लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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१०४ इदं प्रथमच्छायाग्रदीप्तलयोरन्तरमित्यर्थः । एवं द्वितीयाग्रान्तरभूमानम् १५६ भूशंकुघातः प्रभया विभक्त इति जातमुभयतोऽपि दीपोच्चं सममेव हस्ताः ६ ३/८ ॥ फैलाव-अब यहां दीपकसे शंकुओंका अन्तर और दीपककी उँचाई जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार क्रिया करनेके अर्थ पहली छायाके अग्रभागसे दूसरी छायाके अग्रभागका अन्तर लिया तो ५२ बावन अंगुल मिले, इससे दोनों छायाओं ८। १२ को गुणा किया तो ४१६। ६२४ हुए; इनमें छायाओं ८ । १२ के अंतर ४ का भाग दिया तब १०४। १५६ मिले, यह अपनी अपनी छायाके अग्र- भागसे दीपकके तलेतककी भूमिका प्रमाण हुआ,परन्तु यह अंगुलात्मक है इसमें २४ का भाग दिया तब हस्तात्मक प्रमाण मिला १३/३ । १३/२ ॥ फिर अपनी अपनी छायाके अग्रभाग- पर्यन्तकी भूमि १३/३ १३/२ से अपने अपने शंकुको गुणा
करा तब १३/६ । १३/४ मिले, इनमें अपनी अपनी छाया १/३ । १/२ का भाग दिया तब १३/२ । १३/२ मिले; यही दीपककी उँचाई है, दोनों भूमियोंसे तुल्य ही मिली ॥ एवमित्यत्र छायाव्यवहारे त्रैराशिककल्पनयानयनं वर्तते । तद्यथा-प्रथमच्छाया ८ तो द्वितीयच्छाया १२ यावता- धिका तावता छायावयवेन यदि छायाग्रान्तरतुल्या भूर्ल- भ्यते तदा छायया किं किमिति एवं पृथक्पृथक् छायाप्र- दीपांतरप्रमाणं लभ्यते । ततो द्वितीयं त्रैराशिकम् । यदि छायातुल्ये भुजे शंकुः कोटिस्तदा भूतुल्ये भुजे किमिति लब्धं दीपकोच्चमुभयतोऽपि तुल्यमेव । एवं पंचराशिका- दिकमखिलं त्रैराशिककल्पनयैव सिद्धम् ॥ यथा भग- वता श्रीनारायणेन जननमरणक्लेशाऽपहारिणा निखिल-