लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(२२२) लीलावती। अर्थ:-हे गणक ! दोसौ इक्कीसको जिसकिसी अंकसे गुननेपर फिर गुणित अंकोंमें ६५ मिलानेसे फिर १९५ का भाग देनेसे निःशेष हो जाता है तो कहो कि, वह कौनसा अङ्क है जिसमें २२१ को गुणा करा था ॥ ४४ ॥ न्यासः-भाज्यः २२१ हारः १९५ क्षेपः ६५ अत्र परस्परभाजितयोर्भाज्यभाजकयोः शेषम् १३ अनेन भाज्यहारक्षेपाः अपवर्तिता जाताः भाज्यः १७ हारः १५ क्षेपः ५ अनयोर्दृढभाज्यहारयोः परस्पर- भक्तयोर्लब्धान्यधोऽधस्तदधः क्षेपः तदधः शून्यं निवे- श्यमिति न्यस्ते जाता वल्ली [ १ / ७ / ५ / ० ] उपान्तिमेन स्वोर्ध्वे हते इत्यादिकरणेन जातं राशिद्वयम् ४० / ३५ एतौ दृढभाज्यहाराभ्यां १७ / १५ तष्टौ लब्धिगुणौ जातौ ६।५ इष्टाहतस्वस्वहरेण युक्ते इति वक्ष्यमाणविधिनैताविष्टगु- णितस्वतक्षणयुक्तौ वा लब्धिगुणौ २३ । २० द्विकेनेष्टेन वा ४० । ३५ इत्यादि ॥ अर्थ:-ऊपर कही हुई अपवर्तन अङ्क जाननेकी रीति के अनुसार भाज्य २२१ में भाजक १९५ का भाग दिया तब १३ शेष रहे यही यहाँ अपवर्तन अंक है इस १३ का भाज्य २२१ हार १९५ और क्षेप ६५में भाग दिया तब निःशेष हो जाता है, इस कारण यह प्रश्न भी शुद्ध है. इसका भाज्य २२१ हार १९५ क्षेप ६५ में अपवर्तन दिया तब दृढसंज्ञक हुए भाज्य १७ हर १५ क्षेप ५ इन दृढभाज्य हरमें परस्पर भाग दिया तब १५ ) १७ ( १ जो लब्धि मिली २ ) १५ ( ७ उनको नीचे लिखा १५ / २ फिर उसके नीचे दृढ १४ / १ क्षेप ५ को लिखा | १ | ७ | ५ | ० | फिर उसके नीचे शून्यलिखा तब वल्ली हुई इस वल्लीमें उपान्त्य अर्थात् अन्तके समीपके अंक ५ से उसके ऊपरके अंक ७ का गुणा करा तो पैंतीस ३५ हुए इसमें अंतके अंकको जोडा तब ३५ हुए फिर अन्तके अंक ० को मेट डाला तो ३५ / ५ इस प्रकार वल्ली हुई. अब फिर उसी प्रकार उपान्त्यके अङ्क ३५ को अपने ऊपरके अङ्क १ से गुणा करा तब ३५ हुए, इसमें अन्तके अङ्क ५ को जोडा तब ४० हुए फिर अन्तके अंकको मेट डाला तब ४० / ३५ इस प्रकार