लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
भागहारः। ( १३ ) प्रकारान्तरम्–दूसरी रीति- ( सूत्र ८) समेन केनाप्यपवर्त्य हारभाज्यौ भवेद्वा सति सम्भवे तु ॥ ७ ॥ अन्वयः-अथवा सति सम्भवे हारभाज्यौ केन अपि समेन अङ्केन अपवर्त्य फलम् भवेत् ॥ ७ ॥ अर्थः-अथवा हो सके तो भाज्य और भाजक दोनोंमें किसी सम अंकका भाग देकर परिवर्तन कर लेय; फिर भाज्यकी लब्धिमें भाजककी लब्धिका भाग देनेसे जो लब्धि प्राप्त होती है वह फल होता है ॥ ७ ॥ अथवा भाज्यहारौ त्रिभिरपवर्तितौ ५४०/४ चतुर्भिर्वा ४०५/३ स्वस्वहारेण हृते फलं तदेव १३५ ॥ फैलाव-अथवा ऊपर कही हुई रीतिके ३) १६२० (५४० ३ ) १२ ( ४ अनुसार भाज्य और भाजक दोनोंमें १५ | ४ ) ५४० ( १३५ | १२ तीनका भाग दिया अर्थात् भाज्य १६२० १२ | ४ | ०० में तीनका भाग दिया तो ५४० पांचसौ १२ | १४ | चालीस लब्धि हुआ; और भाजक १२ में ०० | १२ | तीनका भाग दिया तो ४ चारं लब्धि हुआ; | ०२० | तदनन्तर भाज्यकी लब्धि ५४० में भाज- | २० | | ०० | ककी लब्धि ४ का भाग दिया तब वही १३५ एकसौ पैंतीस लब्धि हुआ सोई फल है ॥ ४ ) १६२० ( ४०५ | ४ ) १२ ( ३ | ३ ) ४०५ ( १३५ | अथवा भाज्य १६ | १२ | ३ | १६२० में ४ का ००२० | ०० | १० | भाग दिया तब २० | | ९ | ४०५ लब्धि हुआ ०० | | ०१५ | और भाजक १२ | | १५ | में ४ का भाग दिया | | ०० | तब ३ लब्धि हुआ तदनन्तर भाज्यकी लब्धि ४०५ में भाजककी लब्धि ३ का भाग लिया तब १३५ लब्धि हुआ वही फल है.
( १४ ) लीलावती। अथ वर्गे करणसूत्रं वृत्तद्वयम्- अब वर्ग करनेकी रीति दो श्लोकोंमें कहते हैं- ( सूत्रं ९ ) समद्विघातः कृतिरुच्यते- अन्वयः-समद्विघातः कृतिः उच्यते। अर्थः-समान दो अंकोंका परस्पर गुणा करनेसे जो फल होता है वह वर्ग कहाता है ॥ ( सू० १० ) अथ स्थाप्योऽन्त्यवर्गो द्विगुणान्त्यनिघ्नाः॥स्वस्वोप- रिष्टाच्च तथा परेऽङ्कास्त्यक्त्वाऽन्त्यमुत्सार्य्यपुनश्च राशिम् ॥ ८ ॥ अन्वयः-अथ अन्त्यवर्गः स्थाप्यः तथा परे अङ्काः द्विगुणान्त्यनिघ्नाः स्वस्वोपरिष्टात् स्थाप्याः। पुनः अन्त्यं त्यक्त्वा राशिम् उत्सार्य्य अन्त्यवर्गः स्थाप्यः निःशेषान्तम् एवमेव कुर्यात्। अर्थः-(यदि ज्यादा अङ्क हों तो) अन्तके अङ्कका वर्ग करके उन्ही अन्तके अंकोंके ऊपर रख देय. और बाकीके अंकोंको द्विगुणित अन्तके अङ्कसे गुणा करके अपने अपने अङ्कके ऊपर रख देय. फिर अन्त्यके अंकको मेट दे और शेष राशि- को हटाकर फिर पूर्वोक्त रीतिसे अन्त्यवर्ग इत्यादि कार्य्य करे. इसी प्रकार जबतक अङ्क निःशेष हों तबतक पूर्वोक्त रीतिसे कार्य्य करें तदनन्तर सब अंकोंको एक २ स्थान बढाकर रक्खे और जोड देय तब फल प्राप्त होता है ॥ ८ ॥ अत्रोद्देशकः-वर्गके विषयमें उदाहरण- सखे नवानां च चतुर्दशानां ब्रूहि त्रिहीनस्य शतत्रयस्य ॥ पंचोत्तरस्याप्ययुतस्य वर्गं जानासि चेद्वर्गविधानमार्गम् ॥३॥ अन्वयः-हे सखे ! चेत् वर्गविधानमार्गं जानासि तर्हि नवानाम्। चतुर्दशानाम्। त्रिहीनस्य शतत्रयस्य। पञ्चोत्तरस्य अयुतस्य वर्गम् अपि ब्रूहि ॥ ३ ॥ अर्थः-हे प्रिये ! लीलावति ! यदि वर्ग करनेकी रीति जानती हो तो ९ नौ, १४ चौदह, २९७ दोसौ सतानवे, १०००५ दशहजार पाँच इसका अलग अलग वर्ग कहो ॥ ३ ॥ न्यासः-९ । १४ । २९७ । १०००५ एषां यथोक्तकरणेन जाता वर्गाः ८१ । १९६ ॥ ८८२०९ । १००१०००२५ फैलाव-(क) पूर्वोक्त रीतिके अनुसार ९ नौके समान अङ्क नौसे ही गुणा किया तब वर्ग हो गया.
भागप्रहारः । ( १५ )
( ख ) (सूत्र १०) के अनुसार १४ चौदहका वर्ग किया अर्थात् | ९ अन्तके अंक १ एकका वर्ग करके उसी अंकके ऊपर रख दिया और | ९ अन्तके उसी १ एक अंकको द्विगुणा करके उससे अन्य अंक ४ को | ८ १ गुणा किया तब आठ ८ हुआ; उसको ४ चारके ऊपर रक्खा तब १८ | १८ हुआ; उनको एक स्थानमें अलग रक्खा फिर १४ में अन्तके अंक १ | १४ एकको मेट दिया तब ४ चार रह गये फिर उसी रीतिसे ४ चारका वर्ग | १६ किया तब सोलह १६ हुआ उसको ४ चारके ऊपर रक्खा; फिर कोई | ४ अंक शेष न रहा तब १६ सोलहको पहले रक्खी हुई राशिके नीचे एक | १८ स्थान बढाकर रक्खा और जोड दे दिया तब १४ चौदहका वर्ग होगया. | १६ | १९६ फ०
( ग ) ( सूत्र ० ) के अनुसार २९७ का वर्ग किया अर्थात् | ४ अन्तके अंक २ दोका वर्ग करके उसके ऊपर रक्खा और उसी | ३८८|७८८ अन्तके २ के अंकको द्विगुणा किया तब ४ चार हुए इस चारसे | २९७|२९७ शेष अङ्कोंको गुणा करके अपने दो २ के ऊपर गुणन फल रख | १२६९३६ दिया फिर ऊपरके सब अंकोंको जोडकर एकस्थानमें रख | ८- | ९७ दिया और मूलराशिके अन्तके अंक २ दोको मेट कर शेष | ९७ ९७ सप्तानवेमें फिर पूर्वोक्त क्रिया करी अर्थात् अन्तके अंक ९ | ४९ नौका वर्ग करके उसीके ऊपर रख दिया फिर उसी अन्तके अंक ९ | ७ नौको द्विगुणित कर शेष अंकोंको गुणा कर दिया और गुणनफल | ७८८ | ७८८ अपने २ दो अंकके ऊपर रख दिया; फिरके सब अंकोंको जोड | ९३६ | ९३६ कर पहले अलग रक्खे हुए अंकोंको नीचे एक स्थान बढाकर रख | ४९ | ४९ | ८८२०९ फल. दिया और मूलराशिके अन्तके अंक ९ नौको मेट दिया और फिर पूर्वोक्त क्रिया करी अर्थात् अन्तके अंक ७ सातका वर्ग करके उसीके ऊपर रख दिया तब कोई अंक शेष नहीं रहा कि जिसमें आगेको क्रिया की जाय इस कारण ७ सातके ऊपर के अंकोंको पहले स्थापित किये हुए अंकोंके नीचे एक स्थान बढाकर रक्खा और सब अंकोंको जोड दिया तब वर्गफल ८८२०९ होता है ॥
( घ ) पूर्वोक्त रीतिके अनुसार १०००५ का | सबका जोड. वर्ग १००१०००२५ होता है ॥ फैलाव- | १००१० | ०००० १००१० | ०००० | ००० | ०० | २५ | ००० | ०० १०००५ | ०००५ | ००५ | ०५ | ५ | २५ | १००१०००२५ व, फ.
