लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछायाव्यवहारः । ( २१३ ) न्यासः-छायान्तरं १९ कर्णा- न्तरम् १३ अनयोर्वर्गान्त- रेण १९२ भक्ता रसाद्रीषवः ५७६ लब्धं ३ सैकस्या ४ स्य मूलम् २ अनेन कर्णान्तरं गुणितम् २६ द्विःस्थं २६ छायान्तरेण १९ ऊनयुते ७ । ४५ तदर्द्धे लब्धे छाये ७/२ ४५/२ तत्कृत्योर्योगपदमित्यादिना जातौ कर्णौ २५/२ ५१/२ फैलाव-छायाओं और कर्णोंका अन्तर जानकर छायाओंका और कर्णोंका प्रमाण जानना है; तहां पहले छायाओंका प्रमाण जाननेके लिये ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार छायाओंके अन्तर १९ का वर्ग किया तब ३६१ हुए और कर्णोंके अन्तर १३ का वर्ग किया तब १६९ हुए; इन दोनों ३६१ । १६९ का अन्तर किया तो १९२ हुए, इसका पांचसौ छियत्तर ५७६ में भाग दिया तब ३ लब्धि हुए, इसमें १ एक जोडा तब ४ चार हुए, इसका मूल लिया तब २ मिले, इससे कर्णान्तर १३ को गुणा करा तब २६ हुए, इसको दो स्थानोंमें २६ । २६ लिखा एक स्थान छायांतर १९ को घटाया तो ७ सात शेष रहे, फिर दूसरे स्थानमें छायांतर १९ को जोडा तब ४५ हुए, इन दोनोंको आधा करा तब ७/२ ४५/२ हुए, यही दोनों छायाओंका प्रमाण है, फिर छाया और शंकुसे “तत्कृत्योर्योगपदम्” इस पहले कही हुई रीतिके अनुसार कर्णोंका प्रमाण २५/२ ५१/२ मिला ॥ छायांतरे करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्- छाया जाननेकी दूसरी रीति आधा श्लोक- शंकुः प्रदीपतलशंकुतलान्तरघ्न- श्चाया भवेद्विनरदीपशिखौच्यभक्तः ॥ऽऽ॥ अन्वयः-प्रदीपतलशंकुतलांतरघ्नः शंकुः विनिरदीपशिखौच्यभक्तः कार्य्यः तदा छाया भवेत् ॥ ऽ ऽ ॥