमें एक एक घटा कर रक्खे हुए अङ्कोंका घात करनेसे दिये हुए अंकोंकी सम संख्याके भेद मिलते हैं ॥ उदाहरणम्- स्थानषट्कस्थितैरंकैरन्योन्यं खेन वर्जितैः ॥ कति संख्याविभेदाः स्युर्यदि वेत्सि निगद्यताम् ॥५३॥ अन्वयः-खेन वर्जितैः स्थानषट्कस्थितैः अंकैः अन्योन्यं संख्याविभेदाः कति स्युः यदि वेत्सि तर्हि निगद्यताम् ॥ अर्थः-शून्यको छोड़कर अर्थात् नौ पर्य्यन्त अंकोंके छ स्थानोंमें परस्पर कितने भेद होंगे ? यदि जानते हो तो कहो ॥ अत्रान्तिमांको नव ९ अत्रान्त्योंको यावत्स्थानमेकापचितः ॥ न्यासः-९।८।७।६।५।४एषां घाते जाताः संख्याभेदाः ६०४८० । फैलाव-यहां अन्तिमसंख्या नौ ९ है; इस अन्तिम अंकको छ स्थानपर्य्यन्त एक एक घटा कर लिखा ९ । ८ । ७ । ६ । ५ । ४ इनका ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार घात किया तो संख्याओंके भेद हुए ६०४८०।

गणितपाशव्यवहारः । (२४३) अन्यत्करणसूत्रं वृत्तद्वयम्- अंकपाशी और रीति २ श्लोक- निरेकमंकैक्यमिदं निरेकस्थानांतमेकापचितं विभक्तम् ॥८०॥ रूपादिभिस्तन्निहतैः समाः स्युः संख्याविभेदा नियतेऽक- योगे ॥ नवान्वितस्थानकसंख्यकाया ऊनेऽकयोगे कथितं तु वेद्यम् ॥ ८१ ॥ संक्षिप्तमुक्तं पृथुताभयेनानान्तोऽस्ति यस्माद्गणितार्णवस्य ॥ऽऽ॥ अन्वयः-अङ्कैक्यं निरेकं कार्यम् इदं निरेकस्थानान्तम् एका पचितं लेख्यम् । ततः रूपादिभिः विभक्तं कार्यम् । तन्निहतैःअंकैः नियते अंकयोगे समाः संख्याविभेदाः स्युः । कथितं तु नवान्वितस्थानसंख्यकाया ऊने अंकयोग वेद्यम् । पृथुताभयेन एतत् संक्षिप्तम् उक्तं यस्मात् गणितार्णवस्य अन्तः न अस्ति ॥'८१ ॥ अर्थः-प्रश्नमें सब स्थानोंके अंकोंका जो योग हो उसमें एक एक घटाता हुआ। जितने स्थानोंमें प्रश्नकर्त्ताने अंक दिये हों; उससे एक स्थान कममें लिखे और उनके नीचे एक आदि अंकोंका हर लगावे, फिर अंशोंका और हरोंका परस्पर घात करके अंशोंके घातमें हरोंका घातका भाग दे जो लब्धि मिले वही दिये हुए नियत अंकोंके भेद होंगे. परन्तु यह रीति वही होगी, जहां नौ और दिये हुए अंकोंके स्थानोंका योग प्रश्नके अंकोंके योगसे बडा होगा.अतिविस्तार होजानेके भयसे यहां संक्षेपसे कहा है क्योंकि, गणितरूपी समुद्रका तो पार ही नहीं है ॥ ८१ ॥ उदाहरणम्- पञ्चस्थानस्थितैरंकैर्यद्ययोगस्त्रयोदश ॥ कतिभेदा भवेत्संख्या यदि वेत्सि निगद्यताम् ॥ अन्वयः-पञ्चस्थानस्थितैः अंकैः यद्यद्योगः त्रयोदश तेषां कतिभेदा संख्या भवेत् यदि वेत्सि तर्हि निगद्यताम् ॥ अर्थः-पांच स्थानोंमें रक्खे हुए जिन जिन अंकोंका योग तेरह होता है, उनके भेदोंकी संख्या कितनी होगी ? यदि जानते हो तो कहो ॥

