लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २१४ ) लीलावती । अर्थ:-दीपकके तलेके और शंकुके तलेके मध्यकी भूमिके प्रमाणसे शंकुको गुणा करे, जो गुणन फल हो, उसमें शंकु और दीपककी शिखाकी उँचाईके अंतरका भाग दे जो लब्धि मिले वह शंकुकी छायाका प्रमाण होगा ॥ ९९ ॥ उदाहरणम्- शंकुप्रदीपांतरभूस्त्रिहस्ता दीपोच्छ्रितिः सार्द्धकरत्रया चेत् ॥ शंकोस्तदार्कांगुलसम्मितस्य तस्य प्रभा स्यात्कियती वदाशु ४२ ॥ अन्वयः-चेत् शंकुप्रदीपान्तरभूमिः त्रिहस्ता दीपोच्छ्रितिः च सार्द्धकरत्रया तदा अर्कांगुलसाम्मितस्य तस्य शंकोः कियती प्रभा स्यात् इति आशु वद ॥ ४२ ॥ अर्थः-यदि शंकुके और दीपके मध्यकी भूमिका प्रमाण तीन हाथ है और दीपककी उँचाई साढ़ेतीन ७/२ हाथ है तो बारह अंगुलके शंकुकी कितनी छाया होगी ? यह शीघ्र कहो ॥ ४२ ॥ न्यासः-शंकुः १/२ प्रदीपशंकुतलांतरम् ३ अन- योर्घातः ३/२ विनरदीपशिखौच्येन ३ भक्तो लब्धानि छायांगुलानि ॥ १२ ॥ फैलाव- यहां छायाका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार शंकु १/२ को शंकुतल और दीपतलके मध्यकी भूमि ३ से गुणा किया तब ३/२ हुए; इसमें शंकु १/२ और दीपककी उँचाई ७/२ के अंतर ३का भाग दिया तब १/२ मिले यही छायाका प्रमाण है. अथ दीपोच्छ्रित्यानयनाय करणसूत्रं वृत्तार्- र्द्धम्- दीपककी उँचाईका प्रमाण जाननेकी रीति आधा श्लोकमें लिखते हैं- छायाहते तु नरदीप्तलांतरघ्ने शङ्कौ भवेन्नरयुते खलु दीपकोच्च्यम् ॥ ६१ ॥ अन्वयः-खलु शंकौ नरदीप्तलांतरघ्ने छायाहते नरयुते च दीपकोच्च्यं भवत् ॥ ६१ ॥