( १६ ) लीलावती । वर्ग करनेकी तीसरी रीति. यह विधि दो अंकके वर्गमें सरल पडती है ॥ ( सू० १३) खण्डद्वयस्याभिहतिर्द्विनिघ्नी तत्खण्डवर्गैक्ययुता कृतिर्वा ॥ अन्वयः-वा खण्डद्वयस्याभिहतिः द्विनिघ्नी तत्खण्डवर्गैक्ययुता कृतिः स्यात् ॥ अर्थः-अथवा जिस अंकका वर्ग करना हो उसके दो खंड करके उनको परस्पर गुणा करके द्विगुणा करे फिर उन दोनों खण्डोंका अलग २ वर्ग करके पहले द्विगु- णित अंकमें जोड देनेसे वर्गफल प्राप्त होता है ॥ उदाहरण.- (क) उपरोक्त रीति के अनुसार
| मूलराशि | दोखण्ड | परस्पर गुणा | द्विगुणा | दोनोंका वर्ग | जोड |
|---|---|---|---|---|---|
| ९ | ५।४ | ५ <br> ४ <br> --- <br> २० | २० <br> २ <br> --- <br> ४० | ५ ४ <br> ५ ४ <br> --- --- <br> २५ १६ | ४० <br> २५ <br> १६ |
| ९ के पाँच, चार ५।४ ऐसे दोखंड किये. | |||||
| वर्गफल ८१ | |||||
| फिर पाँच ५ और चार ४ को परस्पर गुणा किया तब बीस २० हुए. उनको द्विगुणा | |||||
| किया तो ४० चालीस हुए. फिर दोनों खंडोंका अलग २ वर्ग किया. अर्थात् ५ का | |||||
| वर्ग किया तब २५ पचीस हुए और ४ का वर्ग किया तब १६ सोलह हुए. | |||||
| इनको ४० चालीसमें जोड दिया तब ८१ हुए. यही ९ नौका वर्ग फल है ॥ | |||||
| ( ख ) अथवा १४ चौदहके ६ । ८ छ और आठ दो खंड किये. | |||||
| तदनन्तर ६ और ८ दोनों खंडोंको परस्पर गुणा किया तब ४८ अडतालीस हुए, | |||||
| उनको द्विगुणा किया तब ९६ छियानवे हुए फिर दोनों खंडोंका अलग अलग वर्ग | |||||
| किया अर्थात् ६ का वर्ग किया तो ३६ छत्तीस हुए और ८ आठका वर्ग किया | |||||
| तो ६४ चौंसठ हुए इन दोनों वर्ग-फलोंको ९६ में जोड दिया तब १९६ एकसौ | |||||
| छियानवे हुए यही वर्गफल हुआ । | |||||
| मूलराशि. | दोखंड. | परस्परगुणा. | द्विगुणा | दोनों खंडका वर्ग | जोड |
| :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- |
| १४ | ६।८ | ६ <br> ८ <br> --- <br> ४८ | ४८ <br> २ <br> --- <br> ९६ | ६ ८ <br> ६ ८ <br> --- --- <br> ३६ ६४ | ९६ <br> ३६ <br> ६४ |
| वर्गफल १९६ |
वर्गकरणप्रकारः। ( १७ ) अथवा खण्डे ४ । १० तथापि सैव कृतिः । अथवा १४ चौदह मूल राशिके ४ । १० चार और दश दो खंड करने पर भी पूर्वोक्त रीतिके अनुसार १९६ एकसौ छियानवे ही वर्गफल होता है ॥ मूलराशिः | दो खंड. | परस्परगुणा | द्विगुणा | दोनों खंडोंका वर्ग | जोड. १४ | | ४ | ४० | ४ १० | ८० | | १० | २ | ४ १० | १६ | | ४० | ८० | १६ १०० | १०० | | | | वर्गफल. | १९६ वर्ग करनेका चौथा प्रकार. इष्टोनयुग्राशिवधः कृतिः स्यादिष्टस्य वर्गेण समन्वितो वा॥ ९॥ अन्वयः- वा इष्टोनयुग्राशिवधः इष्टस्य वर्गेण समन्वितः कृतिः स्यात् ॥ ९ ॥ अर्थ-अथवा मूल राशिमें कोई अंक इष्ट मानकर एक जगह घटा देय और एक जगह जोड देय फिर उन दोनों राशियोंको परस्पर गुणा करै और जो इष्ट कल्पना किया है; उसका वर्ग करके दोनों राशियोंका गुणा करनेसे जो राशि प्राप्त हुई है उसमें जोड देय तब वर्गफल प्राप्त होता है ॥ अथवा राशिः २९७ अयं त्रिभिरूनः पृथग्युतश्च २९४ । ३०० अनयोर्घातः ८८२०० त्रिवर्गेण युतो जातो वर्गः स एव ८८२०९ एवं सर्वत्र ॥ फैलाव-अथवा उपरोक्त रीतिके अनुसार राशि २९७ दोसौ सतानवेमें कल्पित इष्ट ३ तीन घटाया | मूलराशि. कल्पित इष्ट इष्टहीन राशि. इष्टयुक्त राशि. | २९७ ३ २९४ ३०० तब २९४ दोसौ चौ- | दोनों राशिकापरस्परगुणा इष्टका वर्ग. सब जोड. रानवे रहे और जब | २९४ ३ ८८२०० | ३०० ३ ९ राशिमें इष्ट ३ तीन | ००० ९ फल ८८२०९ को जोडा तब | ००० ३०० तीनसौ हुए | ८८२ | ८८२०० इनको परस्पर गुणा किया तब ८८२०० अठासी हजार दोसौ हुए फिर इष्ट ३ तीनका वर्ग किया तो ९ नौ हुए, इनको पहली गुणा करी हुई राशिमें मिला दिया तब ८८२०९ वर्गफल यही पूर्वोक्त हुआ ॥ इसी प्रकार सर्वत्र जानना ॥ २
