लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभागहारः। ( १३ ) प्रकारान्तरम्–दूसरी रीति- ( सूत्र ८) समेन केनाप्यपवर्त्य हारभाज्यौ भवेद्वा सति सम्भवे तु ॥ ७ ॥ अन्वयः-अथवा सति सम्भवे हारभाज्यौ केन अपि समेन अङ्केन अपवर्त्य फलम् भवेत् ॥ ७ ॥ अर्थः-अथवा हो सके तो भाज्य और भाजक दोनोंमें किसी सम अंकका भाग देकर परिवर्तन कर लेय; फिर भाज्यकी लब्धिमें भाजककी लब्धिका भाग देनेसे जो लब्धि प्राप्त होती है वह फल होता है ॥ ७ ॥ अथवा भाज्यहारौ त्रिभिरपवर्तितौ ५४०/४ चतुर्भिर्वा ४०५/३ स्वस्वहारेण हृते फलं तदेव १३५ ॥ फैलाव-अथवा ऊपर कही हुई रीतिके ३) १६२० (५४० ३ ) १२ ( ४ अनुसार भाज्य और भाजक दोनोंमें १५ | ४ ) ५४० ( १३५ | १२ तीनका भाग दिया अर्थात् भाज्य १६२० १२ | ४ | ०० में तीनका भाग दिया तो ५४० पांचसौ १२ | १४ | चालीस लब्धि हुआ; और भाजक १२ में ०० | १२ | तीनका भाग दिया तो ४ चारं लब्धि हुआ; | ०२० | तदनन्तर भाज्यकी लब्धि ५४० में भाज- | २० | | ०० | ककी लब्धि ४ का भाग दिया तब वही १३५ एकसौ पैंतीस लब्धि हुआ सोई फल है ॥ ४ ) १६२० ( ४०५ | ४ ) १२ ( ३ | ३ ) ४०५ ( १३५ | अथवा भाज्य १६ | १२ | ३ | १६२० में ४ का ००२० | ०० | १० | भाग दिया तब २० | | ९ | ४०५ लब्धि हुआ ०० | | ०१५ | और भाजक १२ | | १५ | में ४ का भाग दिया | | ०० | तब ३ लब्धि हुआ तदनन्तर भाज्यकी लब्धि ४०५ में भाजककी लब्धि ३ का भाग लिया तब १३५ लब्धि हुआ वही फल है.