( २४४ ) लीलावती । अत्राङ्कैक्यं १३ निरेकम् १२ एतन्निरेकस्थानान्तमे- कापचितमेकादिभिश्च भक्तं जातम् १२/१ ११/२ १०/३ ९/४ एषां घातसमा जाताः संख्याभेदाः ४९५ इति श्रीलीलावत्यामंकपाशः समाप्तः । फैलाव-यहां दिये हुए अंकोंका योग १३ है, इसमें ऊपर कही हुई रीतिके अनु- सार एक घटाया तो १२ रहे, इनमें एक एक घटाया तथा ऊपर कहे हुए स्थानोंसे एक कम स्थानमें अर्थात् चारस्थानोंमें रक्खा १२ । ११ । १० । ९-फिर इनके नीचे एक आदि हर लगाये १२/१ ११/२ १०/३ ९/४ इनके अंश और हरोंका घात किया तो ११८८०/२४ हुए यहां अंश ११८८० में हर २४ का भाग दिया तब ४९५ लब्ध हुए; यही ऊपर दिये हुए उन पाँचों स्थानोंके अङ्कोंके भेदोंकी संख्या है. जिनका योग तेरह था. इस रीतिमें जो ऊपर नियम कहा है, वह भी यहाँ है, क्योंकि नौ और स्थानसंख्या ५ का योग १४ हुआ; इससे प्रश्नमें दिये हुए अङ्कोंका योग कम हैं. इति अङ्कपाशः । न गुणो न हरो न कृतिर्न घनः पृष्टस्तथापि दुष्टानाम् ॥ गर्वितगणकबहूनां स्यात्पातोऽवश्यमंकपाशेऽस्मिन् ॥ ८२ ॥ अन्वयः-अस्मिन् अंकपाशे गुणः न हरः न कृतिः न घनः न तथापि दुष्टानां गर्वि- तगणकबहूनां यदा पृष्टः तदा एव अवश्यं पातः स्यात् ॥ ८२ ॥ अर्थः-इस अंकपाशमें गुणा नहीं है, भाग नहीं है, वर्ग नहीं है, घन नहीं है, तो भी इस अंकपाशमें दुष्टात्मा घमण्ड करनेवाले गणकोंका प्रश्न करनेके समय ही अवश्य पात होगा ॥ ८२ ॥ येषां सुजातिगुणवर्गविभूषिताङ्गी शुद्धाखिलव्यवहतिः खलु कण्ठसक्ता ॥ लीलावतीह सरसोक्तिमुदाहरन्ती तेषां सदैव सुखसम्पदुपैति वृद्धिम् ॥ ८३ ॥ अन्वयः-इह खलु सुजातिगुणवर्गविभूषिताङ्गी शुद्धाखिलव्यवहतिः सरसोक्तिम् उदाहरंती लीलावती येषां कण्ठसक्ता तेषां सुखसम्पत् सदा एव वृद्धिम्उपैति ८३॥ अर्थः-इस संसारमें निश्चयकरके अनेक प्रकारके गुणोंकी रीति वर्गकी रीतिसे शोभायमान स्पष्ट हैं सम्पूर्ण गणितकी रीतियें जिसमें सुन्दर रसयुक्त है उदा- हरण जिसमें ऐसी यह लीलावती ( ग्रन्थ ) जिनके कण्ठस्थ होती है, उनकी सुखसम्पत्ति वृद्धिको प्राप्त होती है; दूसरा अर्थ-इस असार संसारमें निश्चयकरके