( १८ ) लीलावती । वर्गमूले करणसूत्रं वृत्तम्-- वर्गमूल करनेका सूत्र श्लोक १ (सू०१४) त्यक्त्वान्त्याद्विषमात्कृतिं द्विगुणयेन्मूलं समे तद्धृते त्यक्त्वा लब्धकृतिं तदाद्यविषमाल्लब्धं द्विनिघ्नं न्यसेत् ॥ पंक्त्यां पंक्तिहते समेऽन्त्यविषमात्त्यक्त्वाप्तवर्गं फलम् पंक्त्यां तद्द्विगुणं न्यसेदिति मुहुः पंक्तेर्दलं स्यात्पदम् ॥ १० ॥ अन्वयः-गणकः अन्त्यात् विषमात् कृतिं त्यक्त्वा मूलं द्विगुणयेत् समे तद्धृते सति तदाद्यविषमात् लब्धकृतिं त्यक्त्वा लब्धं द्विनिघ्नम् पंक्त्यां न्यसेत् । समे पंक्ति- हते सति अन्त्यविषमात् आप्तवर्गं त्यक्त्वा तत् फलं द्विगुणम् पंक्त्यां न्यसेत् । इति मुहुः कुर्यात् तदा पंक्तेः दलम् पदं स्यात् ॥ १० ॥ अर्थः-गणक वर्गराशिमें अन्त्यके विषम अंकमें किसी अंकका वर्ग घटावै फिर जिस अंकका वर्ग घटाया है; उसको द्विगुणा करके एक स्थानमें रखदेय उसको पंक्ति कहते हैं, फिर उस द्विगुणित मूलका विषमके धोरेके सम अंकमें भाग देय जो लब्धि मिले उसका वर्ग उसी समके समीपके विषममें घटा देय जिस अंकका वर्ग घटाया हो उसको द्विगुणा करके पंक्तिमें एक स्थान बढाकर रख देय, फिर उसी पंक्तिका विषमके समीपके सम अंकमें भाग देय जो लब्धि होय उसका वर्ग समी- पके विषम अंकमें घटा देय, मूलको द्विगुणा करके पंक्तिमें एक स्थान बढाकर रक्खे इस प्रकार जब तक अंक निःशेष हों तबतक क्रिया करे, फिर पंक्तिके सब अंकोंको जोडकर दो २ का भाग देय अर्थात् आधा करलेय तो वर्गफल प्राप्त होता है ॥ १० ॥ अत्रोद्देशकः-वर्गमूलके विषयमें उदाहरण । मूलं चतुर्णां च तथा नवानां पूर्वं कृतानाञ्च सखे कृतीनाम् ॥ पृथक्पृथग्वर्गपदानि विद्धि बुद्धेर्विवृद्धिर्यदि तेऽत्र जाता ॥ ४ ॥ अन्वयः-हे सखे ! यदि अत्र ते बुद्धेः विवृद्धिः जाता तर्हि चतुर्णां नवानाञ्च मूलम्; तथा पूर्वं कृतानां कृतीनां च वर्गपदानि पृथक् पृथक् विद्धि ॥ ४ ॥ अर्थः-हे प्रिये लीलावति ! जो वर्गमूल करनेमें तुम्हारी बुद्धि बढी हुई है तो ४ और ९ नौका वर्गमूल तथा पहले किये हुए वर्गोंका भी वर्गमूल अलग अलग कहो ॥ फैलाव-अंकोंकी गिनती ऊपरकी तरफसे होती है और उधरसे ही आदि कहा- वती है, पहला, तीसरा, पाँचवाँ इत्यादि अंक विषम कहाते हैं और दूसरा चौथा छठा और आठवाँ इत्यादि अंक सम कहाते हैं; वर्गमूल निकाले तो स्मरणके
वर्गकरणप्रकारः । ( १९ ) कारण विषम अंकोंके ऊपर ( ' ) ऐसा चिह्न देना चाहिये और सम अंकके ऊपर ( - ) ऐसा चिह्न देना चाहिये. वर्गमूल निकालनेमें राशिमें जितने अंक विषम होते हैं उतनेही अंक मूलमें नियत करके आते हैं ॥ न्यासः-४।९ । ८।१।९६ । ८८२०९ । १००१०००२५ लब्धानि क्रमेण मूलानि २। ३। ९। ९४। २९७। १०००५ ॥ (क) उपरोक्त रीतिके अनुसार ४' का वर्गमूल २ दो होता है. क्योंकि दोका ही वर्ग घटता है. फिर अंक निःशेष होजाते हैं ॥ (ख) उसी रीतिके अनुसार ९' नौका वर्गमूल ३ तीन होता है क्योंकि तीन का ही वर्ग घटनेपर राशि निःशेष हो जाती है ॥ (ग) तथा ८'१' इक्यासीका वर्गमूल निकालना है ॥ यहाँ अन्त्य विषम इक्यासी ही है. उसमें नौका वर्ग घटानेसे राशि निःशेष हो जाती है इस कारण वर्गमूल ९ नौ ही होता है ॥ (घ) तथा ८'८२'०९' यहाँ पूर्वोक्त रीतिके अनुसार अन्तके विषम अंक ८' आठमें दोका २ वर्ग घटाया. अर्थात् चार ४ घटाया. तब ४ चार शेष रहे. उनके ऊपर सम अंक ८ आठ आया इसकारण ४८ अडतालीस सम हुआ. और जिन दो २ का वर्ग विषम अंकमें घटाया था उस मूल दो २ को द्विगुणा करके एक स्थानमें अलग रख दिया उसीका नाम पंक्ति है फिर उस पंक्तिमें वर्गराशि मूल पंक्ति रखे हुए ४ चारका सम अङ्क ८८२०९ २ ४ ४८ में भाग दिया तब ९ नौ ४ ८ लब्धि हुए यद्यपि ज्यादा लब्धि ४ ) ४८ ( ९ जोड ५८ हो सकती हैः परन्तु आगे वर्ग ३६ १४ घटाना है इस कारण ९ बार ही १२२ जोड ५९४ भाग लिया तब ४८ मे छत्तीस ८१ भाग ३६ घटनेसे १२ बारह बाकी ५८ ) ४१० ( ७ २ ) ५९४ ( २९७ रहे उसपर विषम अङ्क २ दो ४०६ ४ फल उतारा तो १२२ एकसौ बाईस ४९ १९ हुए. इसमें समांकमें भाग देनेसे ४९ १८ लब्धि मिले हुए नौका वर्ग घटाया ०० १०४ तब १२२ में ८१ इक्यासी १४ ०० घटनेसें ४१ इकतालीस शेष रहे और जिसका वर्ग घटाया उस ९ को द्विगुणा करके १८ को पंक्तिमें एकस्थान बढाकर रक्खा जोडनेसे पंक्ति ५८ अठ्ठावन हुई. फिर शेष ४१ के ऊपर सम अङ्क शून्य आया तब ४१० चारसौ दश सम अंक हुआ. इसमें
