लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराशिव्यवहारः । (२०९) अर्थः--हे मित्र ! जो ढेर नाजका दीवारसे लगा हुआ पडा है उसका परिधिका प्रमाण ३० तीस हाथ है, जो अन्नका ढेर दीवारके भीतर कोनेमें लगा हुआ पडा है उसकी परिधिका प्रमाण १५ हाथ है और जो अन्नका ढेर दीवारके बाहर कोनेसे लगा हुआ पडा है उसकी परिधिका प्रमाण ४५ पैंतालीस हाथ है, तो उन अन्नके ढेरोंका घनहस्तफल मुझसे अलग अलग शीघ्र कहो ॥ ३९ ॥ ४० ॥ अत्रापि स्थूलादिधान्यानां राशिमानावबोधनाय स्पष्टं क्षेत्रत्रयम्- यहाँ भी स्थूल सूक्ष्म और शूकधान्य इन तीनोंके ढेरोंका अलग २ प्रमाण जाननेके लिये तीन क्षेत्र दिखाये हैं- तत्रादावणुधान्यराशिमानावबोधकं क्षेत्रमाह- न्यासः-- अत्राद्यस्य परिधिः ३० द्विनिघ्नः ६० अन्यश्चतुर्घ्नः ६० अपरः ४५ सत्रिभागैक ४/३ निघ्नः ६० एषां वेधः ६ एभ्यः फलं तुल्य- मेतावन्त्यः खार्य्यः ६०० एतत्स्व- [चित्र १: अनणुधान्यराशिः | बहिःकोणरा०, वेधः ६, परि ४५ | परिधिः ३०, भित्तिलग्नराशि., वेधः ६ | परिधि. १५, वेधः ६, अन्तःकोणराशिः] स्वगुणेन भक्तं जातं पृथक्पृथक् फलम् ३०० । १५० । ४५० अथाणुधान्यराशिमानानयनाय क्षेत्रम्- पूर्ववत्क्षेत्रत्रयाणां स्वगुण- [चित्र २: अणुधान्यराशिः | बहिःकोणराशिः, परिधिः ४५, वेधः ६३०/११ | परिधिः ३०, भित्तिलग्नरा० वेधः ७१/२ | परिधि १५, अंतःकोणरा०, वेधः १३१/२] गणितः परिधिः ६० वेधः ६३०/११ फलानि २७२८/११, १३६ ४/११ ४०९ १/११ ॥ १४