ग्रन्थव्यवहारः । ( २४५ ) सुन्दर जाति और चातुर्य्यादिगुणोंके समूहसे शोभायमान अंगवाली सम्पूर्ण व्यव- हारोंको शुद्धरीतिसे करनेवाली सुन्दर रसीले वचनोंको बोलनेवाली “लीलावती” जिनके कंठमें आलिंगन करती है उनको असीम सुखकी प्राप्ति होती है ॥ ८३ ॥ क्षेपकम् । अष्टौ व्याकरणानि षट् च भिषजां व्याचष्ट ताः संहिताः षट् तर्कांन्गणितानि पंच चतुरो वेदानधीते स्म यः ॥ रत्नानां त्रितयं द्वयं च बुबुधे मीमांसयोरन्तरं सद्ब्रह्मैकमगाधबोधमहिमा सोऽस्याः कविर्भास्करः ॥ १ ॥ इति श्रीभा० वि० सि० शि० लीलावतीसंज्ञः प्रथमः पाट्यध्यायः ॥ इति श्रीभास्कराचार्य्यविरचितसिद्धान्तशिरोमण्यन्तर्गतलीलावतीसंज्ञपाट्यध्यायस्य स्वरूप- प्रकाशिकानाम्नी काशीस्थराजकीयसंस्कृतविद्यालया (कॉलेज) दधीतन्यायादिशा- स्त्रेण रुहेलखण्डान्तर्गतयवनाधिष्ठितरामपुरपुरीवास्तव्येनाद्यश्वो मुरादाबादें कृतवस- तिना गौडवंशावतंसश्रीयुतपण्डितभोलानाथतनयेन पंडितरामस्वरूपशर्म्मणा विरचिता भाषाटीका समाप्तिमगमत् ॥ समाप्तोऽयं ग्रन्थः ।

जाहिरा । क्रयपुस्तकें (ज्योतिषग्रंथाः) । नाम, की. रु. आ. कररेखासंख्यावली-भाषा छन्दबद्ध सुगम सामुद्रिक है. ०-४ कृषिकौमुदी-कृषिकारों तथा जमीदारोंको अवश्य देखना चाहिये. ... ... ०-१२ कृषिविद्या-दूसरा भाग. ... ... ०-५ कृषिविद्या-तीसरा भाग. ... ... ०-८ केरलीयजातक-भाषाछन्दबद्ध (केरलमतसे ग्रहोंका द्वादश स्थानगतभावफल) ... ... ०-५ ज्योतिषकल्पद्रुम-भाषा । श्रीमहाराज शंभूसिंहजी सुठा- लियाधीशकृत। इस ग्रन्थमें चोरी, रोगउत्पत्ति, भोजन मृत्यु, स्वप्न, विवाह, शकुन और नयागमयात्रा तथा वृद्धि इत्यादि सबही प्रकरण आगये हैं.ज्योतिषियोंको अव- श्य संग्रह करना चाहिये. ... ... २-० ज्योतिषकी लावनी-भावफल सुगम बतलाया है. ... ०--१ मानसप्रश्नदीपिका-तात्कालिक मनचिंतित प्रश्नविद्या. ०-४ मेघमालाभङ्गुली-वर्षादिकाविचार भलीप्रकार लिखागया है ०-६ रमलगुलजार-भाषामें-इसमें-भाग्योदय, सुख-दुःख,द्रव्य- प्राप्ति, मातापिताका अज्ञातद्रव्यप्राप्ति, तथा कन्या- पुत्रादिके अनेक उत्तम १०४१ प्रश्न वर्णित हैं. ... ३-० रमलसारप्रश्नावली-भाषा। इस ग्रन्थमें पांसा तीन दफे फेकके अंक जोड प्रश्न कहनेका प्रकार है .... ०-१॥ रत्नपरीक्षा भाषा-रत्नोंकी परीक्षाका यह छोटासा पुस्तक उत्तम है ... ... ... ०-४ रमलभास्कर-प्रश्नग्रन्थ. ... ... ०-८ रमलमार्त्तण्ड- ... ... ... ०-६