( २० ) लीलावती । पंक्ति ५८ अट्ठावनका भाग देनेसे ४ चार शेष रहे. उसके ऊपर विषम अङ्क ९ नौंको उतारा तब ४९ उनंचास हुए इसमें सम अङ्कमें भाग देनेसे लब्धि हुए ७ सातका वर्ग घटाया तब निःशेष होगया. जिसका वर्ग घटाया, उस सातको द्विगुणा १४ करके पंक्तिमें एक स्थान बढाकर रक्खा, तब जोड देनेसे ५९४ पाँचसौ चौरानवे हुए. इसका आधा किया तब २९७ दोसौ सत्तानवे हुए. यही वर्गमूल अर्थात् उत्तर हुआ ॥ ।-।-।-।-। ( उ०) तथा पूर्वोक्त रीतिके अनुसार १००१०००२५ का मूल १०००५ दश हजार पाँच होता है. अर्थात् अन्तके विषम अंक १ एकमें १एकका वर्ग घटाया तब शेष अङ्क कोई विषम अङ्कमें नहीं रहा. और जिसका वर्ग घटाया है उस १ को द्विगुण करके वर्गराशि मूल पंक्ति पंक्तिमें रक्खा फिर ।-।-।-।-। अन्तके विषमके १००१०००२५ १ २ समीपका सम अंक ० २)०(० ० शून्यमें पंक्ति २ २ ―― का भाग दिया तब ०० २० शून्य लब्धि हुआ ०० ० और शून्य ही शेष २०)००१(० ―― रहा. फिर विषम ०० २०० अंक ० शून्यको ००१० ० उतारा उसमें सम ०००० ―― अङ्कमें भागको लब्धि २००)००१००( ० २००० शून्यका वर्ग घटा ००००० १० दिया. तब शून्य ही ००१०००| ―― शेष रहा फिर ०००००० २००१० जिस अङ्कका वर्ग २०००)००१०००२(५ २) २००१० ( १०००५ फल घटाया था उस ००१०००० २ शून्य ० को द्विगुण ००००००२५ ―― किया; तब शून्य ही ५२ ०० रहा. उसको पंक्तिमें ०० ० ―― ००० ० ―― ०००१ ०००० ―― ०००१० ०००१० ―― ०००००
एक स्थान बढाकर रक्खा. इसी प्रकार क्रिया करते २ जब राशि निश्शेष हो गया तब पंक्ति का जोड २००१० बीश हजार दश हुआ. उसका आधा करा तो वही १०००५ दश हजार पांच वर्गमूल हुआ ॥ घने करणसूत्रं वृत्तत्रयम्- घन करनेके सूत्र तीन श्लोक. समत्रिघातश्च घनः प्रदिष्टः- अन्वयः-समत्रिघातः घनः प्रदिष्टः ॥ अर्थः-सम तीन अङ्कोंके गुणा करनेसे जो राशि प्राप्त होती है वह घन कहाता है. स्थाप्यो घनोऽन्त्यस्य ततोऽन्त्यवर्गः ॥ आदित्रिनिघ्नस्तत आदिवर्गरुयन्त्याहतोऽथादि- घनश्च सर्वे ॥ ११ ॥ स्थानान्तरत्वेन युता घनः स्यात्प्रकल्प्य तत्खण्डयुगं ततोऽन्त्यम् ॥ एवं मुहुर्वर्गघनप्रसिद्धावाद्यङ्कतो वा विधिरेष कार्य्यः ॥ १२ ॥ अन्वयः--अन्त्यस्य घनः स्थाप्यः । ततः आदित्रिनिघ्नः अन्त्यवर्गः स्थाप्यः । ततः त्र्यन्त्याहतः आदिवर्गः स्थाप्यः । अथ आदिघनश्च स्थाप्यः । सर्वे स्थानान्त- रत्वेन युताः घनः स्यात् । (अवशिष्टेष्वङ्केषु ) ततः तत्खण्डयुगम् अन्त्यं प्रकल्प्य एष विधिः मुहुः कार्य्यः । वा वर्गघनप्रसिद्धौ एषः विधिः आद्यंकतः कार्य्यः ॥ अर्थः-अन्तके अंकका घन करके एक स्थानमें रक्खे फिर अन्तके अंकका वर्ग करके आदि अंकसे गुणाकर ३ तीनसे गुणा करके पहले अंकोंके नीचे १ एक स्थान बढाकर रक्खे. फिर आदिके अंकका वर्ग कर उसको तीनसे गुणा कर अन्तके अंकसे गुणा करके उसी पंक्तिमें एक स्थान बढाकर लिखे फिर आदिके अंकका घन करके उसी पंक्तिमें एक स्थान बढाकर लिखे फिर सबको जोडनेसे दो अंकका वर्ग निकल आता है. यदि अधिक अंक होय तो जिन दो अंकोंका पहले घन लिया है उन्ही दोनों अंकोंको अन्त्य अंक मानकर आगेका एक अंक लेकर दो खण्ड कल्पना करके पूर्वोक्त रीतिके अनुसार क्रिया करे. इस प्रकार जहांतक अंक रहे तहांतक इस विधिको बारम्बार करे. जब राशि निःशेष होजाय तब पंक्तिको जोड लेय. वही घन होगा. अथवा वर्ग तथा घन आदिकी तरफसे करे. तब भी फल प्राप्त होता है॥
( २२ ) लीलावती । अत्रोद्देशकः- घन करनेके विषयमें उदाहरण. नवघनं त्रिघनस्य घनं तथा कथय पञ्चघनस्य घनञ्च मे ॥ घनपदञ्च ततोऽपि घनात्सखे यदि घनेऽस्ति घना भवतो मतिः ॥ ५ ॥ अन्वयः-हे सखे ! यदि घने भवतः मतिः घना अस्ति तदा नवघनम् । त्रिघनस्य घनम् । तथा पञ्चघनस्य घनंच । ततः घनपदं च मे कथय ॥ ५ ॥ अर्थः-हे मित्र ! यदि तुम्हारी बुद्धिघन करनेमें सघन है तो ९ नौका घन तथा तीनके घन २७ का घन और पाँचके घनका १२५ घन तथा इनही घन करी हुई राशियोंका घनमूल भी कहो ॥ ५ ॥ न्यासः-९ । २७ । १२५ । जाताः क्रमेण घनाः ७२९ । १९६८३ । १९५३१२५ । फैलाव-पूर्वोक्त रीतिके अनुसार ९ कौ ९ नौसे दोवार गुणा किया तो फल ९ | सातसौ उनतीस हुआ ॥ ९ | ( ख )अब सत्ताईस २७का वर्ग करना है. यहाँ दूसरी रीतिके अनुसार ८१ | अन्तके अंकका घन किया तौ ८ आठ हुआ. उसको एक स्थानमें रख दिया ९ | फिर अन्तके अंक २ का वर्ग किया तो ४ हुए. उसको आदिके अंक ७सातसे ७२९ गुणा किया तो २८ अट्ठाईस हुए.उनको तीन से गुणा किया तो ८४ चौरासी हुए. इनको ८ आठके नीचे एक स्थान बढाकर रक्खा. फिर आदिके अंक ७ सातका वर्ग किया तो ४९ उनचास मूलराशि अन्त २ का घन | पंक्ति हुआ उसको तीन ३ से गुणा २७ ८ | ८ किया, तब १४७ एकसौ सैंता अन्तका वर्ग | ८४ लिस हुए. उनको अन्तके अंक आदि और ३ से | २९४ २ से गुणा किया तब २९४ गुणा किया हुआ | ३४३ दोसौ चौरानवे हुए. उनको ८४ | १९६८३ जोड. पंक्तिमें एक स्थान बढाकर लिखा आदि७ का वर्ग ३ से और अन्तके | यही २७का घन हु. फिर आदिके अंक ७ सातका अंक २ से गुणा किया हुआ | घन किया तब ३४३ तिनसौ २९४ | आदिके अंक ७ सातका घन ३४३.
