भारतकोश
लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished268 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 268 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 28

( १२ ) लीलावती । अथ भागहारः । ( भाग लेनेकी रीति. ) ( क ) जिसमें भाग दिया जाता है वह भाज्य कहा जाता है और जिसका भाग दिया जाता है वह भाजक कहाता है ॥ भागहारे करणसूत्रं वृत्तम्- भाग लेनेकी रीति के विषयमें एक श्लो०- ( सू० ७ ) भाज्याद्धरः शुद्ध्यति यद्गुणः स्यादंत्यात्फलं तत्खलु भागहारे ॥ अन्वयः-अन्त्यात् भाज्यात् हरः यद्गुणः शुद्ध्यति खलु भागहारे तत् फलं स्यात् ॥ अर्थः-भाज्यके अन्तके अङ्कसे लेकर भाजक जितना गुणा ( दफा ) भाज्यमें बँट सकेगा निश्चय करके भाग लेनेमें वही फल होगा । अत्र पूर्वोदाहरणे गणिताङ्कानां स्वगुणच्छेदानां भाग- हारार्थं न्यासः-भाज्यः १६२० । भाजकः १२ । भजनाल्लब्धो गुण्यः १३५ ॥ फैलाव-पहले गुणाके उदाहरणमें गुणा भाजक भाज्य फल किये हुए अंकोंमें भाग लेनेके वास्ते उसी १२ ) १६२० ( ०१३५ उदाहरणमें भागका फैलाव दिखलाते हैं भाज्य १६२० १२ एक हजार छ सौ बीस है और भाजक १२ बारह है ४२ ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार अन्तके अङ्क १ एकमें ३६ बारहका भाग लेनेसे कोई अङ्क लब्ध नहीं हुआ किन्तु ०६० शून्य लब्धि हुआ; उसको भाज्यके दहिने भागमें लिखा ६० फिर १६ सोलहमें भाग लिया तब एक लब्धि हुआ ०० और ४ चार शेष रहा. लब्धि एकको ० शून्यके दाहिनी तरफ स्थापित किया और ४ चारके ऊपर २ दोका अङ्क आगया तब बयालीस हुआ; उसमें तिन दफा भाजक का भागलगा तब ४२ बयालीसमें त्रिगुणित भाजक ३६ छत्तीसको घटाया तब छ शेष रहा लब्धि तीनको पहली लब्धिके अंकोंके दाहिने भागमें स्थापित किया और शेष ६ पर शून्य ० आगया तब ६० साठ हुए; उसमें ५ दफा भाजकका भाग लगा; तब ६० में पंच गुणित भाजक ६० साठको घटाया तब निःशेष होगया; लब्धि ५ पांचको पहली लब्धिके दाहिने भागमें स्थापित किया तब सब लब्धि १३५ एकसौ पैंतीस हुआ.

लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक) · पृष्ठ 28, कुल 268 में से · BharatKosha