घनकरणप्रकारः । (२३) तैंतालीस हुआ उसको भी पंक्तिमें एक स्थान बढाकर रक्खा फिर जोड देनेसे जो राशि हुआ वही ४७ सत्ताईसका घन है ॥ (ग) इसी प्रकार १२५ एकसौ पचीसका घन करना है यहाँ आदिके दो अंकोंको अन्तका और आदिका माना तब अन्तका अंक जो १ एक है उसका वर्ग किया तब १ एक ही हुआ. उसको एक स्थानमें लिखा फिर अन्तके अंक १ एकका वर्ग किया तब एक १ ही रहा. उसको आदिके अंक दो २ से गुणा किया तब दो २ हुए. उनको तीनसे गुणा किया तब ६ हुए. उनको पंक्तिमें एक स्थान बढाकर लिखा. फिर आदिके अंक २ दोका वर्ग किया तब ४ चार हुए. उसको तीन ३ से गुणा किया, मूलराशि अन्तका घन | १२५। अन्तका घन. १२५ १ | १७२८ अन्तका वर्ग आदि और ३ से गुणा | अन्तका वर्ग आदि और तीन ३ से किया हुआ ६ | गुणा किया हुआ २१६० आदिके अंकका वर्ग अन्त और ३ से | आदिका वर्ग अन्त और ३ से गुणा- गुणा किया हुआ १२ | किया हुआ ९०० आदिके अंकका घन ८ | आदिका घन १२५ पंक्ति | पंक्ति १ | १७२८ ६ | २१६० १२ | ९०० ८ | १२५ १७२८ | १९५३१२५ जोड. तब १२ बारह हुआ. उसको पंक्तिमें एक स्थान बढाकर लिखा फिर आदिके अंक दो २ का घन किया तो आठ हुए इनको भी पंक्तिमें एक स्थान बढाकर लिखा और जोड दिया तो १२ बारहका घन निकला, अब एक १ अंक बाकी रह गया इसकारण अन्त अंक १२ को माना और आदि अंक पांच ५ को माना. पूर्वोक्त रीतिके अनुसार अन्त्य अंक १२ बारहका घन तो निकाल ही चुके. फिर बारहका वर्ग किया तब १४४ एकसौ चौवालीस हुआ. उसको तीन ३ से गुणा किया तब ४३२ चारसौ बत्तीस हुआ. उसको आदि अंक पांच ५ से गुणा किया तब २१६० दो हजार एकसौ साठ हुआ इनको पंक्तिमें एक स्थान बढाकर लिखा, फिर आदिके अंक पांच ५ का वर्ग किया तब २५ पचीस हुआ, उसको तीनसे गुणा किया तो ७५ पचहत्तर हुआ उसको अन्तके अंक १२ बारहसे गुणा किया तो ९०० नौ सौ हुए. इनको एक स्थान बढाकर पंक्तिमें लिखा, फिर आदिके अंक ५ पांच का घन किया तब १२५
( २४ ) लीलावती । एकसौ पचीस हुआ. इसको भी पंक्तिमें एकस्थान बढाकर लिखा फिर जोडनेसे जो राशि हुआ वही १२५ का घन है ॥ अथवा आदि अंककी तरफसे घन करनेसे भी वही फल प्राप्त होता है परन्तु उलटी तरफसे किया जाता है इसकारण एक एक स्थान १२५ पीछे हटाकर सब अंक जोडे जाते हैं और जहाँ जो कार्य ९०० आदिके अंकसे लिखा है वह अन्तके अंकसे लिया जाता है २१६० और जो कार्य्य अन्तके अंकसे लिखा है वह आदिसे लिया ००८ जाता है ॥ ७१२ जोड. ०६ १
१९५३१२५ घन करनेकी तीसरी रीति । खण्डाभ्यां वा हतो राशिस्त्रिघ्नः खण्डघनैैक्ययुक् ॥ अन्वयः-वा खण्डाभ्यां हतः राशिः त्रिघ्नः खण्डघनैैक्ययुक् राशिः घनः स्यात् ॥ अर्थः-अथवा जिस राशिका घन करना हो उसके दो खण्ड करे. उनसे राशिको गुणा करके तीन ३ से गुणा करे फिर दोनों खण्डोंका अलग २ घन करके पहली राशिमें जोडनेसे जो राशि होती है वह घन कहाता है ॥ राशिः ९ अस्य खण्डे ४ । ५ आभ्यां राशिर्हतः १८० त्रिन्निघ्नश्च ५४० खण्डघनैैक्येन १८९ युतो जातो घनः ७२९ ॥ फैलाव-उपरोक्त नियमानुसार राशि ९ राशि. दो खण्ड. नौके ४ । ५ चार और पांच दोखण्ड किये ९ ४ । ५ फिर प्रथम पहले खण्ड चार ४ से राशि ९ नौको [पहले] ४ ९ पहले खण्डसे गुणा किया तो ३६ छत्तीस हुआ.उसको द्वितीय [खण्डका] ४ ४ खण्ड पांच ५ से गुणा किया तब १८० एकसौ [घन] १६ ३६ राशिका गुणा अस्सी हुआ. इसको तीन ३ से गुणा किया तब ४ ५ ५४० पांचसौ चालीस हुआ. फिर दोनों खण्डोंका ६४ १८० दूसरे ख० रा० गु० अलग २ घन किया अर्थात चारका ४ का घन [दूसरे] ५ ३ तीनसे गुणा किया तब ६४ चौंसठ हुआ और पांचका घन [खण्डका] ५ ५४० किया तब १२५ एकसौ पचीस हुआ. इनको [घन] २५ ५४० ५ ६४ १२५ १२५ ७२९ जोड पहली गुणा करी हुई राशिमें जोडा तब घनफल होता है ॥
घनकरणप्रकारः। (२५) अथवा राशिः २७ अस्य खण्डे २० । ७ आभ्यां हतस्त्रिघ्नश्च ११३४० खण्डघनैक्येन ८३४३ युतो जातो घनः १९६८३ फैलाव- उपरोक्त नियमानुसार राशि २७ सत्ताईसके २० । बीस और ७ सात दो खण्ड किये फिर प्रथम पहले खण्ड २० बीससे राशि २७ को गुणा किया तब ५४० पाँचसौ चालीस हुए फिर दूसरे खण्ड ७ सातसे गुणा किया तब ३७८० तीन हजार सातसौ अस्सी हुए. उनको तीन [vertical-col-1: राशि २७ २० २० ४०० २० ८००० ७ ७ ४९ ७ ३४३] [vertical-col-label-1: पहिले खण्डका घन] [vertical-col-label-2: दूसरे खण्डका घन] [col-right: दो खण्ड २० । ७ २७ पहले खंडसे २० राशिका गुणा ५४० दूसरे खंडसे ७ राशिका गुणा ३७८० ३ तीनसे गुणा. ११३४० ११३४० ८००० ३४३ १९६८३ जोड] ३ से गुणा किया तब ११३४० ग्यारह हजार तीनसौ चालीस हुए फिर पहले खण्ड २० बीसका घन किया तब ८००० आठ हजार हुआ और दूसरे खण्डका घन ३४३ तीनसौ तेतालीस हुआ. इन दोनों खण्डोंके घनको पहली तीनसे गुणा करी हुई राशि में जोडा तब घन फल होता है. घन करनेकी और रीति. वर्गमूलघनः स्वघ्नो वर्गराशेर्घनो भवेत् ॥ १३ ॥ अन्वयः-स्वघ्नोः वर्गमूलघनः वर्गराशेः घनः भवेत् ॥ १३ ॥ अर्थः-वर्गमूलका घन अपनेसे अर्थात् जितने अङ्क हों उतनेहीसे गुणा किया हुआ वर्गराशिका घन हो जाता है ॥ राशिः ४ अस्य मूलं २ घनः ८ अयं स्वघ्नो जातश्चतुर्णां घनः ६४ फैलाव-उपरोक्त रीतिके अनुसार वर्गराशि ४ चार है इसका मूल २ दो हुआ इसका घन ८ आठ हुआ उसको अपने समान अङ्क ८ आठहीसे गुणा किया तब ६४ चौंसठ हुआ यही फल है ॥ वा राशिः ९ अस्य मूलम् ३ घनः २७ अस्य वर्गों नवानां घनः ७२९ यो वर्गघनः स एव वर्गमूलघन- वर्गः ॥ बीजगणितेऽस्योपयोगः । इति घनः ॥
( २६ ) लीलावती । फैलाव-तथा वर्गराशि ९ नौ है इसका मूल तीन हुआ उसका घन किया तब २७ सत्ताईस हुआ इसको स्वसमान अंक सत्ताईससे ही गुणा किया तब २७ × २७ = ७२९ सातसौ उनतीस हुआ यही नौ ९ का घन है ॥ जो वर्गका घन होता है, वही वर्गमूलका घनवर्ग होता है इससे बीज गणितमें बहुत साहाय्य होता है ॥ इति घनः॥ अथ घनमूले करणसूत्रं वृत्तद्वयम्- घनमूल करनेके विषयमें २ दो श्लोक. आद्यं घनस्थानमथाघने द्वे पुनस्तथान्त्याद्धनतो विशोध्य ॥ घनं पृथक्स्थं पदमस्य कृत्या त्रिघ्नया तदाऽऽद्यं विभजेत्फलं तु ॥ १४ ॥ पङ्क्त्यां न्यसेत्तत्कृति- मन्त्यनिघ्नीं त्रिघ्नीं त्यजेत्तत्प्रथमात्फलस्य ॥ घनं तदाद्याद्धनमूलमेवं पंक्तिर्भवेदेवमतः पुनश्च ॥ १५ ॥ अन्वयः-आद्यं घनस्थानं स्यात् । अथ द्वे अघने स्याताम् । पुनः तथा अन्त्यात् घनतः घनं विशोध्य पदं पृथक्स्थं कार्य्यम् । अस्य कृत्या त्रिघ्न्या तदाद्यं विभजेत् । फलं तु पंक्त्यां न्यसेत् । तत्कृतिम् अन्त्यनिघ्नीं त्रिघ्नीं तत्प्रथ- मात् त्यजेत् तदाद्यात् फलस्य घनं त्यजेत् । एवम् पंक्तिः भवेत् ! एवम् अतः पुनश्च कार्य्यम् ॥ १४ ॥ १५ ॥ अर्थः-जिस राशिका घनमूल निकाला जाता है उसमें पहला घनस्थान होता है, उसका यह चिह्न ! है फिर दो अघन स्थान होते हैं उनका यह ०० चिह्न है फिर एक घन होता है फिर दो अघन होते हैं इसी प्रकार जहां तक अ हों घन अघन जान लय फिर अन्तके घनसे किसी कल्पित अंकके घनको घटा कर जिस अंकका घन घटाया हो उसको एक स्थानमें अलग लिखे. फिर जिसका घन घटाया है उस अंकका वर्ग करके फिर ३ तीनसे गुणाकर घनसे आदिके अघनमें भाग देय जितने बार घटे उस भागकी लब्धिको पंक्तिमें एक स्थान बढाकर लिखे. फिर लब्धिका वर्ग कर फिर अन्तके अंकसे गुणा कर त्रिगुणा करके द्वितीय अघनमें घटा देय. फिर लब्धिका घन अघनके समीपेके घनमें घटा देय यदि अंक शेष रहें तो फिर इसी रीतिसे करे जबतक राशि निःशेष हो ॥ १४ ॥ १५ ॥ अत्र पूर्वोद्देशके उक्तघनानां मूलार्थं न्यासः-७२९ । १९६८३ । १९५३१२५। क्रमेण लब्धानि मूलानि ९ । २७ । १२५ ॥
घनमूलकरणप्रकारः । ( २७ ) फैलाव-उपरोक्त नियमानुसार घनराशि ७२९ सातसौ उनतीस पर घन और अघनका चिह्न दिया फिर अन्तके घनसे ९ नौका घन घटानेसे राशि निःशेष हो जाता है. इस कारण इस घनराशिका मूल ९ नौ ही होता है ॥ -।-।-। तथा घनराशि १९६८३ उन्नीस हजार छ सौ तिरासीपर घन और अघनका चिह्न दिया. फिर अन्तके घन ९ नौमें २ का घन ८ आठ | राशि । | ㄱ - - । | १९६८३ घटाया तब ११६८३ ग्यारह हजार छहसौ तिरासी रहा | ८ फिर मूल २ दोको अलग लिखा. यही पंक्ति हुई फिर | ——— पंक्ति २ दोको वर्ग कर तीन ३ से गुणा किया तब | ११६८३ बारह हुआ. इनका घनके आदिके अघनमें भाग लिया | ८४ तब ८४ चौरासी घटाया और सात ७ लब्धि मिला. | ——— उसको पंक्तिमें लिखा. फिर ३२८३ तीन हजार दोसौ | ३२८३ । तिरासी शेष रहा. तब उसी लब्धि ७ सातका वर्ग | २९४ किया तब ४९ उनंचास हुआ. उसको पंक्तिके अन्तके | ═════ अंक दो २ से गुणा किया तब ९८ अठानवे हुआ. उन | ३४३ । को ३ तीनसे गुणा किया तब २९४ दोसौ चौरानवे | ३४३ हुए. इनको अघनके समीपके द्वितीय अघनमें घटाया | ००० तब ३४३ तीनसौ तेतालीस शेष रहा. इसमें लब्धि | ───── सात ७ का घन ३४३ घटाया तब राशि निःशेष होगया. | पंक्ति | २ | ०७ | ──── | २७ । - । - । तीसरा उदाहरण १९५३१२५ इस राशिका उसी रीतिसे १२५ एकसौ पच्चीस घनमूल हुआ ॥ इति घनमूल ॥ अथ भिन्नपरिकर्माष्टकम् । तत्रादावंशसवर्णनम् । तत्रापि भागजातौ करणसूत्रवृत्तम्-- भिन्न परिकर्माष्टकमें पहले अंकोंकी सवर्णता लिखते हैं । उसमें भी पहले भागजाति, प्रभागजाति, भागानुबन्ध, भागापवह इनमेंसे भागजातिके विषयमें क्रिया करनेका सूत्र एक श्लोकमें लिखते हैं- अन्योन्यहाराभिहतौ हरांशौ राश्योः समच्छेदविधान- मेवम् ॥ मिथो हराभ्यामपवर्तिताभ्यां यद्वा हरांशौ सुधियात्र गुण्यौ ॥ १ ॥
( २८ ) लीलावती । अन्वयः-हरांशौ अन्योन्यहाराभिहतौ कार्यौ। एवं राश्योः समच्छेदविधानं स्यात्। यद्वा सुधिया अत्र अपवर्तिताभ्यां हराभ्यां हरांशौ मिथः गुण्यौ ॥ १ ॥ अर्थः-एक राशिके हरसे दूसरी राशिके हर और अंशको गुणा करे. फिर जिस राशिके हर और अंशको गुणा किया है उस राशिके हरसे पहिले जिस राशिके हरसे हर और अंशको गुणा किया था उस राशिके हर और अंशको गुणा करनेसे राशियोंका समच्छेद हो जाता है, अथवा राशियोंके हरोंको किसी एक अंकसे अपवर्तन देकर अपवर्तित हरोंसे परस्पर राशियोंके हर और अंशोंको बुद्धिमान् गुणा करे. तब भी समच्छेद हो जाता है, इसीको भागजाति कहते हैं ॥ १ ॥ अत्रोद्देशकः- भागजातिके विषयमें उदाहरण. रूपत्रयं पञ्चलवस्त्रिभागो योगार्थमेतान्वद तुल्य- हारान् ॥ त्रिषष्टिभागश्च चतुर्दशांशः समच्छिद्यौ मित्र वियोजनार्थम् ॥ १ ॥ अन्वयः-हे मित्र ! रूपत्रयम् पञ्चलवः त्रिभागः एतान् योगार्थं तुल्यहारान् वद । तथा त्रिषष्टिभागः चतुर्दशांशश्च एतौ वियोजनार्थं समच्छिद्यौ वद ॥ १ ॥ अर्थः- हे मित्र ! रूप ३ तनि और एक रूपका १/५ पञ्चमांश तथा एक रूपका १/३ तृतीयांश इनको योग (जोड) करनेके वास्ते सबके एक समान हर बनाकर कहो और एक रूपका १/६३ त्रिषष्टिमा भाग और एक रूपका १/१४ चौदहमा भाग इनको अन्तर (घटाव) के वास्ते दोनोंके एक समान हर बनाकर कहो ॥ न्यासः- ३/१ १/५ १/३ जाताः समच्छिदाः ४५/१५ ३/१५ ५/१५ योगे जातम् ५३/१५ फैलाव-उपरोक्त नियमानुसार ३/१ १/५ १/३ यहाँ पहली राशिके हर एकसे अन्य दोनों राशियोंके हर और अंशोंको गुणा किया तब ३/१ १/५ १/३ यह स्वरूप हुआ. फिर दूसरी राशिके हर ५ पाँचसे अन्य दोनों राशियोंके हर और अंशोंको गुणा किया तब १५/५ १/५ ५/१५ ऐसा रूप हुआ. फिर तीसरी राशिके हर ३ तीनसे अन्य दोनों राशियोंको गुणा किया ४५/१५ ३/१५ ५/१५ ऐसा रूप हुआ. अब सबके हर एक समान होनेसे समच्छेद हो गया. अब यहां हर तो सबके एकही हैं इसकारण सब अंशोंको जोडा तब ५३/१५ ऐसा हुआ ॥ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri
घनमूलकरणप्रकारः । (२९) अथ द्वितीयोदाहरणार्थं न्यासः--$\frac{१}{६३}\ \frac{१}{१४}$ सप्तापवर्तिताभ्याम् $\overline{\ \ ९\ \ \ २\ \ }$ सङ्गुणितौ समच्छेदौ $\frac{२}{१२६}\ \frac{९}{१२६}$ वियोजिते जातम् $\frac{७}{१२६} = \frac{१}{१८}$ इति भागजातिः । फैलाव-अन्तरके विषयमें उदाहरण-$\frac{१}{६३}\ \frac{१}{१४}$ यहां दोनों राशियोंके हरोंमें ७सातका अपवर्तन लग सकता है इस कारण दोनों राशियोंके हरोंमें सातका ७अपवर्तन दिया तब $\frac{१}{६३}\ \frac{१}{१४}$ ऐसा हुआ यहाँ एक राशिके अपवर्तित हरमें द्वितीय राशिके अंश तथा हरको परस्पर गुणा करनेसे समच्छेद होगा इस कारण पहली राशिके परावर्तित हर ९नौँसे द्वितीय राशिके अंश और हरको गुणा किया तब $\frac{१}{६३}\ \frac{९}{१२६}$ ऐसा हुआ फिर द्वितीय राशिके परावर्तित हर २ दो से प्रथम $\frac{१}{९}\ \frac{२}{}$ राशिके अंश तथा हरको गुणा किया तब $\frac{२}{१२६}\ \frac{९}{१२६}$ ऐसा समच्छेद हुआ अब यहाँ अन्तर करना है इस कारण अंश ९ नौंमें दो २ का घटाया तब $\frac{७}{१२६}$ ऐसा रूप हुआ. यहाँ सातका परिवर्तन लग सकता है इस कारण परिवर्तन दिया तब $\frac{१}{१८}$ ऐसा रूप हुआ ॥ अथ प्रभागजातौ करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्-- प्रभागजाति वह कहाती है जिसमें भागका भी भाग लिया जाय उसके करनेकी रीति आधे श्लोकमें कहते हैं ॥ लवा लवघ्नाश्च हरा हरघ्ना भागप्रभागेषु सवर्णनं स्यात् ॥ अन्वयः-भागप्रभागेषु लवाः लवघ्नाः । हराः हरघ्नाः सवर्णं स्यात् ॥ अर्थः--भाग प्रभाग जातिमें अंशोंको अंशोंसे गुणा करनेसे और हरोंको हरोंसे गुण। करनेसे सवर्णन होता है ॥ अत्रोद्देशकः-- प्रभागजातिके विषयमें उदाहरण. द्रम्मार्द्धत्रिलवद्वयस्य सुमते पादत्रयं यद्भवेत् तत्पंचांशकषोडशांशचरणः सम्प्रार्थितेनार्थिने ॥ दत्तो येन वराटकाः कति कदर्येणार्पितास्तेन मे ब्रूहि त्वं यदि वेत्सि वत्स गणिते जातिं प्रभागाभिधाम् ॥ २ ॥
( ३० ) लीलावती । अन्वयः-हे सुमते ! सम्प्रार्थितेन येन कदर्येण द्रम्मार्द्धत्रिलवद्वयस्य यत् पादत्रयं भवेत् । तत्पञ्चांशकषोडशांशचरणः अर्थिने दत्तः । यदि गणिते प्रभागाभिधां जातिं वेत्सि तर्हि हे वत्स ! तेन कति वराटकाः अर्पिताः इति मे ब्रूहि ॥ २ ॥ अर्थः-हे सुबुद्धे ! याचना किये हुए जिस कृपणने १ द्रम्मके १/२ आधेके द्विगुणित तृतीयभाग २/३ का जो त्रिगुणित चतुर्थांश ३/४ होता है, उसके पञ्चमांश १/५ के षोडशांश १/१६ का चतुर्थांश १/४ दिया. यदि गणित शास्त्रमें प्रभागजातिको जानते हो तो हे पुत्र ! उस कृपणने कितनी कौडी याचकको दी सो कहो ॥ न्यास-- १/१ १/२ २/३ ३/४ १/५ १/१६ १/४ सवर्णिते जातम् ६/७६८० षड्भिरपवर्तिते जातम्- १/१२८० एको दत्तो वराटकः ॥ इति प्रभागजातिः ॥ फैलाव-जिस राशिके नीचे हर नहीं होता है उसके नीचे एक हर कल्पना कर लिया जाता है, इसकारण द्रम्म १ एक है, उसके नीचे एक १/१ हर कल्पना किया, फिर उपरोक्त नियमानुसार सब १/१ १/२ २/३ १/५ १/१६ १/४ राशियोंके अंशोंको परस्पर गुणा किया, तब ६ छः हुए. फिर सब हरोंको परस्पर गुणा किया, अर्थात् २ दोको ३ तीन से गुणा किया तब ६ छ हुए. छ को ४ चारसे गुणा किया तब २४ चौबीस हुए. २४ को ५ पांच से गुणा किया तब १२० एकसौ बीस हुए १२० को १६ सोलहसे गुणा किया तब १९२० एक हजार नौसौ बीस हुए १९२० को ४ चारसे गुणा किया तब ७६८० सात हजार छहसौ अस्सी हुए. यही सब हरोंका गुणा हुआ तब ६/७६८० ऐसा रूप हुआ. इसमें ६ छ का अपवर्तन दिया तब १/१२८० ऐसा स्वरूप हुआ. अर्थात् १ एक द्रम्मका एक हजार दोसौ अस्सीवाँ भाग दिया. यहां कौड़ियोंका उत्तर बूझा है, इसकारण एक द्रम्मकी कौडी करीं तब १२८० एक हजार दोसौ अस्सी कौडी हुईं. इसमें हर १२८० का भाग दिया तब एक १ लब्धि हुआ. अर्थात् एक १ कौडी दिया ॥ अथ भागानुबन्धभागापवाहयोः करणसूत्रं सार्द्धं वृत्तम्-- भागानुबन्ध और भागापवाह करनेकी रीति डेढ श्लोकमें- छेदघ्नरूपेषु लवा धनर्णमेकस्य भागा अधिको-- नकाश्चेत् ॥ २ ॥ स्वांशाधिकोनः खलु यत्र तत्र भागानुबन्धे च लवापवाहे ॥ तलस्थहारेण हरं निहन्यात्स्वांशाधिकोनेन तु तेन भागान् ॥ ३ ॥
प्रभागाजातिप्रकारः । ( ३१ ) अन्वयः--एकस्य भागाः अधिकोनकाः चेत् तदा छेदघ्नरूपेषु लवाः धनर्णं कार्याः ॥ २ ॥ खसु यत्र भागानुबन्धे लवापवाहे वा एकस्य भागः स्वांशाधिकोनः स्यात् । तत्र तलस्थहारेण हरं निहन्यात् स्वांशाधिकोनेन तेन तु भागान् निहन्यात् ॥ ३ ॥ अर्थः--यदि किसी एक रूपका भाग अधिक हो अथवा हीन हो तब रूपको हरसे गुणा करके यदि रूपका भाग अधिक हो, तब तो गुणित अंकोंको अंशमें जोडकर (धन करके) अंशके स्थानमें लिखे और हर पूर्वोक्त ही रक्खे और यदि रूपका भाग हीन हो तो गुणित अंकोंमें अंशको घटाकर (ऋण करके) अंशके स्थानमें लिखे और हर वही रहता है। यह रीति भागानुबन्ध तथा भागापवाह करनेकी है॥ और जहां भागानुबन्धमें अथवा भागापवाहमें किसी रूपका भाग अपने किसी भागसे अधिक हो अथवा न्यून हो, वहां सबसे तलेके हरसे सबसे ऊपरके हरको गुणा करे, यदि भागका भाग अधिक हो तब तो सबसे नीचेके हरमें अपने अंशको जोडकर सबसे ऊपरके अंशको गुणा करे और यदि भागका भाग हीन हो तो सबसे नीचेके हरमें अपना अंश घटाकर उससे सबसे ऊपरके अंशको गुणा करनेसे भागानुबन्ध तथा भागापवाह होता है ॥ ३ ॥ अत्रोद्देशकः-- भागानुबन्ध तथा भागापवाहके विषयमें उदाहरण-- साङ्घ्रि द्वयं त्रयं व्यङ्घ्रि कीदृग्ब्रूहि सवर्णितम् ॥ जानास्यंशानुबन्धं चेत्तथा भागापवाहनम् ॥ ३ ॥ अन्वयः--हे सखे ! चेत् अंशानुबन्धं तथा भागापवाहं जानासि तर्हि साङ्घ्रि द्वयम् व्यङ्घ्रि त्रयम् सवर्णितं कीदृग् भवति इति ब्रूहि ॥ ३ ॥ अर्थः--हे मित्र ! यदि भागानुबन्ध तथा भागापवाहको जानतेहो तो अपने चतुर्थांशसहित रूप दो २ १/४ और अपने चतुर्थांशहीन रूप तीन ३ १/०४ सवर्णन करनेसे कैसा होता है सो कहो ॥ ३ ॥ न्यासः--२ १/४, ३ १/०४ सवर्णिते जातम् ९/४, ११/४ फैलाव--उपरोक्त पहली रीति के अनुसार २ १/४ का भागानुबन्ध किया अर्थात् हर ४ चारसे रूप२दो को गुणा किया तब ८ आठ हुआ. अब यहां भाग अधिक है, इस कारण आठमें अंश १ एक को जोड दिया तब ९ नौ हुए. यह अंशके स्थानमें रक्खा और हर वही ४ रहा. यही पूर्वोक्त राशिका भागानुबन्ध हुआ ॥ ३ १/०४ यहां हर ४ चार है उससे रूप ३ तीनको गुणा किया तब बारह १२ हुए. यहां भाग हीन है, इसकारण पूर्वोक्त नियमानुसार १२ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri
( ३२ ) लीलावती । बारहमें अंश १ एकको घटाया तब ११ ग्यारह रहे. इनको अंशके स्थानमें लिखा और हर वही १२ रहा यही पूर्वोक्त राशिका भागापवाह है ॥ दूसरा उदाहरण. अत्रोद्देशकः-इसी भागानुबन्ध भागापवाहके विषयमें उदाहरण- अंघ्रिः स्वत्र्यंशयुक्तः स निजदलयुतः कीदृशः कीदृशौ द्वौ त्र्यंशौ स्वाष्टांशहीनौ तदनु च रहितौ स्वत्रिभिः सप्तभागैः ॥ अर्द्धं स्वाष्टांशहीनं नवभिरथ युतं सप्तमांशैः स्वकीयैः कीदृक्स्याद्ब्रूहि वेत्सि त्वमिह यदि सखेऽशानुबन्धापवाहौ ॥ ४ ॥ अन्वयः-हे सखे ! यदि अंशानुबन्धापवाहौ वेत्सि तर्हि इह अंघ्रिः स्वत्र्यंशयुक्तः स निजदलयुतः कीदृशः स्यात् । तथा त्र्यंशौ द्वौ स्वाष्टांशहीनौ तदनु च स्वत्रिभिः सप्तभागैः रहितौ कीदृशौ स्याताम् । तथा अर्धं स्वाष्टांशहीनम् अथ नवभिः स्वकीयैः सप्तमांशैः युतं कीदृक् स्यात् । इति त्वं ब्रूहि ॥ ४ ॥ अर्थः-हे मित्र ! जो भागानुबन्ध तथा भागापवाह जानते हो, तो भागानुबन्ध तथा भागापवाहके अनुसार एकका १/४ चतुर्थांश अपने तृतीयांश १/३ संयुक्त जो अंक उसके १/२ अर्द्धांशसे युक्त कैसा होता है तथा तीसरे भाग दो २/३ को अपने १/८ अष्टमांशसे हीन करनेसे जो अंक हुआ उसको अपने सातवें ३/७ भाग तीनसे हीन किया तब क्या हुआ, तथा आधे १/२ को अपने अष्टमांशसे हीन करनेसे जो अंक शेष होता है, उससे अपने सातवें भाग ९ नौंसे युक्त किया तब कैसा रूप होगा यह तुम कहो ॥ ४ ॥ न्यासः- १/४ २/३ १/२ १/३ १/८ १/८ } सवर्णिते जातं क्रमेण. १/२ ३/७ ९/७ १/२ १/३ १/२ फैलाव-इस राशिमें सबसे तलेका हर २ है उससे सबसे ऊपरके हर ४ चारको न्यासः गुणा किया तब ८ आठ हो गया इसको सबसे ऊपरके हरके स्थानमें १ रखा और यहाँ नीचेको अंशयुक्त करना है, इस कारण नीचेके हरमें
४ अपना अंश १ एकको जोडा तब ३ तीन हुआ इससे सबसे ऊपरके १ अंश १ एकको गुणा किया तब ३/८ ऐसा हुआ फिर सबसे नीचेके हर
३ ३ तीनसे ऊपरके हरको ३/८ गुणा तब २४ चौबीस हुआ. उसको १ ऊपरके हरके स्थानमें रक्खा और यहां भी नीचेका अंशयुक्त करना है.
२ इस कारण नीचेके हरमें अपना अंश १ एक जोडा तब ४ चार हुआ इससे सबसे ऊपरके अंशको गुणा किया तब १२/२४ ऐसा रूप हुआ, इसमें १२ बारहका अपवर्तन दिया तब १/२ ऐसा रूप हुआ यही उत्तर है ॥